श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 8

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 8

 रैणि सबाई जलि मुई

रैणि सबाई जलि मुई कंत न लाइओ भाउ ॥
नानक सुखि वसनि सोहागणी जिन्ह पिआरा पुरखु हरि राउ ॥2॥510॥

 काइआ हंस किआ प्रीति है

काइआ हंस किआ प्रीति है जि पइआ ही छडि जाइ ॥
एस नो कूड़ु बोलि कि खवालीऐ जि चलदिआ नालि न जाइ ॥
काइआ मिटी अंधु है पउणै पुछहु जाइ ॥
हउ ता माइआ मोहिआ फिरि फिरि आवा जाइ ॥
नानक हुकमु न जातो खसम का जि रहा सचि समाइ ॥1॥510-511॥

 एको निहचल नाम धनु

एको निहचल नाम धनु होरु धनु आवै जाइ ॥
इसु धन कउ तसकरु जोहि न सकई ना ओचका लै जाइ ॥
इहु हरि धनु जीऐ सेती रवि रहिआ जीऐ नाले जाइ ॥
पूरे गुर ते पाईऐ मनमुखि पलै न पाइ ॥
धनु वापारी नानका जिन्हा नाम धनु खटिआ आइ ॥2॥511॥

 ध्रिगु तिन्हा दा जीविआ

ध्रिगु तिन्हा दा जीविआ जो हरि सुखु परहरि तिआगदे दुखु हउमै पाप कमाइ ॥
मनमुख अगिआनी माइआ मोहि विआपे तिन्ह बूझ न काई पाइ ॥
हलति पलति ओइ सुखु न पावहि अंति गए पछुताइ ॥
गुर परसादी को नामु धिआए तिसु हउमै विचहु जाइ ॥
नानक जिसु पूरबि होवै लिखिआ सो गुर चरणी आइ पाइ ॥1॥511॥

मनमुखु ऊधा कउलु है

मनमुखु ऊधा कउलु है ना तिसु भगति न नाउ ॥
सकती अंदरि वरतदा कूड़ु तिस का है उपाउ ॥
तिस का अंदरु चितु न भिजई मुखि फीका आलाउ ॥
ओइ धरमि रलाए ना रलन्हि ओना अंदरि कूड़ु सुआउ ॥
नानक करतै बणत बणाई मनमुख कूड़ु बोलि बोलि डुबे गुरमुखि तरे जपि हरि नाउ ॥2॥511॥

 जि सतिगुरु सेवे आपणा

जि सतिगुरु सेवे आपणा तिस नो पूजे सभु कोइ ॥
सभना उपावा सिरि उपाउ है हरि नामु परापति होइ ॥
अंतरि सीतल साति वसै जपि हिरदै सदा सुखु होइ ॥
अम्रितु खाणा अम्रितु पैनणा नानक नामु वडाई होइ ॥1॥511॥

 ए मन गुर की सिख सुणि

ए मन गुर की सिख सुणि हरि पावहि गुणी निधानु ॥
हरि सुखदाता मनि वसै हउमै जाइ गुमानु ॥
नानक नदरी पाईऐ ता अनदिनु लागै धिआनु ॥2॥512॥

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