श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 6

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 6

 मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै

मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥
सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥
आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥2॥314॥

 जिनि गुरु गोपिआ आपणा

जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥
ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥
सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥
सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥
नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥1॥314॥

 मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी

मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥
कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥
किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥
अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥
मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥2॥314॥

 गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ

गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ ॥
हरि गुण गावै हिरदै हारु परोइ ॥
पवितु पावनु परम बीचारी ॥
जि ओसु मिलै तिसु पारि उतारी ॥
अंतरि हरि नामु बासना समाणी ॥
हरि दरि सोभा महा उतम बाणी ॥
जि पुरखु सुणै सु होइ निहालु ॥
नानक सतिगुर मिलिऐ पाइआ नामु धनु मालु ॥1॥317॥

 इहु जगतु ममता मुआ

इहु जगतु ममता मुआ जीवण की बिधि नाहि ॥
गुर कै भाणै जो चलै तां जीवण पदवी पाहि ॥
ओइ सदा सदा जन जीवते जो हरि चरणी चितु लाहि ॥
नानक नदरी मनि वसै गुरमुखि सहजि समाहि ॥1॥508॥

 अंदरि सहसा दुखु है

अंदरि सहसा दुखु है आपै सिरि धंधै मार ॥
दूजै भाइ सुते कबहि न जागहि माइआ मोह पिआर ॥
नामु न चेतहि सबदु न वीचारहि इहु मनमुख का आचारु ॥
हरि नामु न पाइआ जनमु बिरथा गवाइआ नानक जमु मारि करे खुआर ॥2॥508॥

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