श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 5

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 5

 जीउ पिंडु सभु तिस का

जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥
नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥
ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥1॥91॥

 सतिगुर मिलिऐ उलटी भई

सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥
अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥
अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥
नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥2॥91॥

 कलि कीरति परगटु चानणु संसारि

कलि कीरति परगटु चानणु संसारि ॥
गुरमुखि कोई उतरै पारि ॥
जिस नो नदरि करे तिसु देवै ॥
नानक गुरमुखि रतनु सो लेवै ॥2॥145॥

 भै विचि जमै भै मरै

भै विचि जमै भै मरै भी भउ मन महि होइ ॥
नानक भै विचि जे मरै सहिला आइआ सोइ ॥1॥149॥

 भै विणु जीवै बहुतु बहुतु

भै विणु जीवै बहुतु बहुतु खुसीआ खुसी कमाइ ॥
नानक भै विणु जे मरै मुहि कालै उठि जाइ ॥2॥149॥

 गउड़ी रागि सुलखणी

गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥
भाणै चलै सतिगुरू कै ऐसा सीगारु करेइ ॥
सचा सबदु भतारु है सदा सदा रावेइ ॥
जिउ उबली मजीठै रंगु गहगहा तिउ सचे नो जीउ देइ ॥
रंगि चलूलै अति रती सचे सिउ लगा नेहु ॥
कूड़ु ठगी गुझी ना रहै कूड़ु मुलमा पलेटि धरेहु ॥
कूड़ी करनि वडाईआ कूड़े सिउ लगा नेहु ॥
नानक सचा आपि है आपे नदरि करेइ ॥1॥311॥

 हउमै जगतु भुलाइआ

हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥
सतिगुरु मिलै त नदरि होइ मनमुख अंध अंधिआर ॥
नानक आपे मेलि लए जिस नो सबदि लाए पिआरु ॥3॥312॥

 माइआधारी अति अंना बोला

माइआधारी अति अंना बोला ॥
सबदु न सुणई बहु रोल घचोला ॥
गुरमुखि जापै सबदि लिव लाइ ॥
हरि नामु सुणि मंने हरि नामि समाइ ॥
जो तिसु भावै सु करे कराइआ ॥
नानक वजदा जंतु वजाइआ ॥2॥313॥

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