श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 3

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 3

 हुकमु न जाणै बहुता रोवै

हुकमु न जाणै बहुता रोवै ॥
अंदरि धोखा नीद न सोवै ॥
जे धन खसमै चलै रजाई ॥
दरि घरि सोभा महलि बुलाई ॥
नानक करमी इह मति पाई ॥
गुर परसादी सचि समाई ॥1॥85॥

मनमुख नाम विहूणिआ

मनमुख नाम विहूणिआ रंगु कसु्मभा देखि न भुलु ॥
इस का रंगु दिन थोड़िआ छोछा इस दा मुलु ॥
दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥
बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥
नानक नाम रते से रंगुले गुर कै सहजि सुभाइ ॥
भगती रंगु न उतरै सहजे रहै समाइ ॥2॥85॥

 पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि

पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि माइआ मोह सुआइ ॥
दूजै भाइ हरि नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥
जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु कबहूं न चेतै जो देंदा रिजकु स्मबाहि ॥
जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवै जाइ ॥
मनमुखि किछू न सूझै अंधुले पूरबि लिखिआ कमाइ ॥
पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखदाता नामु वसै मनि आइ ॥
सुखु माणहि सुखु पैनणा सुखे सुखि विहाइ ॥
नानक सो नाउ मनहु न विसारीऐ जितु दरि सचै सोभा पाइ ॥1॥86॥

 सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ

सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ सचु नामु गुणतासु ॥
गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥
सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥
सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥
जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥
गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥2॥86॥

 पंडितु पड़ि पड़ि उचा

पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥
अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥
दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमै वारो वार ॥1॥86॥

 जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ

जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥
सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥
आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥
नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥2॥86॥

नानक सो सूरा वरीआमु

नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥
गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥
आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥
सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥
मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥
सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥
आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥
नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥1॥86॥

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