श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 2

श्लोक-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji 2

 गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ

गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥
गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥
सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥
जन नानकु नामु लए ता जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥2॥86-87॥

 आतमा देउ पूजीऐ

आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ ॥
आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ ॥
गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ ॥
खिनु पलु हरि नामु मनि वसै सभ अठसठि तीरथ नाइ ॥
सचे मैलु न लगई मलु लागै दूजै भाइ ॥
धोती मूलि न उतरै जे अठसठि तीरथ नाइ ॥
मनमुख करम करे अहंकारी सभु दुखो दुखु कमाइ ॥
नानक मैला ऊजलु ता थीऐ जा सतिगुर माहि समाइ ॥1॥87॥

 मनमुखु लोकु समझाईऐ

मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥
मनमुखु रलाइआ ना रलै पइऐ किरति फिराइ ॥
लिव धातु दुइ राह है हुकमी कार कमाइ ॥
गुरमुखि आपणा मनु मारिआ सबदि कसवटी लाइ ॥
मन ही नालि झगड़ा मन ही नालि सथ मन ही मंझि समाइ ॥
मनु जो इछे सो लहै सचै सबदि सुभाइ ॥
अम्रित नामु सद भुंचीऐ गुरमुखि कार कमाइ ॥
विणु मनै जि होरी नालि लुझणा जासी जनमु गवाइ ॥
मनमुखी मनहठि हारिआ कूड़ु कुसतु कमाइ ॥
गुर परसादी मनु जिणै हरि सेती लिव लाइ ॥
नानक गुरमुखि सचु कमावै मनमुखि आवै जाइ ॥2॥87॥

 सतिगुरु सेवे आपणा

सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥
विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥1॥88॥

 मनु वेकारी वेड़िआ

मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥
दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥
आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥
जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥
नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥2॥88॥

 सतिगुरु जिनी न सेविओ

सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जमै होइ खुआरु ॥
सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥
सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥
सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥
नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥1॥88॥

 सो भगउती जो भगवंतै जाणै

सो भगउती जो भगवंतै जाणै ॥
गुर परसादी आपु पछाणै ॥
धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥
जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥
ऐसा भगउती उतमु होइ ॥
नानक सचि समावै सोइ ॥2॥88॥

 अंतरि कपटु भगउती कहाए

अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥
पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥
पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥
बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥
सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥
अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥
हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥
पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥
नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥3॥88॥

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