श्लोक-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji-3

श्लोक-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji-3

कबीर सात समुंदहि मसु करउ कलम करउ बनराइ ॥
बसुधा कागदु जउ करउ हरि जसु लिखनु न जाइ ॥८१॥

कबीर जाति जुलाहा किआ करै हिरदै बसे गुपाल ॥
कबीर रमईआ कंठि मिलु चूकहि सरब जंजाल ॥८२॥

कबीर ऐसा को नही मंदरु देइ जराइ ॥
पांचउ लरिके मारि कै रहै राम लिउ लाइ ॥८३॥

कबीर ऐसा को नही इहु तनु देवै फूकि ॥
अंधा लोगु न जानई रहिओ कबीरा कूकि ॥८४॥

कबीर सती पुकारै चिह चड़ी सुनु हो बीर मसान ॥
लोगु सबाइआ चलि गइओ हम तुम कामु निदान ॥८५॥

कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥
जो जैसी संगति मिलै सो तैसो फलु खाइ ॥८६॥

कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥
सोई फिरि कै तू भइआ जा कउ कहता अउरु ॥८७॥

कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥
उह झूलै उह चीरीऐ साकत संगु न हेरि ॥८८॥

कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥
अपने भारहि ना डरै आगै अउघट घाट ॥८९॥

कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥
मति बसि परउ लुहार के जारै दूजी बार ॥९०॥

कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥
चारि मरंतह छह मूए चारि पुरख दुइ नारि ॥९१॥
कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥
जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने अउर ॥९२॥

कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥
साकत संगु न कीजीऐ जा ते होइ बिनाहु ॥९३॥

कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥
जिन हरि का नामु न चेतिओ बादहि जनमें आइ ॥९४॥

कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥
नरकि परहि ते मानई जो हरि नाम उदास ॥९५॥

कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥
चाले थे हरि मिलन कउ बीचै अटकिओ चीतु ॥९६॥

कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥
जिह जिह डाली पगु धरउ सोई मुरि मुरि जाइ ॥९७॥

कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥
रासि बिरानी राखते खाया घर का खेतु ॥९८॥

कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥
होनहारु सो होइहै साकत संगि न जाउ ॥९९॥

कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥
साकत कारी कांबरी धोए होइ न सेतु ॥१००॥

कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥
जो किछु कीआ सो मन कीआ मूंडा मूंडु अजांइ ॥१०१॥

कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥
चरन कमल चितु बेधिआ रामहि नामि समाउ ॥१०२॥

कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥
जंतु बिचारा किआ करै चले बजावनहार ॥१०३॥

कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥
आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाइ ॥१०४॥

कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥
परगट भए निदान सभ जब पूछे धरम राइ ॥१०५॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुट्मबु ॥
धंधा करता रहि गइआ भाई रहिआ न बंधु ॥१०६॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥
सरपनि होइ कै अउतरै जाए अपुने खाइ ॥१०७॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥
गदही होइ कै अउतरै भारु सहै मन चारि ॥१०८॥

कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥
सूरी ऊपरि खेलना गिरै त ठाहर नाहि ॥१०९॥

कबीर सोई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥
देही किस की बापुरी पवित्रु होइगो ग्रामु ॥११०॥

कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥
जिह कुल दासु न ऊपजै सो कुल ढाकु पलासु ॥१११॥

कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥
इआ सुख ते भिख्या भली जउ हरि सिमरत दिन जाहि ॥११२॥

कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥
कोई काहू को नही सभ देखी ठोकि बजाइ ॥११३॥

मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥
जोति बिना जगदीस की जगतु उलंघे जाइ ॥११४॥

बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥
हरि का सिमरनु छाडि कै घरि ले आया मालु ॥११५॥

कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥
पाछै पाउ न दीजीऐ आगै होइ सु होइ ॥११६॥

कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥
जैहहि आटा लोन जिउ सोन समानि सरीरु ॥११७॥

कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥
अजहू जीउ न छोडई रंकाई नैनाह ॥११८॥

कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥
बैन उचरउ तुअ नाम जी चरन कमल रिद ठाउ ॥११९॥

कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥
चरन कमल की मउज महि रहउ अंति अरु आदि ॥१२०॥

कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥
कहिबे कउ सोभा नही देखा ही परवानु ॥१२१॥

कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥
हरि जैसा तैसा उही रहउ हरखि गुन गाइ ॥१२२॥

 

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