श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 1

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 1

(माई) आजु हो बधायौ बाजै नंद गोप-राइ कै

(माई) आजु हो बधायौ बाजै नंद गोप-राइ कै ।
जदुकुल-जादौराइ जनमे हैं आइ कै ॥
आनंदित गोपी-ग्वाल नाचैं कर दै-दै ताल, अति अहलाद भयौ जसुमति माइ कै ।
सिर पर दूब धरि , बैठे नंद सभा-मधि , द्विजनि कौं गाइ दीनी बहुत मँगाइ कै ॥
कनक कौ माट लाइ, हरद-दही मिलाइ, छिरकैं परसपर छल-बल धाइ कै ।
आठैं कृष्न पच्छ भादौं, महर कैं दधि कादौं, मोतिनि बँधायौ बार महल मैं जाइ कै ॥
ढाढ़ी और ढ़ाढ़िनि गावैं, ठाढ़ै हुरके बजावैं, हरषि असीस देत मस्तक नवाइ कै ।
जोइ-जोइ माँग्यौ जिनि, सोइ-सोइ पायो तिनि, दीजै सूरदास दर्स भक्तनि बुलाइ कै ॥

आजु बधाई नंद कैं माई

आजु बधाई नंद कैं माई । ब्रज की नारि सकल जुरि आई ॥
सुंदर नंद महर कैं मंदिर । प्रगट्यौ पूत सकल सुख- कंदर ॥
जसुमति-ढोटा ब्रज की सोभा । देखि सखी, कछु औरैं गोभा ॥
लछिमी- सी जहँ मालिनि बोलै । बंदन-माला बाँधत डोलै ॥
द्वार बुहाराति फिरति अष्ट सिधि । कौरनि सथिया चीततिं नवनिधि ॥
गृह-गृह तैं गोपी गवनीं जब । रंग-गलिनि बिच भीर भई तब ॥
सुबरन-थार रहे हाथनि लसि । कमलनि चढ़ि आए मानौ ससि ॥
उमँगी -प्रेम-नदी-छबि पावै । नंद-सदन-सागर कौं धावैं ॥
कंचन-कलस जगमगैं नग के । भागे सकल अमंगल जग के ॥
डोलत ग्वाल मनौ रन जीते । भए सबनि के मन के चीते ॥
अति आनंद नंद रस भीने । परबत सात रतन के दीने ॥
कामधेनु तैं नैंकु न हीनी । द्वै लख धेनु द्विजनि कौं दीनी ॥
नंद-पौरि जे जाँचन आए । बहुरौ फिरि जाचक न कहाए ॥
घर के ठाकुर कैं सुत जायौ । सूरदास तब सब सुख पायौ ॥

राग जैतश्री

आजु गृह नंद महर कैं बधाइ

आजु गृह नंद महर कैं बधाइ ।
प्रात समय मोहन मुख निरखत, कोटि चंद-छबि पाइ ॥
मिलि ब्रज-नागरि मंगल गावतिं, नंद-भवन मैं आइ ।
देतिं असीस, जियौ जसुदा-सुत कोटिनि बरष कन्हाइ ॥
अति आनंद बढ्यौ गोकुल मैं, उपमा कही न जाइ ।
सूरदास धनि नँद की घरनी, देखत नैन सिराइ ॥

राग बिलावल

आजु तौ बधाइ बाजै मंदिर महर के

(माई) आजु तौ बधाइ बाजै मंदिर महर के ।
फूले फिरैं गोपी-ग्वाल ठहर ठहर के ॥
फूली फिरैं धेनु धाम, फूली गोपी अँग अँग ।
फूले फरे तरबर आनँद लहर के ॥
फूले बंदीजन द्वारे, फूले फूले बंदवारे ।
फूले जहाँ जोइ सोइ गोकुल सहर के ॥
फूलैं फिरैं जादौकुल आनँद समूल मूल ।
अंकुरित पुन्य फूले पाछिले पहर के ॥
उमँगे जमुन-जल, प्रफुलित कुंज-पुंज ।
गरजत कारे भारे जूथ जलधर के ॥
नृत्यत मदन फूले, फूली, रति अँग अँग ।
मन के मनोज फूले हलधर वर के ॥
फूले द्विज-संत-बेद, मिटि गयौ कंस-खेद ।
गावत बधाइ सूर भीतर बहर के ॥
फूली है जसोदा रानी, सुत जायौ सार्ङ्गपानी ।
भूपति उदार फूले भाग फरे घर के ॥

 कनक-रतन-मनि पालनौ

कनक-रतन-मनि पालनौ, गढ़्यौ काम सुतहार ।
बिबिध खिलौना भाँति के (बहु) जग-मुक्ता चहुँधार ॥
जननि उबटि न्हवाइ कै (सिसु) क्रम सौं लीन्है गोद ।
पौढ़ाए पट पालनैं (हँसि) निरखि जननि मन-मोद ॥
अति कोमल दिन सात के (हो) अधर चरन कर लाल ।
सूर स्याम छबि अरुनता (हो) निरखि हरष ब्रज-बाल ॥

राग जैतश्री

 जसोदा हरि पालनैं झुलावै

जसोदा हरि पालनैं झुलावै ।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-जोइ कछु गावै॥
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै ।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै ।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि-करि सैन बतावै॥
इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै ।
जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नँद-भामिनि पावै॥

राग धनाश्री

पलना स्याम झुलावती जननी

पलना स्याम झुलावती जननी ।
अति अनुराग पुरस्सर गावति, प्रफुलित मगन होति नँद-घरनी ॥
उमँगि-उमँगि प्रभु भुजा पसारत, हरषि जसोमति अंकम भरनी ।
सूरदास प्रभु मुदित जसोदा, पुरन भई पुरातन करनी ॥

राग कान्हरौ

पालनैं गोपाल झुलावैं

पालनैं गोपाल झुलावैं ।
सुर मुनि देव कोटि तैंतीसौ कौतुक अंबर छावैं ॥
जाकौ अन्त न ब्रह्मा जाने, सिव सनकादि न पावैं ।
सो अब देखो नन्द जसोदा, हरषि हरषि हलरावैं ॥
हुलसत हँसत करत किलकारी मन अभिलाष बढावैं ।
सूर श्याम भक्तन हित कारन नाना भेष बनावैं ॥

राग बिलावल

हालरौ हलरावै माता

हालरौ हलरावै माता ।
बलि बलि जाऊँ घोष सुख दाता ॥
जसुमति अपनो पुन्य बिचारै ।
बार बार सिसु बदन निहारै ॥
अँग फरकाइ अलप मुसकाने ।
या छबि की उपना को जानै ॥
हलरावति गावति कहि प्यारे ।
बाल दसा के कौतुक भारे ॥
महरि निरखि मुख हिय हुलसानी।
सूरदास प्रभु सारंगपानी।।

राग गौरी

कन्हैया हालरु रे

कन्हैया हालरु रे ।
गढ़ि गुढ़ि ल्यायौ बढ़ई, धरनी पर डोलाइ, बलि हालरु रे ॥
इक लख माँगे बढ़ई, दुइ लख नंद जु देहिं बलि हालरु रे ।
रतन जटित बर पालनौ, रेसम लागी डोर, बलि हालरु रे ॥
कबहुँक झूलै पालना, कबहुँ नंद की गोद, बलि हालरु रे ।
झूलै सखी झुलावहीं, सूरदास बलि जाइ, बलि हालरु रे ॥

राग धनाश्री

नैंकु गोपालहिं मोकौं दै री

नैंकु गोपालहिं मोकौं दै री ।
देखौं बदन कमल नीकैं करि, ता पाछैं तू कनियाँ लै री ॥
अति कोमल कर-चरन-सरोरुह, अधर-दसन-नासा सोहै री ।
लटकन सीस, कंठ मनि भ्राजत, मनमथ कोटि बारने गै री ॥
बासर-निसा बिचारति हौं सखि, यह सुख कबहुँ न पायौ मै री ।
निगमनि-धन, सनकादिक-सरबस, बड़े भाग्य पायौ है तैं री ।
जाकौ रूप जगत के लोचन, कोटि चंद्र-रबि लाजत भै री ।
सूरदास बलि जाइ जसोदा गोपिनि-प्रान, पूतना-बैरी ॥

राग बिहागरौ

आदि सनातन, हरि अबिनासी

आदि सनातन, हरि अबिनासी । सदा निरंतर घठ घट बासी ॥
पूरन ब्रह्म, पुरान बखानैं । चतुरानन, सिव अंत न जानैं ॥
गुन-गन अगम, निगम नहिं पावै । ताहि जसोदा गोद खिलावै ॥
एक निरंतर ध्यावै ज्ञानी । पुरुष पुरातन सो निर्बानी ॥
जप-तप-संजम ध्यान न आवै । सोई नंद कैं आँगन धावै ॥
लोचन-स्रवन न रसना-नासा । बिनु पद-पानि करै परगासा ॥
बिस्वंभर निज नाम कहावै । घर-घर गोरस सोइ चुरावै ॥
सुक-सारद- से करत बिचारा । नारद-से पावहिं नहिं पारा ॥
अबरन-बरन सुरनि नहिं धारै । गोपिन के सो बदन निहारै ॥
जरा-मरन तैं रहित, अमाया । मातु-पिता, सुत, बंधु न जाया ॥
ज्ञान-रूप हिरदै मैं बोलै । सो बछरनि के पाछैं डोलै ॥
जल, धर, अनिल, अनल, नभ, छाया । पंचतत्त्व तैं जग उपजाया ॥
माया प्रगटि सकल जग मोहै । कारन-करन करै सो सोहै ॥
सिव-समाधि जिहि अंत न पावै । सोइ गोप की गाइ चरावै ॥
अच्युत रहै सदा जल-साई । परमानंद परम सुखदाई ॥
लोक रचे राखैं अरु मारे । सो ग्वालनि सँग लीला धारै ॥
काल डरै जाकैं डर भारी । सो ऊखल बाँध्यौ महतारी ॥
गुन अतीत, अबिगत, न जनावै । जस अपार, स्रुति पार न पावै ॥
जाकी महिमा कहत न आवै । सो गोपिन सँग रास रचावै ॥
जाकी माया लखै न कोई । निर्गुन-सगुन धरै बपु सोई ॥
चौदह भुवन पलक मैं टारै । सो बन-बीथिन कुटी सँवारै ॥
चरन-कमल नित रमा पलौवै । चाहति नैंकु नैन भरि जोवै ॥
अगम, अगोचर, लीला-धारी । सो राधा-बस कुंज-बिहारी ॥
बड़भागी वै सब ब्रजबासी । जिन कै सँग खेलैं अबिनासी ॥
जो रस ब्रह्मादिक नहिं पावैं । सो रस गोकुल-गलिनि बहावैं ॥
सूर सुजस ब्रह्मादिक नहिं पावैं । सो रस गोकुल-गलिनि बहावैं ॥
सूर सुजस कहि कहा बखानै । गोबिंद की गति गोबिंद जानै ॥

राग गौड़ मलार

बाल-बिनोद भावती लीला, अति पुनीत मुनि भाषी

बाल-बिनोद भावती लीला, अति पुनीत मुनि भाषी।
सावधान ह्वै सुनौ परीच्छित, सकल देव मुनि साखी ॥
कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला।
कालनेमि खल उग्रसेन कुल उपज्यौ कंस भुवाला ॥
आदिब्रह्म जननी सुर-देवी, नाम देवकी बाला।
दई बिबाहि कंस बसुदेवहिं, दुख-भंजन सुख-माला ॥
हय गय रतन हेम पाटंबर, आनँद मंगलचारा।
समदत भई अनाहत बानी, कंस कान झनकारा ॥
याकी कोखि औतरै जो सुत, करै प्रान परिहारा।
रथ तैं उतरि, केस गहि राजा, कियौ खंग पटतारा ॥
तब बसुदेव दीन ह्वै भाष्यौ, पुरुष न तिय-बध करई।
मोकौं भई अनाहत बानी, तातैं सोच न टरई ॥
आगैं बृच्छ फरै जो बिष-फल, बृच्छ बिना किन सरई।
याहि मारि, तोहिं और बिबाहौं, अग्र सोच क्यों मरई ॥
यह सुनि सकल देव-मुनि भाष्यौ, राय न ऐसी कीजै।
तुम्हरे मान्य बसुदेव-देवकी, जीव-दान इहिं दीजै ॥
कीन्यौ जग्य होत है निष्फल, कह्यौ हमारौ कीजै।
याकैं गर्भ अवतरैं जे सुत, सावधान ह्वै लीजै ॥
पहिलै पुत्र देवकी जायौ, लै बसुदेव दिखायौ।
बालक देखि कंस हँसि दीन्यौ, सब अपराध छमायौ ॥
कंस कहा लरिकाई कीनी, कहि नारद समुझायौ।
जाकौ भरम करत हौ राजा, मति पहिलै सो आयौ ॥
यह सुनि कंस पुत्र फिरि माग्यौ, इहिं बिधि सबन सँहारौं।
तब देवकी भई अति ब्याकुल, कैसैं प्रान प्रहारौं ॥
कंस बंस कौ नास करत है, कहँ लौं जीव उबारौं।
यह बिपदा कब मेटहिं श्रीपति अरु हौं काहिं पुकारौं ॥
धेनु-रूप धरि पुहुमि पुकारी, सिव-बिरंचि कैं द्वारा।
सब मिलि गए जहाँ पुरुषोत्तम, जिहिं गति अगम अपारा ॥
छीर-समुद्र-मध्य तैं यौं हरि, दीरघ बचन उचारा।
उधरौं धरनि, असुर-कुल मारौं, धरि नर-तन-अवतारा ॥
सुर, नर, नाग तथा पसु-पच्छी, सब कौं आयसु दीन्हौं।
गोकुल जनम लेहु सँग मेरैं, जो चाहत सुख कीन्हौ ॥
जेहिं माया बिरंचि-सिव मोहे, वहै बानि करि चीन्हो।
देवकि गर्भ अकर्षि रोहिनी, आप बास करि लीन्हौ ॥
हरि कैं गर्भ-बास जननी कौ बदन उजारौ लाग्यौ।
मानहुँ सरद-चंद्रमा प्रगट्यौ, सोच-तिमिर तन भाग्यौ ॥
तिहिं छन कंस आनि भयौ ठाढ़ौ, देखि महातम जाग्यौ।
अब की बार आपु आयौ है अरी, अपुनपौ त्याग्यौ ॥
दिन दस गएँ देवकी अपनौ बदन बिलोकन लागी।
कंस-काल जिय जानि गर्भ मैं, अति आनंद सभागी ॥
मुनि नर-देव बंदना आए, सोवत तैं उठि जागी।
अबिनासी कौ आगम जान्यौ, सकल देव अनुरागी ॥
कछु दिन गएँ गर्भ कौ आलस, उर-देवकी जनायौ।
कासौं कहौं सखी कोऊ नाहिंन , चाहति गर्भ दुरायौ ॥
बुध रोहिनी-अष्टमी-संगम, बसुदेव निकट बुलायौ।
सकल लोकनायक, सुखदायक, अजन, जन्म धरि आयौ ॥
माथैं मुकुट, सुभग पीतांबर, उर सोभित भृगु-रेखा।
संख-चक्र-गदा-पद्म बिराजत, अति प्रताप सिसु-भेषा ॥
जननी निरखि भई तन ब्याकुल, यह न चरित कहुँ देखा।
बैठी सकुचि, निकट पति बोल्यौ, दुहुँनि पुत्र-मुख पेखा ॥
सुनि देवकि ! इक आन जन्म की, तोकौं कथा सुनाऊँ।
तैं माँग्यौ, हौं दियौ कृपा करि, तुम सौ बालक पाऊँ ॥
सिव-सनकादि आदि ब्रह्मादिक ज्ञान ध्यान नहीं आऊँ।
भक्तबछल बानौ है मेरौ, बिरुदहिं कहा लजाऊँ ॥
यह कहि मया मोह अरुझाए, सिसु ह्वै रोवन लागे।
अहो बसुदेव, जाहु लै गोकुल, तुम हौ परम सभागे ॥
घन-दामिनि धरती लौं कौंधै, जमुना-जल सौं पागै।
आगैं जाउँ जमुन-जल गहिरौ, पाछैं सिंह जु लागे ॥
लै बसुदेव धँसे दह सूधे, सकल देव अनुरागे।
जानु, जंघ,कटि,ग्रीव, नासिका, तब लियौ स्याम उछाँगे ॥
चरन पसारि परसि कालिंदी, तरवा तीर तियागे।
सेष सहस फन ऊपर छायौ, लै गोकुल कौं भागे ॥
पहुँचे जाइ महर-मंदिर मैं, मनहिं न संका कीनी।
देखी परी योगमाया, वसुदेव गोद करि लीनी ॥
लै बसुदेव मधुपुरी पहुँचे, प्रगट सकल पुर कीनी।
देवकी-गर्भ भई है कन्या, राइ न बात पतीनी ॥
पटकत सिला गई, आकासहिं दोउ भुज चरन लगाई।
गगन गई, बोली सुरदेवी, कंस, मृत्यु नियराई ॥
जैसैं मीन जाल मैं क्रीड़त, गनै न आपु लखाई।
तैसैंहि, कंस, काल उपज्यौ है, ब्रज मैं जादवराई ॥
यह सुनि कंस देवकी आगैं रह्यौ चरन सिर नाई।
मैं अपराध कियौ, सिसु मारे, लिख्यौ न मेट्यौ जाई ॥
काकैं सत्रु जन्म लीन्यौ है, बूझै मतौ बुलाई।
चारि पहर सुख-सेज परे निसि, नेकु नींद नहिं आई ॥
जागी महरि, पुत्र-मुख देख्यौ, आनंद-तूर बजायौ।
कंचन-कलस, होम, द्विज-पूजा, चंदन भवन लिपायौ ॥
बरन-बरन रँग ग्वाल बने, मिलि गोपिनि मंगल गायौ।
बहु बिधि ब्योम कुसुम सुर बरषत, फुलनि गोकुल छायौ ॥
आनँद भरे करत कौतूहल, प्रेम-मगन नर-नारी।
निर्भर अभय-निसान बजावत, देत महरि कौं गारी ॥
नाचत महर मुदित मन कीन्हैं, ग्वाल बजावत तारी।
सूरदास प्रभु गोकुल प्रगटे, मथुरा-गर्व-प्रहारी ॥

राग सारंग

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