श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 9

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 9

बातनिहीं सुत लाइ लियौ

बातनिहीं सुत लाइ लियौ ।
तब लौं मधि दधि जननि जसोदा, माखन करि हरि हाथ दियौ ॥
लै-लै अधर परस करि जेंवत, देखत फूल्यौ मात-हियौ ।
आपुहिं खात प्रसंसत आपुहिं, माखन-रोटी बहुत प्रियौ ॥
जो प्रभु सिव-सनकादिक दुर्लभ, सुत हित जसुमति-नंद कियौ ।
यह सुख निरखत सूरज प्रभु कौ, धन्य-धन्य पल सुफल जियौ ॥

दधि-सुत जामे नंद-दुवार

दधि-सुत जामे नंद-दुवार ।
निरखि नैन अरुझ्यौ मनमोहन, रटत देहु कर बारंबार ॥
दीरघ मोल कह्यौ ब्यौपारी, रहे ठगे सब कौतुक हार ।
कर ऊपर लै राखि रहे हरि, देत न मुक्ता परम सुढार ॥
गोकुलनाथ बए जसुमति के आँगन भीतर, भवन मँझार ।
साखा-पत्र भए जल मेलत , फुलत-फरत न लागी भार ॥
जानत नहीं मरम सुर-नर-मुनि, ब्रह्मादिक नहिं परत बिचार ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, ब्रज-बनिता पहिरे गुहि हार ॥

राग धनाश्री

कजरी कौ पय पियहु लाल

कजरी कौ पय पियहु लाल,जासौं तेरी बेनि बढ़ै ।
जैसैं देखि और ब्रज-बालक, त्यौं बल-बैस चढ़ै ॥
यह सुनि कै हरि पीवन लागे, ज्यों-ज्यों लयौ लड़ै ।
अँचवत पय तातौ जब लाग्यौ, रोवत जीभि डढ़ै ॥
पुनि पीवतहीं कच टकटोरत, झूठहिं जननि रढ़ै ।
सूर निरखि मुख हँसति जसोदा, सो सुख उर न कड़ै ॥

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी ?
किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी ॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी ।
काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी ॥
काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी ।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी ॥

राग रामकली

मैया, मोहि बड़ो कर लै री

मैया, मोहि बड़ो कर लै री ।
दूध-दही-घृत-माखन-मेवा, जो मांगौ सो दै री ॥
कछु हौंस राखै जनि मेरी, जोइ-जोइ मोहि रुचै री ।
होऊँ बेगि मैं सबल सबनि मैं, सदा रहौं निरभै री ॥
रंगभूमि मैं कंस पछारौं, घीसि बहाऊँ बैरी ।
सूरदास स्वामी की लीला, मथुरा राखौं जै री ॥

राग सारंग

हरि अपनैं आँगन कछु गावत

हरि अपनैं आँगन कछु गावत ।
तनक-तनक चरननि सौ नाचत, मनहीं मनहि रिझावत॥
बाँह उठाइ काजरी-धौरी गैयनि टेरि बुलावति ।
कबहुँक बाबा नंद पुकारत, कबहुँक घर मैं आवत ॥
माखन तनक आपनैं कर लै, तनक बदन मैं नावत ।
कबहुँ चितै प्रतिबिंब खंभ लौनी लिए खवावत ॥
दुरि देखति जसुमति यह लीला, हरष अनंद बढ़ावत ।
सूर स्याम के बाल-चरित, नित-नितहीं देखत भावत ॥

राग रामकली

आजु सखी, हौं प्रात समय दधि मथन उठी

आजु सखी, हौं प्रात समय दधि मथन उठी अकुलाइ ।
भरि भाजन मनि-खंभ निकट धरि, नेति लई कर जाइ ॥
सुनत सब्द तिहिं छिन समीप मम हरि हँसि आए धाइ ।
मोह्यौ बाल-बिनोद-मोद अति, नैननि नृत्य दिखाइ ॥
चितवनि चलनि हर्‌यौ चित चंचल, चितै रही चित लाइ ।
पुलकत मन प्रतिबिंब देखि कै, सबही अंग सुहाइ ॥
माखन-पिंड बिभागि दुहूँ कर, मेलत मुख मुसुकाइ ।
सूरदास-प्रभु-सिसुता को सुख, सकै न हृदय समाइ ॥

राग बिलावल

बलि-बलि जाउँ मधुर सुर गावहु

बलि-बलि जाउँ मधुर सुर गावहु ।
अब की बार मेरे कुँवर कन्हैया, नंदहि नाच दिखावहु ॥
तारी देहु आपने कर की, परम प्रीति उपजावहु ।
आन जंतु धुनि सुनि कत डरपत, मो भुज कंठ लगावहु ॥
जनि संका जिय करौ लाल मेरे, काहे कौं भरमावहु ।
बाँह उचाइ काल्हि की नाईं धौरी धेनु बुलावहु ॥
नाचहु नैकु, जाऊँ बलि तेरी, मेरी साध पुरावहु ।

पाहुनी, करि दै तनक मह्यौ

पाहुनी, करि दै तनक मह्यौ ।
हौं लागी गृह-काज-रसोई , जसुमति बिनय कह्यौ ॥
आरि करत मनमोहन मेरो, अंचल आनि गह्यौ ।
ब्याकुल मथति मथनियाँ रीती, दधि भुव ढरकि रह्यौ ॥
माखन जात जानि नँदरानी, सखी सम्हारि कह्यौ ।
सूर स्याम-मुख निरखि मगन भइ, दुहुनि सँकोच सह्यौ ॥

राग-धनाश्री

मोहन, आउ तुम्हैं अन्हवाऊँ

मोहन, आउ तुम्हैं अन्हवाऊँ ।
जमुना तैं जल भरि लै आऊँ, ततिहर तुरत चढ़ाऊँ ॥
केसरि कौ उबटनौ बनाऊँ, रचि-रचि मैल छुड़ाऊँ ।
सूर कहै कर नैकु जसोदा, कैसैहुँ पकरि न पाऊँ ॥

राग बिलावल

जसुमति जबहिं कह्यौ अन्वावन

जसुमति जबहिं कह्यौ अन्वावन, रोइ गए हरि लोटत री ।
तेल उबटनौं लै आगैं धरि, लालहिं चोटत-पोटत री ॥
मैं बलि जाउँ न्हाउ जनि मोहन, कत रोवत बिनु काजैं री ।
पाछैं धरि राख्यौ छपाइ कै उबटन-तेल-समाजैं री ॥
महरि बहुत बिनती करि राखति, मानत नहीं कन्हैया री ।
सूर स्याम अतिहीं बिरुझाने, सुर-मुनि अंत न पैया री ॥

राग आसावरी

ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं

ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, हरिहि लिये चंदा दिखरावत ।
रोवत कत बलि जाउँ तुम्हारी, देखौ धौं भरि नैन जुड़ावत ॥
चितै रहे तब आपुन ससि-तन, अपने के लै-लै जु बतावत ।
मीठौ लगत किधौं यह खाटौ, देखत अति सुंदर मन भावत ॥
मन-हीं-मन हरि बुद्धि करत हैं, माता सौं कहि ताहि मँगावत ।
लागी भूख, चंद मैं खैहौं, देहि-देहि रिस करि बिरुझावत ॥
जसुमति कहती कहा मैं कीनौं, रोवत मोहन अति दुख पावत ।
सूर स्याम कौं जसुमति बोधति, गगन चिरैयाँ उड़त दिखावत ॥

राग कान्हरौ

किहिं बिधि करि कान्हहिं समुजैहौं

किहिं बिधि करि कान्हहिं समुझैहौं ?
मैं ही भूलि चंद दिखरायौ, ताहि कहत मैं खैहौं !
अनहोनी कहुँ भई कन्हैया, देखी-सुनी न बात ।
यह तौ आहि खिलौना सब कौ, खान कहत तिहि तात !
यहै देत लवनी नित मोकौं, छिन छिन साँझ-सवारे ।
बार-बार तुम माखन माँगत, देउँ कहाँ तैं प्यारे ?
देखत रहौ खिलौना चंदा, आरि न करौ कन्हाई ।
सूर स्याम लिए हँसति जसोदा, नंदहि कहति बुझाई ॥

लाल हो, ऐसी आरि न कीजै

(आछे मेरे) लाल हो, ऐसी आरि न कीजै ।
मधु-मेवा-पकवान-मिठाई जोइ भावै सोइ लीजै ॥
सद माखन घृत दह्यौ सजायौ, अरु मीठौ पय पीजै ।
पा लागौं हठ अधिक करौ जनि, अति रिस तैं तन छीजै ॥
आन बतावति, आन दिखावति, बालक तौ न पतीजै ।
खसि-खसि परत कान्ह कनियाँ तैं, सुसुकि-सुसुकि मन खीजै ॥
जल -पुटि आनि धर्‌यौ आँगन मैं, मोहन नैकु तौ लीजै ।
सूर स्याम हठी चंदहि माँगै, सु तौ कहाँ तैं दीजै ॥

राग-धनाश्री

बार-बार जसुमति सुत बोधति

बार-बार जसुमति सुत बोधति, आउ चंद तोहि लाल बुलावै ।
मधु-मेवा-पकवान-मिठाई, आपुन खैहै, तोहि खवावै ॥
हाथहि पर तोहि लीन्हे खेलै नैकु नहीं धरनी बैठावै ।
जल-बासन कर लै जु उठावति, याही मैं तू तन धरि आवै ॥
जल-पुटि आनि धरनि पर राख्यौ, गहि आन्यौ वह चंद दिखावै ।
सूरदास प्रभु हँसि मुसुक्याने, बार-बार दोऊ कर नावै ॥

राग-कान्हरौ

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