श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 8

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 8

जसोदा, तेरौ चिरजीवहु गोपाल

जसोदा, तेरौ चिरजीवहु गोपाल ।
बेगि बढ़ै बल सहित बिरध लट, महरि मनोहर बाल ॥
उपजि परयौ सिसु कर्म-पुन्य-फल, समुद-सीप ज्यौं लाल ।
सब गोकुल कौ प्रान-जीवन-धन, बैरिन कौ उर-साल ॥
सूर कितौ सुख पावत लोचन, निरखत घुटुरुनि चाल ।
झारत रज लागे मेरी अँखियनि रोग-दोष-जंजाल ॥

राग धनाश्री

मैं मोही तेरैं लाल री

मैं मोही तेरैं लाल री ।
निपट निकट ह्वै कै तुम निरखौ, सुंदर नैन बिसाल री ॥
चंचल दृग अंचल पट दुति छबि, झलकत चहुँ दिसि झाल री ।
मनु सेवाल कमल पर अरुझे, भँवत भ्रमर भ्रम-चाल री ॥
मुक्ता-बिद्रुम-नील-पीत–मनि, लटकत लटकन भाल री ।
मानौ सुक्र-भौम-सनि-गुरु मिलि, ससि कैं बीच रसाल री ॥
उपमा बरनि न जाइ सखी री, सुंदर मदन-गोपाल री ।
सूर स्याम के ऊपर वारै तन-मन-धन ब्रजबाल री ॥

कल बल कै हरि आरि परे

कल बल कै हरि आरि परे ।
नव रँग बिमल नवीन जलधि पर, मानहुँ द्वै ससि आनि अरे ॥
जे गिरि कमठ सुरासुर सर्पहिं धरत न मन मैं नैंकु डरे ।
ते भुज भूषन-भार परत कर गोपिनि के आधार धरे ॥
सूर स्याम दधि-भाजन-भीतर निरखत मुख मुख तैं न टरे ।
बिबि चंद्रमा मनौ मथि काढ़े, बिहँसनि मनहुँ प्रकास करे ॥

राग बिलावल

जब दधि-मथनी टेकि अरै

जब दधि-मथनी टेकि अरै ।
आरि करत मटुकी गहि मोहन, वासुकि संभु डरै ॥
मंदर डरत, सिंधु पुनि काँपत, फिरि जनि मथन करै ।
प्रलय होइ जनि गहौं मथानी, प्रभु मरजाद टरै ॥
सुर अरु असुर ठाढ़ै सब चितवत, नैननि नीर ढरै ।
सूरदास मन मुग्ध जसोदा, मुख दधि-बिंदु परै ॥

जब दधि-रिपु हाथ लियौ

जब दधि-रिपु हाथ लियौ ।
खगपति-अरि डर, असुरनि-संका, बासर-पति आनंद कियौ ॥
बिदुखि-सिंधु सकुचत, सिव सोचत, गरलादिक किमि जात पियौ ?
अति अनुराग संग कमला-तन, प्रफुलित अँग न समात हियौ ।
एकनि दुख, एकनि सुख उपजत, ऐसौ कौन बिनोद कियौ ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे गहत ही एक-एक तैं होत बियौ ॥

राग बिलावल

जब मोहन कर गही मथानी

जब मोहन कर गही मथानी ।
परसत कर दधि-माट, नेति, चित उदधि, सैल, बासुकि भय मानी ॥
कबहुँक तीनि पैग भुव मापत, कबहुँक देहरि उलँघि न जानी !
कबहुँक सुर-मुनि ध्यान न पावत, कबहुँ खिलावति नंद की रानी !
कबहुँक अमर-खीर नहिं भावत, कबहुँक दधि-माखन रुचि मानी ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, परति न महिमा सेष बखानी ॥

राग धनाश्री

 नंद जू के बारे कान्ह, छाँड़ि दै मथनियाँ

नंद जू के बारे कान्ह, छाँड़ि दै मथनियाँ ।
बार-बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ ॥
नैकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ ।
आरि जनि करौ, बलि-बलि जाउँ हौं निधनियाँ ॥
जाकौ ध्यान धरैं सबै, सुर-नर-मुनि जनियाँ ।
ताकौ नँदरानी मुख चूमै लिए कनियाँ ॥
सेष सहस आनन गुन गावत नहिं बनियाँ ।
सूर स्याम देखि सबै भूली गोप-धनियाँ ॥

राग बिलावल

जसुमति दधि मथन करति

जसुमति दधि मथन करति, बैठे बर धाम अजिर,
ठाढ़ै हरि हँसत नान्हि दँतियनि छबि छाजै ।
चितवत चित लै चुराइ, सोभा बरनि न जाइ,
मनु मुनि-मन-हरन-काज मोहिनी दल साजै ॥
जननि कहति नाचौ तुम, दैहौं नवनीत मोहन,
रुनक-झुनक चलत पाइ, नूपुर-धुनि बाजै ।
गावत गुन सूरदास, बढ्यौ जस भुव-अकास,
नाचत त्रैलोकनाथ माखन के काजै ॥

आनँद सौं, दधि मथति जसोदा

(एरी) आनँद सौं, दधि मथति जसोदा, घमकि मथनियाँ घूमै ।
निरतत लाल ललित मोहन, पग परत अटपटे भू मैं ॥
चारु चखौड़ा पर कुंचित कच, छबि मुक्ता ताहू मैं ।
मनु मकरंद-बिंदु लै मधुकर, सुत प्यावन हित झूमै ॥
बोलत स्याम तोतरी बतियाँ, हँसि-हँसि दतियाँ दूमै ।
सूरदास वारी छबि ऊपर, जननि कमल-मुख चूमै ॥

राग आसावरी

त्यौं-त्यौं मोहन नाचै ज्यौं-ज्यौं रई

त्यौं-त्यौं मोहन नाचै ज्यौं-ज्यौं रई-घमरकौ होइ (री) ।
तैसियै किंकिनि-धुनि पग-नूपुर, सहज मिले सुर दोइ (री)॥
कंचन कौ कठुला मनि-मोतिनि, बिच बघनहँ रह्यौ पोइ (री)।
देखत बनै, कहत नहिं आवै, उपमा कौं नहिं कोइ (री)॥
निरखि-निरखि मुख नंद-सुवन कौ, सुर-नर आनँद होइ (री)।
सूर भवन कौ तिमिर नसायौ, बलि गइ जननि जसोइ (री)॥

राग-बिलावल

प्रात समय दधि मथति जसोदा

प्रात समय दधि मथति जसोदा,
अति सुख कमल-नयन-गुन गावति ।
अतिहिं मधुर गति, कंठ सुघर अति,
नंद-सुवन चित हितहि करावति ॥
नील बसन तनु, सजल जलद मनु,
दामिनि बिवि भुज-दंड चलावति ।
चंद्र-बदन लट लटकि छबीली,
मनहुँ अमृत रस ब्यालि चुरावति ॥
गोरस मथत नाद इक उपजत,
किंकिनि-धुनि सनि स्रवन रमावति ।
सूर स्याम अँचरा धरि ठाढ़े,
काम कसौटी कसि दिखरावति ॥

गोद खिलावति कान्ह सुनी

गोद खिलावति कान्ह सुनी, बड़भागिनि हो नँदरानी ।
आनँद की निधि मुख जु लाल कौ, छबि नहिं जाति बखानी ॥
गुन अपार बिस्तार परत नहिं कहि निगमागम-बानी ।
सूरदास प्रभु कौं लिए जसुमति,चितै-चितै मुसुकानी ॥

राग कान्हरौ

कहन लागे मोहन मैया-मैया

कहन लागे मोहन मैया-मैया ॥
नंद महर सौं बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया ॥
ऊँचे चड़ी-चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया ।
दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया ॥
गोपी-व्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति बधैया ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ, चरननि की बलि जैया ॥

राग देवगंधार

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