श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 6

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 6

 

बाल बिनोद खरो जिय भावत

बाल बिनोद खरो जिय भावत ।
मुख प्रतिबिंब पकरिबे कारन हुलसि घुटुरुवनि धावत ॥
अखिल ब्रह्मंड-खंड की महिमा, सिसुता माहिं दुरावत ।
सब्द जोरि बोल्यौ चाहत हैं, प्रगट बचन नहिं आवत ॥
कमल-नैन माखन माँगत हैं करि करि सैन बतावत ।
सूरदास स्वामी सुख-सागर, जसुमति-प्रीति बढ़ावत ॥

राग बिलावल

मैं बलि स्याम, मनोहर नैन

मैं बलि स्याम, मनोहर नैन ।
जब चितवत मो तन करि अँखियन, मधुप देत मनु सैन ॥
कुंचित, अलक, तिलक गोरोचन, ससि पर हरि के ऐन ।
कबहुँक खेलत जात घुटुरुवनि, उपजावत सुख चैन ॥
कबहुँक रोवत-हँसत बलि गई, बोलत मधुरे बैन ।
कबहुँक ठाढ़े होत टेकि कर, चलि न सकत इक गैन ॥
देखत बदन करौं न्यौछावरि, तात-मात सुख-दैन ।
सूर बाल-लीला के ऊपर, बारौं कोटिक मैन ॥

राग सारंग

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत ।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ॥
कनक-भूमि पद कर-पग-छाया, यह उपमा इक राजति ।
करि-करि प्रतिपद प्रति मनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ॥
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति ।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥

राग धनाश्री

 नंद-धाम खेलत हरि डोलत

नंद-धाम खेलत हरि डोलत ।
जसुमति करति रसोई भीतर, आपुन किलकत बोलत ॥
टेरि उठी जसुमति मोहन कौं, आवहु काहैं न धाइ ।
बैन सुनत माता पहिचानी, चले घुटुरुवनि पाइ ॥
लै उठाइ अंचल गहि पोंछै, धूरि भरी सब देह ।
सूरज प्रभु जसुमति रज झारति,कहाँ भरी यह खेह ॥

राग बिलावल

धनि जसुमति बड़भागिनी, लिए कान्ह खिलावै

धनि जसुमति बड़भागिनी, लिए कान्ह खिलावै ।
तनक-तनक भुज पकरि कै, ठाढ़ौ होन सिखावै ॥
लरखतरात गिरि परत हैं, चलि घुटुरुनि धावैं ।
पुनि क्रम-क्रम भुज टेकि कै, पग द्वैक चलावैं ॥
अपने पाइनि कबहिं लौं, मोहिं देखन धावै ।
सूरदास जसुमति इहै बिधि सौं जु मनावै ॥

राग सूहौ बिलावल

हरिकौ बिमल जस गावति गोपंगना

हरिकौ बिमल जस गावति गोपंगना ।
मनिमय आँगन नदराइ कौ, बाल-गोपाल करैं तहँ रँगना ॥
गिरि-गिरि परत घुटुरुवनि रेंगत, खेलत हैं दोउ छगना-मगना ।
धूसरि धूरि दुहूँ तन मंडित, मातु जसोदा लेति उछँगना ॥
बसुधा त्रिपद करत नहिं आलस तिनहिं कठिन भयो देहरी उलँघना ।
सूरदास प्रभु ब्रज-बधु निरखति, रुचिर हार हिय बधना ॥

राग कान्हरौ

चलन चहत पाइनि गोपाल

चलन चहत पाइनि गोपाल ।
लए लाइ अँगुरी नंदरानी, सुंदर स्याम तमाल ॥
डगमगात गिरि परत पानि पर, भुज भ्राजत नँदलाल ।
जनु सिर पर ससि जानि अधोमुख, धुकत नलिनि नमि नाल ॥
धूरि-धौत तन, अंजन नैननि, चलत लटपटी चाल ।
चरन रनित नूपुर-ध्वनि, मानौ बिहरत बाल मराल ॥
लट लटकनि सिर चारु चखौड़ा, सुठि सोभा सिसु भाल ।
सूरदास ऐसौ सुख निरखत, जग जीजै बहु काल ॥

राग सूहौ बिलावल

सिखवति चलन जसोदा मैया

सिखवति चलन जसोदा मैया ।
अरबराइ कर पानि गहावत, डगमगाइ धरनी धरै पैया ॥
कबहुँक सुंदर बदन बिलोकति, उर आनँद भरि लेति बलैया ।
कबहुँक कुल देवता मनावति, चिरजीवहु मेरौ कुँवर कन्हैया ॥
कबहुँक बल कौं टेरि बुलावति, इहिं आँगन खेलौ दोउ भैया ।
सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप बिलसत नँदरैया ॥

राग बिलावल

भावत हरि कौ बाल-बिनोद

भावत हरि कौ बाल-बिनोद ।
स्याम -राम-मुख निरखि-निरखि सुख-मुदित रोहिनी, जननि जसोद ॥
आँगन-पंक-राग तन सोभित, चल नूपुर-धुनि सुनि मन मोद ।
परम सनेह बढ़ावत मातनि, रबकि-रबकि हरि बैठत गोद ॥
आनँद-कंद, सकल सुखदायक, निसि-दिन रहत केलि-रस ओद ।
सूरदास प्रभु अंबुज-लोचन, फिरि-फिरि चितवत ब्रज-जन-कोद ॥

सूच्छम चरन चलावत बल करि

सूच्छम चरन चलावत बल करि ।
अटपटात, कर देति सुंदरी, उठत तबै सुजतन तन-मन धरि ॥
मृदु पद धरत धरनि ठहरात न, इत-उत भुज जुग लै-लै भरि-भरि ।
पुलकित सुमुखीभई स्याम-रस ज्यौं जल मैं दाँची गागरि गरि ॥
सूरदास सिसुता-सुख जलनिधि, कहँ लौं कहौं नाहिं कोउ समसरि ।
बिबुधनि मनतर मान रमत ब्रज, निरखत जसुमति सुख छिन-पल-धरि ॥

राग सूहौ

बाल-बिनोद आँगन की डोलनि

बाल-बिनोद आँगन की डोलनि ।
मनिमय भूमि नंद कैं आलय, बलि-बलि जाउँ तोतरे बोलनि ॥
कठुला कंठ कुटिल केहरि-नख, ब्रज-माल बहु लाल अमोलनि ।
बदन सरोज तिलक गोरोचन, लट लटकनि मधुकर-गति डोलनि ॥
कर नवनीत परस आनन सौं, कछुक खात, कछु लग्यो कपोलनि ।
कहि जन सूर कहाँ लौं बरनौं, धन्य नंद जीवन जग तोलनि ॥

राग बिलावल

गहे अँगुरियाँ ललन की, नँद चलन सिखावत

गहे अँगुरियाँ ललन की, नँद चलन सिखावत ।
अरबराइ गिरि परत हैं, कर टेकि उठावत ॥
बार-बार बकि स्याम सौं कछु बोल बुलावत ।
दुहुँघाँ द्वै दँतुली भई, मुख अति छबि पावत ॥
कबहुँ कान्ह-कर छाँड़ि नँद, पग द्वैक रिंगावत ।
कबहुँ धरनि पर बैठि कै, मन मैं कछु गावत ॥
कबहुँ उलटि चलैं धाम कौं, घुटुरुनि करि धावत ।
सूर स्याम-मुख लखि महर, मन हरष बढ़ावत ॥

कान्ह चलत पग द्वै-द्वै धरनी

कान्ह चलत पग द्वै-द्वै धरनी ।
जो मन मैं अभिलाष करति ही, सो देखति नँद-घरनी ॥
रुनुक-झुनुक नूपुर पग बाजत, धुनि अतिहीं मन-हरनी ।
बैठि जात पुनि उठत तुरतहीं सो छबि जाइ न बरनी ॥
ब्रज-जुवती सब देखि थकित भइँ, सुंदरता की सरनी ।
चिरजीवहु जसुदा कौ नंदन सूरदास कौं तरनी ॥

राग धनाश्री

चलत स्यामघन राजत, बाजति पैंजनि

चलत स्यामघन राजत, बाजति पैंजनि पग-पग चारु मनोहर ।
डगमगात डोलत आँगन मैं, निरखि बिनोद मगन सुर-मुनि-नर ॥
उदित मुदित अति जननि जसोदा, पाछैं फिरति गहे अँगुरी कर ।
मनौ धेनु तृन छाँड़ि बच्छ-हित , प्रेम द्वित चित स्रवत पयोधर ॥
कुंडल लोल कपोल बिराजत,लटकति ललित लटुरिया भ्रू पर ।
सूर स्याम-सुंदर अवलोकत बिहरत बाल-गोपाल नंद-घर ॥

राग बिलावल

 भीतर तैं बाहर लौं आवत

भीतर तैं बाहर लौं आवत ।
घर-आँगन अति चलत सुगम भए, देहरि अँटकावत ॥
गिरि-गिरि परत, जात नहिं उलँघी, अति स्रम होत नघावत ।
अहुँठ पैग बसुधा सब कीनी, धाम अवधि बिरमावत ॥
मन हीं मन बलबीर कहत हैं, ऐसे रंग बनावत ।
सूरदास प्रभु अगनित महिमा, भगतनि कैं मन भावत ॥

राग-गौरी

Leave a Reply