श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 5

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 5

चलत देखि जसुमति सुख पावै

चलत देखि जसुमति सुख पावै ।
ठुमुकि-ठुमुकि पग धरनी रेंगत, जननी देखि दिखावै ॥
देहरि लौं चलि जात, बहुरि फिर-फिरि इत हीं कौं आवै ।
गिरि-गिरि परत बनत नहिं नाँघत सुर-मुनि सोच करावै ॥
कोटि ब्रह्मंड करत छिन भीतर, हरत बिलंब न लावै ।
ताकौं लिये नंद की रानी, नाना खेल खिलावै ॥
तब जसुमति कर टेकि स्याम कौ, क्रम-क्रम करि उतरावै ।
सूरदास प्रभु देखि-देखि, सुर-नर-मुनि बुद्धि भुलावै ॥

राग धनाश्री

सो बल कहा भयौ भगवान

सो बल कहा भयौ भगवान ?
जिहिं बल मीन रूप जल थाह्यौ, लियौ निगम,हति असुर-परान ॥
जिहिं बल कमठ-पीठि पर गिरि धरि, जल सिंधु मथि कियौ बिमान ।
जिहिं बल रूप बराह दसन पर, राखी पुहुमी पुहुप समान ॥
जिहिं बल हिरनकसिप-उर फार्‌यौ, भए भगत कौं कृपानिधान ।
जिहिं बल बलि बंधन करि पठयौ, बसुधा त्रैपद करी प्रमान ॥
जिहिं बल बिप्र तिलक दै थाप्यौ, रच्छा करी आप बिदमान ।
जिहिं बल रावन के सिर काटे, कियौ बिभीषन नृपति निदान ॥
जिहिं बल जामवंत-मद मेट्यौ, जिहिं बल भू-बिनती सुनि कान ।
सूरदास अब धाम-देहरी चढ़ि न सकत प्रभु खरे अजान ॥

राग भैरव

देखो अद्भुत अबिगत की गति

देखो अद्भुत अबिगत की गति, कैसौ रूप धर्‌यौ है (हो)!
तीनि लोक जाकें उदर-भवन, सो सूप कैं कोन पर्‌यौ है (हो)!
जाकैं नाल भए ब्रह्मादिक, सकल जोग ब्रत साध्यो (हो)!
ताकौ नाल छीनि ब्रज-जुवती बाँटि तगा सौं बाँध्यौ (हो) !
जिहिं मुख कौं समाधि सिव साधी आराधन ठहराने (हो) !
सो मुख चूमति महरि जसोदा, दूध-लार लपटाने (हो) !
जिन स्रवननि जन की बिपदा सुनि, गरुड़ासन तजि धावै (हो) !
तिन स्रवननि ह्वै निकट जसोदा, हलरावै अरु गावै (हो) !
बिस्व-भरन-पोषन, सब समरथ, माखन-काज अरे हैं (हो) !
रूप बिराट कोटि प्रति रोमनि, पलना माँझ परे हैं (हो) !
जिहिं भुज बल प्रहलाद उबार्‌यौ, हिरनकसिप उर फारे (हो)
सो भुज पकरि कहति ब्रजनारी, ठाढ़े होहु लला रे (हो) !
जाकौ ध्यान न पायौ सुर-मुनि, संभु समाधि न टारी (हो)!
सोई सूर प्रगट या ब्रज मैं, गोकुल-गोप-बिहारी (हो) !

राग आसावरी

साँवरे बलि-बलि बाल-गोबिंद

साँवरे बलि-बलि बाल-गोबिंद ।
अति सुख पूरन परमानंद ॥
तीनि पैड जाके धरनि न आवै ।
ताहि जसोदा चलन सिखावै ॥
जाकी चितवनि काल डराई ।
ताहि महरि कर-लकुटि दिखाई ॥
जाकौ नाम कोटि भ्रम टारै ।
तापर राई-लोन उतारै ॥
सेवक सूर कहा कहि गावै ।
कृपा भई जो भक्तिहिं पावै ॥

राग अहीरी

आनँद-प्रेम उमंगि जसोदा

आनँद-प्रेम उमंगि जसोदा, खरी गुपाल खिलावै ।
कबहुँक हिलकै-किलकै जननी मन-सुख-सिंधु बढ़ावै ॥
दै करताल बजावति, गावति, राग अनूप मल्हावै ।
कबहुँक पल्लव पानि गहावै, आँगन माँझ रिंगावै ॥
सिव सनकादि, सुकादि, ब्रह्मादिक खोजत अंत न पावैं ।
गोद लिए ताकौं हलरावैं तोतरे बैन बुलावै ॥
मोहे सुर, नर, किन्नर, मुनिजन, रबि रथ नाहिं चलावै ।
मोहि रहीं ब्रज की जुवती सब, सूरदास जस गावै ॥
राग आसावरी

हरि हरि हँसत मेरौ माधैया

हरि हरि हँसत मेरौ माधैया ।
देहरि चढ़त परत गिर-गिर, कर पल्लव गहति जु मैया ॥
भक्ति-हेत जसुदा के आगैं, धरनी चरन धरैया ।
जिनि चरनि छलियौ बलि राजा, नख गंगा जु बहैया ॥
जिहिं सरूप मोहे ब्रह्मादिक, रबि-ससि कोटि उगैया ।
सूरदास तिन प्रभु चरननि की, बलि-बलि मैं बलि जैया ॥

राग कान्हरौ

 झुनक स्याम की पैजनियाँ

झुनक स्याम की पैजनियाँ ।
जसुमति-सुत कौ चलन सिखावति, अँगुरी गहि-गहि दोउ जनियाँ ॥
स्याम बरन पर पीत झँगुलिया, सीस कुलहिया चौतनियाँ ।
जाकौ ब्रह्मा पार न पावत, ताहि खिलावति ग्वालिनियाँ ॥
दूरि न जाहु निकट ही खेलौ, मैं बलिहारी रेंगनियाँ ।
सूरदास जसुमति बलिहारी, सुतहिं खिलावति लै कनियाँ ॥

 चलत लाल पैजनि के चाइ

चलत लाल पैजनि के चाइ ।
पुनि-पुनि होत नयौ-नयौ आनँद, पुनि-पुनि निरखत पाइ ॥
छोटौ बदन छोटियै झिंगुली, कटि किंकिनी बनाइ ।
राजत जंत्र-हार, केहरि-नख पहुँची रतन-जराइ ॥
भाल तिलक पख स्याम चखौड़ा जननी लेति बलाइ ।
तनक लाल नवनीत लिए कर सूरज बलि-बलि जाइ ॥

मैं देख्यौं जसुदा कौ नंदन खेलत

मैं देख्यौं जसुदा कौ नंदन खेलत आँगन बारौ री ।
ततछन प्रान पलटि गयौ, तन-तन ह्वै गयौ कारौ री ॥
देखत आनि सँच्यौ उर अंतर, दै पलकनि कौ तारौ री ।
मोहिं भ्रम भयौ सखी उर अपनैं, चहुँ दिसि भयौ उज्यारौ री ॥
जौ गुंजा सम तुलत सुमेरहिं, ताहू तैं अति भारौ री ।
जैसैं बूँद परत बारिधि मैं, त्यौं गुन ग्यान हमारौ री ॥
हौं उन माहँ कि वै मोहिं महियाँ, परत न देह सँभारौ री ।
तरु मैं बीज कि बीज माहिं तरु, दुहुँ मैं एक न न्यारौ री ॥
जल-थल-नभ-कानन, घर-भीतर, जहँ लौं दृष्टि पसारौ री ।
तित ही तित मेरे नैननि आगैं निरतत नंद-दुलारौ री ॥
तजी लाज कुलकानि लोक की, पति गुरुजन प्यौसारौ री ।
जिनकि सकुच देहरी दुर्लभ, तिन मैं मूँड़ उधारौं री ॥
टोना-टामनि जंत्र मंत्र करि, ध्यायौ देव-दुआरौ री ।
सासु-ननद घर-घर लिए डोलति, याकौ रोग बिचारौ री ॥
कहौं कहा कछु कहत न आवै, औ रस लागत खारौ री ।
इनहिं स्वाद जो लुब्ध सूर सोइ जानत चाखनहारौ री ॥

राग आसावरी

जब तैं आँगन खेलत देख्यौ

जब तैं आँगन खेलत देख्यौ, मैं जसुदा कौ पूत री ।
तब तैं गृह सौं नातौं टूट्यौ, जैसैं काँचौं सूत री ॥
अति बिसाल बारिज-दल-लोचन, राजति काजर-रेख री ।
इच्छा सौं मकरंद लेत मनु अलि गोलक के बेष री ॥
स्रवन सुनत उतकंठ रहत हैं, जब बोलत तुतरात री ।
उमँगै प्रेम नैन-मग ह्वै कै, कापै रोक्यौ जात री ॥
दमकति दोउ दूधकी दँतियाँ,जगमग जगमग होति री ।
मानौ सुंदरता-मंदिर मैं रूप रतन की ज्योति री ॥
सूरदास देखैं सुंदर मुख, आनँद उर न समाइ री ।
मानौ कुमद कामना-पूरन, पूरन इंदुहिं पाइ री ॥

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