श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 4

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 4

 

नंद-घरनि आनँद भरी, सुत स्याम खिलावै

नंद-घरनि आनँद भरी, सुत स्याम खिलावै ।
कबहिं घुटुरुवनि चलहिंगे, कहि बिधिहिं मनावै ॥
कबहिं दँतुलि द्वै दूध की, देखौं इन नैननि ।
कबहिं कमल-मुख बोलिहैं, सुनिहौं उन बैननि ॥
चूमति कर-पग-अधर-भ्रू, लटकति लट चूमति ।
कहा बरनि सूरज कहै, कहँ पावै सो मति ॥

राग बिलावल

नान्हरिया गोपाल लाल

नान्हरिया गोपाल लाल, तू बेगि बड़ौ किन होहिं ।
इहिं मुख मधुर बचन हँसिकै धौं, जननि कहै कब मोहिं ॥
यह लालसा अधिक मेरैं जिय जो जगदीस कराहिं ।
मो देखत कान्हर इहिं आँगन पग द्वै धरनि धराहिं ॥
खेलहिं हलधर-संग रंग-रुचि,नैन निरखि सुख पाऊँ ।
छिन-छिन छिधित जानि पय कारन, हँसि-हँसि निकट बुलाऊँ ॥
जअकौ सिव-बिरंचि-सनकादिक मुनिजन ध्यान न पावै ।
सूरदास जसुमति ता सुत-हित, मन अभिलाष बढ़ावै ॥

जसुमति मन अभिलाष करै

जसुमति मन अभिलाष करै ।
कब मेरो लाल घटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै ॥
कब द्वै दाँत दूध के देखौं, कब तोतरैं मुख बचन झरै ।
कब नंदहिं बाबा कहि बोलै, कब जननी कहि मोहिं ररै ॥
कब मेरौ अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरै ।
कब धौं तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै ॥
कब हँसि बात कहैगौ मौसौं, जा छबि तैं दुख दूरि हरै ।
स्याम अकेले आँगन छाँड़े, आप गई कछु काज घरै ॥
इहिं अंतर अँधवाह उठ्यौ इक, गरजत गगन सहित घहरै ।
सूरदास ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहिं डरै॥

हरि किलकत जसुदा की कनियाँ

हरि किलकत जसुदा की कनियाँ ।
निरखि-निरखि मुख कहति लाल सौं मो निधनी के धनियाँ ॥
अति कोमल तन चितै स्याम कौ बार-बार पछितात ।
कैसैं बच्यौ, जाउँ बलि तेरी, तृनावर्त कैं घात ॥
ना जानौं धौं कौन पुन्य तैं, को करि लेत सहाइ ।
वैसी काम पूतना कीन्हौं, इहिं ऐसौ कियौ आइ ॥
माता दुखित जानि हरि बिहँसे, नान्हीं दँतुलि दिखाइ ।
सूरदास प्रभु माता चित तैं दुख डार्‌यौ बिसराइ ॥

सुत-मुख देखि जसोदा फूली

सुत-मुख देखि जसोदा फूली ।
हरषित देखि दूध की दँतियाँ, प्रेममगन तन की सुधि भूली ॥
बाहिर तैं तब नंद बुलाए, देखौ धौं सुंदर सुखदाई ।
तनक-तनक-सी दूध-दँतुलिया, देखौ, नैन सफल करौ आई ॥
आनँद सहित महर तब आए, मुख चितवत दोउ नैन अघाई ।
सूर स्याम किलकत द्विज देख्यौ, मनौ कमल पर बिज्जु जमाई ॥

हरि किलकत जसुमति की कनियाँ

हरि किलकत जसुमति की कनियाँ ।
मुख मैं तीनि लोक दिखराए, चकित भई नँद-रनियाँ ॥
घर-घर हाथ दिवापति डोलति, बाँधति गरैं बघनियाँ ।
सूर स्याम की अद्भुत लीला नहिं जानत मुनिजनियाँ ॥

राग देवगंधार

जननी बलि जाइ हालक हालरौ गोपाल

जननी बलि जाइ हालक हालरौ गोपाल ।
दधिहिं बिलोइ सदमाखन राख्यौ, मिश्री सानि चटावै नँदलाल ॥
कंचन-खंभ, मयारि, मरुवा-डाड़ी, खचि हीरा बिच लाल-प्रवाल ।
रेसम बनाइ नव रतन पालनौ, लटकन बहुत पिरोजा-लाल ॥
मोतिनि झालरि नाना भाँति खिलौना, रचे बिस्वकर्मा सुतहार ।
देखि-देखि किलकत दँतियाँ द्वै राजत क्रीड़त बिबिध बिहार ॥
कठुला कंठ बज्र केहरि-नख, मसि-बिंदुका सु मृग-मद भाल ।
देखत देत मुनि कौतूहल फूले, झूलत देखत नंद कुमार ।
हरषत सूर सुमन बरषत नभ, धुनि छाई है जै-जैकार ॥

रागिनी श्रीहठी

 हरि कौ मुख माइ, मोहि अनुदिन अति भावै

हरि कौ मुख माइ, मोहि अनुदिन अति भावै ।
चितवत चित नैननि की मति-गति बिसरावै ॥
ललना लै-लै उछंग अधिक लोभ लागैं।
निरखति निंदति निमेष करत ओट आगैं ॥
सोभित सुकपोल-अधर, अलप-अलप दसना ।
किलकि-किलकि बैन कहत, मोहन, मृदु रसना ॥
नासा, लोचन बिसाल, संतत सुखकारी ।
सूरदास धन्य भाग, देखति ब्रजनारी ॥

राग सारंग

लालन, वारी या मुख ऊपर

लालन, वारी या मुख ऊपर ।
माई मोरहि दौठि न लागै, तातैं मसि-बिंदा दियौ भ्रू पर ॥
सरबस मैं पहिलै ही वार्‌यौ, नान्हीं नान्हीं दँतुली दू पर ।
अब कहा करौं निछावरि, सूरज सोचति अपनैं लालन जू पर ॥

राग जैतश्री

आजु भोर तमचुर के रोल

आजु भोर तमचुर के रोल ।
गोकुल मैं आनंद होत है, मंगल-धुनि महराने टोल ॥
फूले फिरत नंद अति सुख भयौ, हरषि मँगावत फूल-तमोल ।
फूली फिरति जसोदा तन-मन, उबटि कान्ह अन्हवाई अमोल ॥
तनक बदन, दोउ तनक-तनक कर, तनक चरन, पोंछति पट झोल ।
कान्ह गरैं सोहति मनि-माला, अंग अभूषन अँगुरिनि गोल ॥
सिर चौतनी, डिठौना दीन्हौ, आँखि आँजि पहिराइ निचोल ।
स्याम करत माता सौं झगरौं, अटपटात कलबल करि बोल ॥
दोउ कपोल गहि कै मुख चूमति, बरष-दिवस कहि करति कलोल ।
सूर स्याम ब्रज-जन-मोहन बरष-गाँठि कौ डोरा खोल ॥

राग बिलावल

खेलत नँद-आँगन गोबिंद

खेलत नँद-आँगन गोबिंद ।
निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु ॥
कटि किंकिनी चंद्रिका मानिक, लटकन लटकत भाल ।
परम सुदेस कंठ केहरि-नख, बिच-बिच बज्र प्रवाल ॥
कर पहुँची, पाइनि मैं नूपुर, तन राजत पट पीत ।
घुटुरुनि चलत, अजिर महँ बिहरत, मुख मंडित नवनीत ॥
सूर बिचित्र चरित्र स्याम कै रसना कहत न आवैं ।
बाल दशा अवलोकि सकल मुनि, जोग बिरति बिसरावैं ॥
राग धनाश्री

खीझत जात माखन खात

खीझत जात माखन खात ।
अरुन लोचन, भौंह टेढ़ी, बार-बार जँभात ॥
कबहुँ रुनझुन चलत घुटुरुनि, धूरि धूसर गात ।
कबहुँ झुकि कै अलक खैँचत, नैन जल भरि जात ॥
कबहुँ तोतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात ।
सूर हरि की निरखि सोभा, निमिष तजत न मात ॥

राग रामकली

(माई) बिहरत गोपाल राइ, मनिमय रचे अँगनाइ

(माई) बिहरत गोपाल राइ, मनिमय रचे अँगनाइ,
लरकत पररिंगनाइ, घूटुरुनि डोलै ।
निरखि-निरखि अपनो प्रति-बिंब,
हँसत किलकत औ, पाछैं चितै फेरि-फेरि मैया-मैया बोलै ॥
जौं अलिगन सहित बिमल जलज जलहिं धाइ रहै,
कुटिल अलक बदन की छबि, अवनी परि लोलै ।
सूरदास छबि निहारि, थकित रहीं घोष नारि,
तन-मन-धन देतिं वारि, बार-बार ओलै ॥

राग ललित

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