श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 25

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 25

 

गैयनि घेरि सखा सब ल्याए

गैयनि घेरि सखा सब ल्याए ।
देख्यौ कान्ह जात बृंदावन, यातैं मन अति हरष बढ़ाए ॥
आपुस में सब करत कुलाहल, धौरी, धूमरि धेनु बुलाए ।
सुरभी हाँकि देत सब जहँ-तहँ, टेरि-टेरि हेरी सुर गाए ॥
पहुँचे आइ बिपिन घन बृंदा, देखत द्रुम दुख सबनि गँवाए ।
सूर स्याम गए अघा मारि जब, ता दिन तैं इहिं बन अब आए ॥

राग धनाश्री

चरावत बृंदाबन हरि धेनु

चरावत बृंदाबन हरि धेनु ।
ग्वाल सखा सब संग लगाए, खेलत हैं करि चैनु ॥
कोउ गावत, कोउ मुरलि बजावत, कोउ विषान, कोउ बेनु ।
कोउ निरतत कोउ उघटि तार दै, जुरि ब्रज-बालक-सेनु ॥
त्रिबिध पवन जहँ बहत निसादिन, सुभग कुंज घन ऐनु ।
सूर स्याम निज धाम बिसारत, आवत यह सुख लैनु ॥

राग नट-नारायन

बृंदाबन मोकों अति भावत

बृंदाबन मोकों अति भावत ।
सुनहु सखा तुम सुबल, श्रीदामा,ब्रज तैं बन गौ चारन आवत ॥
कामधेनु सुरतरुसुख जितने, रमा सहित बैकुंठ भुलावत ।
इहिं बृंदाबन, इहिं जमुना-तट, ये सुरभी अति सुखद चरावत ॥
पुनि-पुनि कहत स्याम श्रीमुख सौं, तुम मेरैं मन अतिहिं सुहावत ।
सूरदास सुनि ग्वाल चकृत भए ,यह लीला हरि प्रगट दिखावत ॥

राग धनाश्री

 ग्वाल सखा कर जोरि कहत हैं

ग्वाल सखा कर जोरि कहत हैं,
हमहि स्याम! तुम जनि बिसरावहु ।
जहाँ-जहाँ तुम देह धरत हौ,
तहाँ-तहाँ जनि चरन छुड़ावहु ॥
ब्रज तैं तुमहि कहूँ नहिं टारौं,
यहै पाइ मैहूँ ब्रज आवत ।
यह सुख नहिं कहुँ भुवन चतुर्दस,
इहिं ब्रज यह अवतार बतावत ॥
और गोप जे बहुरि चले घर,
तिन सौं कहि ब्रज छाक मँगावत ।
सूरदास-प्रभु गुप्त बात सब,
ग्वालनि सौं कहि-कहि सुख पावत ॥

राग बिलावल

काँधे कान्ह कमरिया कारी

काँधे कान्ह कमरिया कारी, लकुट लिए कर घेरै हो ।
बृंदाबन मैं गाइ चरावै, धौरी, धूमरि टेरै हो ॥
लै लिवाइ ग्वालनि बुलाइ कै, जहँ-जहँ बन-बन हेरै हो ।
सूरदास प्रभु सकल लोकपति, पीतांबर कर फेरै हो ॥

 वै मुरली की टेर सुनावत

वै मुरली की टेर सुनावत ।
बृंदाबन सब बासर बसि निसि-आगम जानि चले ब्रज आवत ॥
सुबल, सुदामा, श्रीदामा सँग, सखा मध्य मोहन छबि पावत ।
सुरभी-गन सब लै आगैं करि, कोउ टेरत कोउ बेनु बजावत ॥
केकी-पच्छ-मुकुट सिर भ्राजत, गौरी राग मिलै सुर गावत ।
सूर स्याम के ललित बदन पर, गोरज-छबि कछु चंद छपावत ॥

राग गौरी

हरि आवत गाइनि के पाछे

हरि आवत गाइनि के पाछे ।
मोर-मुकुट मकराकृति कुंडल, नैन बिसाल कमल तैं आछे ॥
मुरली अधर धरन सीखत हैं, बनमाला पीतांबर काछे ।
ग्वाल-बाल सब बरन-बरन के, कोटि मदन की छबि किए पाछे ॥
पहुँचे आइ स्याम ब्रज पुर मैं, घरहि चले मोहन-बल आछे ।
सूरदास-प्रभु दोउ जननी मिलि लेति बलाइ बोलि मुख बाछे ॥

 आजु हरि धेनु चराए आवत

आजु हरि धेनु चराए आवत ।
मोर-मुकुट बनमाल बिराजत, पीतांबर फहरावत ॥
जिहिं-जिहिं भाँति ग्वाल सब बोलत, सुनि स्रवननि मन राखत ।
आपुनि टेर लेत ताही सुर, हरषत पुनि पुनि भाषत ॥
देखत नंद-जसोदा-रोहिनि, अरु देखत ब्रज-लोग ।
सूर स्याम गाइनि सँग आए, मैया लीन्हे रोग ॥

आजु बने बन तैं ब्रज आवत

आजु बने बन तैं ब्रज आवत ।
नाना रंग सुमन की माला, नंदनँदन-उर पर छबि पावत ॥
संग गोप गोधन-गन लीन्ह, नाना कौतुक उपजावत ।
कोउ गावत, कोउ नृत्य करत, कोउ उघटत, कोउ करताल बजावत ॥
राँभति गाइ बच्छ हित सुधि करि, प्रेम उमँगि थन दूध चुवावत ।
जसुमति बोलि उठी हरषित ह्वै, कान्हा धेनु चराए आवत ॥
इतनी कहत आइ गए मोहन, जननी दौरि हिए लै लावत ।
सूर स्याम के कृत्य जसोमति, ग्वाल-बाल कहि प्रगट सुनावत ॥

राग कान्हरौ

बल मोहन बन में दोउ आए

बल मोहन बन में दोउ आए ।
जननि जसोदा मातु रोहिनी, हरषित कंठ लगाए ॥
काहैं आजु अबार लगाई, कमल-बदन कुम्हिलाए ।
भूखे गए आजु दोउ भैया, करन कलेउ न पाए ॥
देखहु जाइ कहा जेवन कियौ, रोहिनि तुरत पठाई ।
मैं अन्हवाए देति दुहुनि कौं, तुम अति करौ चँड़ाई ॥
लकुट लियौ, मुरली कर लीन्ही, हलधर दियौ बिषान ।
नीलांबर-पीतांबर लीन्हे, सैंति धरति करि प्रान ॥
मुकुट उतारि धर्‌यौ लै मंदिर, पोंछति है अँग-धातु ।
अरु बनमाल उतारति गर तैं, सूर स्याम की मातु ॥

राग गौरी

 मैया ! हौं न चरैहौं गाइ

मैया ! हौं न चरैहौं गाइ ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं, मेरे पाइ पिराइ ॥
जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहि, अपनी सौंह दिवाइ ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ ॥
मैं पठवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ ।
सूर स्याम मेरो अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ॥

मैया बहुत बुरौ बलदाऊ

मैया बहुत बुरौ बलदाऊ ।
कहन लग्यौ बन बड़ौ तमासौ, सब मौड़ा मिलि आऊ ॥
मोहूँ कौं चुचकारि गयौ लै, जहाँ सघन बन झाऊ ।
भागि चलौ कहि गयौ उहाँ तैं, काटि खाइ रे हाऊ ॥
हौं डरपौं अरु रोवौं, कोउ नहिं धीर धराऊ ।
थरसि गयौं नहीं भागि सकौं, वै भागै जात अगाऊ ॥
मोसौं कहत मोल कौ लीनौ, आपु कहावत साऊ ।
सूरदास बल बड़ौ चवाई, तैसेहिं मिले सखाऊ ॥

तुम कत गाइ चरावन जात

तुम कत गाइ चरावन जात ।
पिता तुम्हारौ नंद महर सौ, अरु जसुमति सी जाकी मात ॥
खेलत रहौ आपने घर मैं, माखन दधि भावै सो खात ।
अमृत बचन कहौ मुख अपने, रोम-रोम पुलकित सब गात ॥
अब काहू के जाहु कहूँ जनि, आवति हैं जुबती इतरात ।
सूर स्याम मेरे नैननि आगे तैं कत कहूँ जात हौ तात ॥

 माँगि लेहु जो भावै प्यारे

माँगि लेहु जो भावै प्यारे ।
बहुत भाँति मेवा सब मेरैं, षटरस ब्यंजन न्यारे ॥
सबै जोरि राखति हित तुम्हरैं, मैं जानति तुम बानि ।
तुरत-मथ्यौ दधिमाखन आछौ, खाहु देउँ सो आनि ॥
माखन दधि लागत अति प्यारौ, और न भावै मोहि ।
सूर जननि माखन-दधि दीन्हौ, खात हँसत मुख जोहि ॥

सुनि मैया, मैं तौ पय पीवौं

सुनि मैया, मैं तौ पय पीवौं, मोहि अधिक रुचि आवै री ।
आजु सबारैं धेनु दुही मैं, वहै दूध मोहि प्यावै री ॥
और धेनु कौ दूध न पीवौं, जो करि कोटि बनावै री ।
जननी कहति दूध धौरी कौ, पुनि-पुनि सौंह करावै री ॥
तुम तैं मोहि और को प्यारौ, बारंबार मनावै री ।
सूर स्यामकौं पय धौरी कौ माता हित सौं ल्यावै री ॥

राग आसावरी

 आछौ दूध पियौ मेरे तात

आछौ दूध पियौ मेरे तात ?
तातौ लगत बदन नहिं परसत, फूँक देति है मात ॥
औटि धर्‌यौ है अबहीं मोहन, तुम्हरैं हेत बनाइ ।
तुम पीवौ, मैं नैननि देखौं, मेरे कुँवर कन्हाइ ॥
दूध अकेली धौरी कौ यह, तनकौं अति हितकारि ।
सूर स्याम पय पीवन लागे, अति तातौ दियौ डारि ॥

राग गौरी

ये दोऊ मेरे गाइ-चरैया

ये दोऊ मेरे गाइ-चरैया ।
मोल बिसाहि लियौ मैं तुम कौं, जब दोउ रहे नन्हैया ॥
तुम सौं टहल करावति निसि-दिन, और न टहल करैया ।
यह सुनि स्याम हँसे कहि दाऊ, झूठ कहति है मैया ॥
जानि परत नहिं साँच झुठाई, चारत धेनु झुरैया ।
सूरदास जसुदा मैं चेरी कहि-कहि लेति बलैया ॥

राग कल्याण

 

Leave a Reply