श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 24

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 24

 

पौढ़े स्याम जननि गुन गावत

पौढ़े स्याम जननि गुन गावत ।
आजु गयौ मेरौ गाइ चरावन, कहि-कहि मन हुलसावत ॥
कौन पुन्य-तप तैं मैं पायौ ऐसौ सुंदर बाल ।
हरषि-हरषि कै देति सुरनि कौं सूर सुमन की माल ॥

राग कान्हरौ

करहु कलेऊ कान्ह पियारे

करहु कलेऊ कान्ह पियारे !
माखन-रोटी दियौ हाथ पर, बलि-बलि जाउँ जु खाहु लला रे ॥
टेरत ग्वाल द्वार हैं ठाढ़े, आए तब के होत सबारे ।
खेलहु जाइ घोष के भीतर, दूरि कहूँ जनि जैयहु बारे ॥
टेरि उठे बलराम स्याम कौं, आवहु जाहिं धेनु बन चारे ।
सूर स्याम कर जोरि मातु सौं, गाइ चरावन कहत हहा रे ॥

 मैया री मोहि दाऊ टेरत

मैया री मोहि दाऊ टेरत ।
मोकौं बन-फल तोरि देत हैं, आपुन गैयनि घेरत ॥
और ग्वाल सँग कबहुँ न जैहौं, वै सब मोहि खिझावत ।
मैं अपने दाऊ सँग जैहौं, बन देखैं सुख पावत ।
आगें दै पुनि ल्यावत घर कौं, तू मोहि जान न देति ।
सूर स्याम जसुमति मैया सौं हा-हा करि कहै केति ॥

बोलि लियौ बलरामहि जसुमति

बोलि लियौ बलरामहि जसुमति ।
लाल सुनौ हरि के गुन , काल्हिहि तैं लँगरई करत अति ॥
स्यामहि जान देहि मेरैं सँग, तू काहैं डर मानति ।
मैं अपने ढिग तैं नहिं टारौं, जियहिं प्रतीति न आनति ॥
हँसी महरि बल की बतियाँ सुनि, बलिहारी या मुख की ।
जाहु लिवाइ सूर के प्रभु कौं, कहति बीर के रुख की ॥

राग सारंग

अति आनंद भए हरि धाए

अति आनंद भए हरि धाए ।
टेरत ग्वाल-बाल सब आवहु, मैया मोहि पठाए ॥
उत तैं सखा हँसत सब आवत, चलहु कान्ह! बन देखहिं ।
बनमाला तुम कौं पहिरावहिं, धातु-चित्र तनु रेखहिं ॥
गाइ लई सब घेरि घरनि तैं, महर गोप के बालक ।
सूर स्याम चले गाइ चरावन, कंस उरहि के सालक ॥

राग नट

नंद महर के भावते, जागौ मेरे बारे

नंद महर के भावते, जागौ मेरे बारे ।
प्रात भयौ उठि देखिऐ, रबि-किरनि उज्यारे ॥
ग्वाल-बाल सब टेरहीं, गैया बन चारन ।
लाल! उठौ मुख धीइऐ, लागी बदन उघारन ॥
मुख तैं पट न्यारौ कियौ, माता कर अपनैं ।
देखि बदन चकित भई, सौंतुष की सपनैं ॥
कहा कहौं वा रूप की, को बरनि बतावै ।
सूर स्याम के गुन अगम, नंद-सुवन कहावै ॥

राग बिलावल

 लालहि जगाइ बलि गई माता

लालहि जगाइ बलि गई माता ।
निरखि मुख-चंद-छबि, मुदित भइ मनहिं-मन ,कहत आधैं बचन भयौ प्राता ।
नैन अलसात अति, बार-बार जमुहात , कंठ लगि जात, हरषात गाता ।
बदन पोंछियौ जल जमुन सौं धौइ कै,कह्यौ मुसुकाइ, कछु खाहु ताता ॥
दूध औट्यौ आनि, अधिक मिसिरी सानि ,लेहु माखन पानि प्रान-दाता ।
सूर-प्रभु कियौ भोजन बिबिध भाँति सौं,पियौ पय मोद करि घूँट साता ॥

राग रामकली

उठे नंद-लाल सुनत सुनत जननी मुख बानी

उठे नंद-लाल सुनत सुनत जननी मुख बानी ।
आलस भरे नैन, सकल सोभा की खानी ॥
गोपी जन बिथकित ह्वै चितवतिं सब ठाढ़ी ।
नैन करि चकोर, चंद-बदन प्रीति बाढ़ी ॥
माता जल झारी ले, कमल-मुख पखार्‌यौ ।
नैन नीर परस करत आलसहि बिसार्‌यौ ॥
सखा द्वार ठाढ़े सब, टेरत हैं बन कौं ।
जमुना-तट चलौ कान्ह, चारन गोधन कौं ॥
सखा सहित जेंवहु, मैं भोजन कछु कीन्हौ ।
सूर स्याम हलधर सँग सखा बोलि लीन्हौ ॥

राग ललित

दोउ भैया जेंवत माँ आगैं

दोउ भैया जेंवत माँ आगैं ।
पुनि-पुनि लै दधि खात कन्हाई, और जननि पै माँगैं ॥
अति मीठौ दधि आजु जमायौ, बलदाऊ तुम लेहु ।
देखौं धौं दधि-स्वाद आपु लै, ता पाछैं मोहि देहु ॥
बल-मोहन दोउ जेंवत रुचि सौं, सुख लूटति नँदरानी ।
सूर स्याम अब कहत अघाने, अँचवन माँगत पानी ॥

राग बिलावल

(द्वारैं) टेरत हैं सब ग्वाल कन्हैया, आवहु बेर भई

(द्वारैं) टेरत हैं सब ग्वाल कन्हैया, आवहु बेर भई ।
आवहु बेगि, बिलम जनि लावहुँ, गैया दूरि गई ॥
यह सुनतहिं दोऊ उठि धाए, कछु अँचयौ कछु नाहिं ।
कितिक दूर सुरभी तुम छाँड़ी, बन तौ पहुँची नाहिं ॥
ग्वाल कह्यौ कछु पहुँची ह्वै हैं, कछु मिलिहैं मग माहिं ।
सूरदास बल मोहन धैया, गैयनि पूछत जाहिं ॥

राग रामकली

बन पहुँचत सुरभी लइँ जाइ

बन पहुँचत सुरभी लइँ जाइ ।
जैहौ कहा सखनि कौं टेरत, हलधर संग कन्हाइ ।
जेंवत परखि लियौ नहिं हम कौं, तुम अति करी चँड़ाइ ॥
अब हम जैहैं दूरि चरावन, तुम सँग रहै बलाइ ॥
यह सुनि ग्वाल धाइ तहँ आए, स्यामहिं अंकम लाइ ।
सखा कहत यह नंद-सुवन सौं, तुम सबके सुखदाइ ॥
आजु चलौ बृंदाबन जैऐ, गैयाँ चरैं अघाइ ।
सूरदास-प्रभु सुनि हरषित भए, घर तैं छाँक मँगाइ ॥

राग बिलावल

चले सब बृंदाबन समुहाइ

चले सब बृंदाबन समुहाइ ।
नंद-सुवन सब ग्वालनि टेरत, ल्यावहु गाइ फिराइ ॥
अति आतुर ह्वै फिरे सखा सब, जहँ-तहँ आए धाइ ।
पूछत ग्वाल बात किहिं कारन, बोले कुँवर कन्हाइ ॥
सुरभी बृंदाबन कौं हाँकौ, औरनि लेहु बुलाइ ।
सूर स्याम यह कही सबनि सौं,आपु चले अतुराइ ॥

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