श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 22

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 22

जसोदा ऊखल बाँधे स्याम

जसोदा ऊखल बाँधे स्याम ।
मन-मोहन बाहिर ही छाँड़े, आपु गई गृह-काम ॥
दह्यौ मथति, मुख तैं कछु बकरति, गारी दे लै नाम ।
घर-घर डोलत माखन चोरत, षट-रस मेरैं धाम ॥
ब्रज के लरिकनि मारि भजत हैं, जाहु तुमहु बलराम ।
सूरि स्याम ऊखल सौं बाधै, निरखहिं ब्रजकी बाम ॥

राग रामकली

निरखि स्याम हलधर मुसुकाने

निरखि स्याम हलधर मुसुकाने।
को बाँधे, को छोरे इनकौं, यह महिमा येई पै जाने ॥
उपतपति-प्रलय करत हैं येई, सेष सहस मुख सुजस बखाने ।
जमलार्जुन-तरु तोरि उधारन पारन करन आपु मन माने ॥
असुर सँहारन, भक्तनि तारन, पावन-पतित कहावत बाने ।
सूरदास-प्रभु भाव-भक्ति के अति हित जसुमति हाथ बिकाने ॥

राग गौरी

जसुमति, किहिं यह सीख दई

जसुमति, किहिं यह सीख दई ।
सुतहि बाँधि तू मथति मथानी, ऐसी निठुर भई ॥
हरैं बोलि जुवतिनि कौं लीन्हौं, तुम सब तरुनि नई ।
लरिकहि त्रास दिखावत रहिऐ, कत मुरुझाइ गई ॥
मेरे प्रान-जिवन-धन माधौ, बाँधें बेर भई ।
सूर स्याम कौं त्रास दिखावति, तुम कहा कहति दई ॥

राग धनाश्री

तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई

तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई ।
जुवती गई घरनि सब अपनैं, गृह-कारज जननी अटकाई ॥
आपु गए जमलार्जुन-तरु तर, परसत पात उठे झहराई ।
दिए गिराइ धरनि दोऊ तरु, सुत कुबेर के प्रगटे आई ॥
दोउ कर जोरि करत दोउ अस्तुति, चारि भुजा तिन्ह प्रगट दिखाई ।
सूर धन्य ब्रज जनम लियौ हरि, धरनि की आपदा नसाई ॥

धनि गोबिंद जो गोकुल आए

धनि गोबिंद जो गोकुल आए ।
धनि-धनि नंद , धन्य निसि-बासर, धनि जसुमति जिन श्रीधर जाए ॥
धनि-धनि बाल-केलि जमुना -तट, धनि बन सुरभी-बृंद चराए ।
धनि यह समौ, धन्य ब्रज-बासी, धनि-धनि बेनु मधुर धुनि गाए ॥
धनि-धनि अनख, उरहनौ धनि-धनि, धनिमाखन, धनि मोहन खाए ।
धन्य सूर ऊखल तरु गोबिंद हमहि हेतु धनि भुजा बँधाए ॥

राग बिलावल

 मोहन ! हौं तुम ऊपर वारी

मोहन ! हौं तुम ऊपर वारी ।
कंठ लगाइ लिये, मुख चूमति, सुंदर स्याम बिहारी ॥
काहे कौं ऊखल सौं बाँध्यौ, कैसी मैं महतारी ।
अतिहिं उतंग बयारि न लागत, क्यौं टूटे तरु भारी ॥
बारंबार बिचारति जसुमति , यह लीला अवतारी ।
सूरदास स्वामी की महिमा, कापै जाति बिचारी ॥

राग नट

अब घर काहू कैं जनि जाहु

अब घर काहू कैं जनि जाहु ।
तुम्हरैं आजु कमी काहे की , कत, तुम अनतहिं खाहु ॥
बरै जेंवरी जिहिं तुम बाँधे, परैं हाथ भहराइ ।
नंद मोहि अतिहीं त्रासत हैं, बाँधे कुँवर कन्हाइ ॥
रोग जाऊ मेरे हलधरके, छोरत हौ तब स्याम ।
सूरदास-प्रभु खात फिरौ जनि, माखन-दधि तुव धाम ॥

राग सारंग

 ब्रज-जुबती स्यामहि उर लावतिं

ब्रज-जुबती स्यामहि उर लावतिं ।
बारंबार निरखि कोमल तनु, कर जोरतिं, बिधि कौं जु मनावतिं ॥
कैसैं बचे अगम तरु कैं तर, मुख चूमतिं, यह कहि पछितावतिं ।
उरहन लै आवतिं जिहिं कारन, सो सुख फल पूरन करि पावतिं ॥
सुनौ महरि, इन कौं तुम बाँधति, भुज गहि बंधन-चिह्न दिखावतिं ।
सूरदास प्रभु अति रति-नागर, गोपी हरषि हृदय लपटावतिं ॥

मोहि कहतिं जुबती सब चोर

मोहि कहतिं जुबती सब चोर ।
खेलत कहूँ रहौं मैं बाहिर, चितै रहतिं सब मेरी ओर ॥
बोलि लेतिं भीतर घर अपनैं, मुख चूमतिं, भरि लेतिं अँकोर ।
माखन हेरि देतिं अपनैं कर, कछु कहि बिधि सौं करति निहोर ॥
जहाँ मोहि देखतिं, तहँ टेरतिं , मैं नहिं जात दुहाई तोर ।
सूर स्याम हँसि कंठ लगायौ, वै तरुनी कहँ बालक मोर ॥

राग कान्हरौ

 जसुमति कहति कान्ह मेरे प्यारे

जसुमति कहति कान्ह मेरे प्यारे, अपनैं ही आँगन तुम खेलौ ।
बोलि लेहु सब सखा संग के, मेरौ कह्यौ कबहुँ जिनि पेलौ ॥
ब्रज-बनिता सब चोर कहति तोहिं, लाजनि सकचि जात मुख मेरौ ।
आजु मोहि बलराम कहत हे, झूठहिं नाम धरति हैं तेरौ ॥
जब मोहि रिस लागति तब त्रासति, बाँधति मारति जैसैं चेरौ ।
सूर हँसति ग्वालिनि दै तारी, चोर नाम कैसैहुँ सुत फेरौ ॥

राग केदारौ

 धेनु दुहत हरि देखत ग्वालनि

धेनु दुहत हरि देखत ग्वालनि ।
आपुन बैठि गए तिन कैं सँग, सिखवहु मोहि कहत गोपालनि ॥
काल्हि तुम्हैं गो दुहन सिखावैं, दुहीं सबै अब गाइ ।
भौर दुहौ जनि नंद-दुहाई, उन सौं कहत सुनाई ॥
बड़ौ भयौ अब दुहत रहौंगौ, अपनी धेनु निबेरि ।
सूरदास प्रभु कहत सौंह दै, मोहिं लीजौ तुम टेरि ॥

राग बिलावल

 मैं दुहिहौं मोहि दुहन सिखावहु

मैं दुहिहौं मोहि दुहन सिखावहु ।
कैसैं गहत दोहनी घुटुवनि, कैसैं बछरा थन लै लावहु ॥
कैसै लै नोई पग बाँधत, कैसैं लै गैया अटकावहु ।
कैसैं धार दूध की बाजति, सोइ-सोइ बिधि तुम मोहि बतावहु ॥
निपट भई अब साँझ कन्हैया, गैयनि पै कहुँ चोट लगावहु ।
सूर स्याम सों कहत ग्वाल सब, धेनु दुहन प्रातहिं उठि आवहु ॥

राग कान्हरू

जागौ हो तुम नँद-कुमार

जागौ हो तुम नँद-कुमार !
हौं बलि जाउँ मुखारबिंद की, गो-सुत मेलौ खरिक सम्हार ॥
अब लौं कहा सोए मन-मोहन, और बार तुम उठत सबार ।
बारहि-बार जगावति माता, अंबुज-नैन! भयौ भिनुसार ॥
दधि मथि खै माखन बहु दैहौं, सकल ग्वाल ठाढ़े दरबार ।
उठि कैं मोहन बदन दिखावहु, सूरदास के प्रान-अधार ॥

राग बिलावल

जागहु हो ब्रजराज हरी

जागहु हो ब्रजराज हरी !
लै मुरली आँगन ह्वै देखौ, दिनमनि उदित भए द्विघरी ॥
गो-सुत गोठ बँधन सब लागे, गोदोहन की जून टरी ।
मधुर बचन कहि सुतहि जगावति, जननि जसोदा पास खरी ॥
भोर भयौ दधि-मथन होत, सब ग्वाल सखनि की हाँक परी ।
सूरदास-प्रभु -दरसन कारन, नींद छुड़ाई चरन धरी ॥

जागहु लाल, ग्वाल सब टेरत

जागहु लाल, ग्वाल सब टेरत ।
कबहुँ पितंबर डारि बदन पर, कबहुँ उघारि जननि तन हेरत ॥
सोवत मैं जागत मनमोहन, बात सुनत सब की अवसेरत ।
बारंबार जगावति माता, लोचन खोलि पलक पुनि गेरत ॥
पुनि कहि उठी जसोदा मैया, उठहु कान्ह रबि -किरनि उजेरत ।
सूर स्याम , हँसि चितै मातु-मुख , पट करलै, पुनि-पुनि मुख फेरत ॥

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