श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 21

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 21

हलधर सौं कहि ग्वालि सुनायौ

हलधर सौं कहि ग्वालि सुनायौ ।
प्रातहि तैं तुम्हरौ लघु भैया, जसुमति ऊखल बाँधि लगायौ ॥
काहू के लरिकहि हरि मार्‌यौ, भोरहि आनि तिनहिं गुहरायौ ।
तबही तैं बाँधे हरि बैठे, सो तुमकौं आनि जनायौ ॥
हम बरजी बरज्यौ नहिं मानति, सुनतहिं बल आतुर ह्वै धायौ ।
सूर स्याम बैठे ऊखल लगि, माता उर-तनु अतिहिं त्रसायौ ॥

यह सुनि कै हलधर तहँ धाए

यह सुनि कै हलधर तहँ धाए ।
देखि स्याम ऊखल सौं बाँधे, तबहीं दोउ लोचन भरि आए ॥
मैं बरज्यौ कै बार कन्हैया, भली करी दोउ हाथ बँधाए ।
अजहूँ छाँड़ौगे लँगराई, दोउ कर जोरि जननि पै आए ॥
स्यामहि छोरि मोहि बाँधै बरु, निकसत सगुन भले नहिं पाए ।
मेरे प्रान जिवन-धन कान्हा, तिनके भुज मोहि बँधे दिखाए ॥
माता सौं कहा करौं ढिठाई, सो सरूप कहि नाम सुनाए ।
सूरदास तब कहति जसोदा, दोउ भैया तुम इक-मत पाए ॥

एतौ कियौ कहा री मैया

एतौ कियौ कहा री मैया ?
कौन काज धन दूध दही यह, छोभ करायौ कन्हैया ॥
आईं सिखवन भवन पराऐं स्यानि ग्वालि बौरैया ।
दिन-दिन देन उरहनों आवतीं ढुकि-ढुकि करतिं लरैया ॥
सूधी प्रीति न जसुदा जानै, स्याम सनेही ग्वैयाँ ।
सूर स्यामसुंदरहिं लगानी, वह जानै बल-भैया ॥

काहे कौं कलह नाथ्यौ

काहे कौं कलह नाथ्यौ, दारुन दाँवरि बाँध्यौ, कठिन लकुट लै तैं, त्रास्यौ मेरैं भैया ।
नाहीं कसकत मन, निरखि कोमल तन, तनिक-से दधि काज, भली री तू मैया ॥
हौं तौ न भयौ री घर, देखत्यौ तेरी यौं अर, फोरतौ बासन सब, जानति बलैया ।
सूरदासहित हरि, लोचन आए हैं भरि,बलहू कौं बल जाकौ सोई री कन्हैया ॥

राग केदारौ

 काहे कौं जसोदा मैया, त्रास्यौ तैं बारौ कन्हैया

काहे कौं जसोदा मैया, त्रास्यौ तैं बारौ कन्हैया,
मोहन हमारौ भैया, केतौ दधि पियतौ ।
हौं तौ न भयौ री घर, साँटी दीनी सर-सर,
बाँध्यौ कर जेंवरिनि, कैसें देखि जियतौ ॥
गोपाल सबनि प्यारौ, ताकौं तैं कीन्हौ प्रहारो,
जाको है मोहू कौं गारौ, अजगुत कियतौ ।
और होतौ कोऊ, बिन जननी जानतौ सोऊ,
कैसैं जाइ पावतौ, जौ आँगुरिनि छियतो ॥
ठाढ़ौ बाँध्यौ बलबीर, नैननि गिरत नीर,
हरि जू तैं प्यारौ तोकौं, दूध-दही घियतौ ।
सूर स्याम गिरिधर, धराधर हलधर,
यह छबि सदा थिर, रहौ मेरैं जियतौ ॥

राग सोरठ

 जसुदा तोहिं बाँधि क्यौं आयौ

जसुदा तोहिं बाँधि क्यौं आयौ ।
कसक्यौ नाहिं नैकु मन तेरौ, यहै कोखि कौ जायौ ॥
सिव-बिरंचि महिमा नहिं जानत, सो गाइनि सँग धायौ ।
तातैं तू पहचानति नाहीं, कौन पुण्य तैं पायौ ॥
कहा भयौ जो घरकैं लरिका, चोरी माखन खायौ ?
इतनी कहि उकसारत बाहैं, रोष सहित बल धायौ ॥
अपनैं कर सब बंधन छोरे, प्रेम सहित उर लायौ ।
सूर सुबचन मनोहर कहि-कहि अनुज-सूल बिसरायौ ॥

राग बिलावल

काहे कौ हरि इतनौ त्रास्‍यौ

काहे कौ हरि इतनौ त्रास्‍यौ।
सुनि री मैया, मेरैं भैया कितनी गोरस नास्‍यौ।
जब रजु सौं कर गाढ़ैं बांधे, छर-छर मारी सांटी।
सूनैं घर बाबा नँद नाहीं, ऐसैं करि हरि डांटी।
और नैकु छूवै देखै स्‍यामहि, ताकौ करौ निपात।
तू जो करै बात, सोइ सांची, कहा कहौं तोहिं मात।
ठाढ़े बदत बात सब हलधर, माखन प्‍यारौ तोहि।
ब्रज-प्‍यारौ, जाकौ मोहि गारौ, छोरत काहे न आहि।
काकौ ब्रज, माखन दधि काकौ, बांधे जकरि कन्‍हाई।
सुनत सूर हलधर की बानी जननी सैन बताई।।

राग सोरठ

सुनहु बात मेरी बलराम

सुनहु बात मेरी बलराम ।
करन देहु इन की मोहि पूजा, चोरी प्रगटत नाम ॥
तुमही कहौ, कमी काहे की, नब-निधि मेरैं धाम ।
मैं बरजति, सुत जाहु कहूँ जनि, कहि हारी दिन-जाम ॥
तुमहु मोहि अपराध लगायौ, माखन प्यारौ स्याम ।
सुनि मैया, तोहि छाँड़ि कहौं किहि, को राखै तेरैं ताम ॥
तेरी सौं, उरहन लै आवतिं झूठहिं ब्रज की बाम ।
सूर स्याम अतिहीं अकुलाने, कब के बाँधे दाम ॥

राग सारंग

कहा करौं हरि बहुत खिझाई

कहा करौं हरि बहुत खिझाई ।
सहि न सकी, रिसहीं रिस भरि गई, बहुतै ढीठ कन्हाई ॥
मेरौ कह्यौ नैकु नहिं मानत, करत आपनी टेक ।
भोर होत उरहन लै आवतिं, ब्रज की बधू अनेक ॥
फिरत जहाँ-तहँ दुंद मचावत, घर न रहत छन एक ।
सूर स्याम त्रीभुवन कौ कर्ता जसुमति गहि निज टेक ॥

जसोदा ! कान्हहु तैं दधि प्यारौ

जसोदा ! कान्हहु तैं दधि प्यारौ ।
डारि देहि कर मथत मथानी, तरसत नंद-दुलारी ॥
दूध-दही-मक्खन लै वारौं, जाहि करति तू गारौ ।
कुम्हिलानौ मुख-चंद देखि छबि, कोह न नैकु निवारौ ॥
ब्रह्म, सनक, सिव ध्यान न पावत, सो ब्रज गैयनि चारौ ।
सूर स्याम पर बलि-बलि जैऐ, जीवन-प्रान हमारौ ॥

राग गूजरी

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