श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 20

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 20

 

चितै धौं कमल-नैन की ओर

चितै धौं कमल-नैन की ओर ।
कोटि चंद वारौं मुखछबि पर, ए हैं साहु कै चोर ॥
उज्ज्वल अरुन असित दीसति हैं, दुहु नैननि की कोर ।
मानौ सुधा-पान कें कारन , बैठे निकट चकोर ॥
कतहिं रिसाति जसोदा इन सौं, कौन ज्ञान है तोर ।
सूर स्याम बालक मनमोहन, नाहिन तरुन किसोर ॥

राग धनाश्री

देखि री देखि हरि बिलखात ।

देखि री देखि हरि बिलखात ।
अजिर लोटत राखि जसुमति, धूरि-धूसर गात ॥
मूँदि मुख छिन सुसुकि रोवत, छिनक मौन रहात ।
कमल मधि अलि उड़त सकुचत, पच्छ दल-आघात ॥
चपल दृग, पल भरे अँसुआ, कछुक ढरि-ढरि जात ।
अलप जल पर सीप द्वै लखि, मीन मनु अकुलात ॥
लकुट कैं डर ताकि तोहि तब पीत पट लपटात ।
सूर-प्रभु पर वारियै ज्यौं, भलेहिं माखन खात ॥

राग नटनारायनी

कब के बाँधे ऊखल दाम ।

कब के बाँधे ऊखल दाम ।
कमल-नैन बाहिर करि राखे, तू बैठी सुख धाम ॥
है निरदई, दया कछु नाहीं, लागि रही गृह-काम ।
देखि छुधा तैं मुख कुम्हिलानौ, अति कोमल तन स्याम ॥
छिरहु बेगि भई बड़ी बिरियाँ, बीति गए जुग जाम ।
तेरैं त्रास निकट नहिं आवत बोलि सकत नहिं राम ॥
जन कारन भुज आपु बँधाए,बचन कियौ रिषि-ताम ।
ताह दिन तैं प्रगट सूर-प्रभु यह दामोदर नाम ॥

राग सारंग

वारौं हौं वे कर जिन हरि कौ बदन छुयौ

वारौं हौं वे कर जिन हरि कौ बदन छुयौ
वारौं रसना सो जिहिं बोल्यौ है तुकारि ।
वारौं ऐसी रिस जो करति सिसु बारे पर
ऐसौ सुत कौन पायौ मोहन मुरारि ॥
ऐसी निरमोही माई महरि जसोदा भई
बाँध्यौ है गोपाल लाल बाहँनि पसारि ।
कुलिसहु तैं कठिन छतिया चितै री तेरी
अजहूँ द्रवति जो न देखति दुखारि ॥
कौन जानै कौन पुन्य प्रगटे हैं तेरैं आनि
जाकौं दरसन काज जपै मुख-चारि ।
केतिक गोरस-हानि जाकौ सूर तोरै कानि
डारौं तन स्याम रोम-रोम पर वारि ॥

राग गौरी

(जसोदा) तेरौ भलौ हियौ है माई

(जसोदा) तेरौ भलौ हियौ है माई !
कमल-नैन माखन कैं कारन, बाँधे ऊखल ल्याई ॥
जो संपदा देव-मुनि-दुर्लभ, सपनेहुँ देइ न दिखाई ।
याही तैं तू गर्ब भुलानी, घर बैठे निधि पाई ॥
जो मूरति जल-थल मैं ब्यापक, निगम न खौजत पाई ।
सो मूरति तैं अपनैं आँगन, चुटकी दै जु नचाई ॥
तब काहू सुत रोवत देखति, दौरि लेति हिय लाई ।
अब अपने घर के लरिका सौं इती करति निठुराई ॥
बारंबार सजल लोचन करि चितवत कुँवर कन्हाई ।
कहा करौं, बलि जाउँ, छोरि तू, तेरी सौंह दिवाई ॥
सुर-पालक, असुरनि उर सालक, त्रिभुवन जाहि डराई ।
सूरदास-प्रभु की यह लीला, निगम नेति नित गाई ॥

राग सोरठ

 देखि री नंद-नंदन ओर

देखि री नंद-नंदन ओर ।
त्रास तैं तन त्रसित भए हरि, तकत आनन तोर ॥
बार-बार डरात तोकौं, बरन बदनहिं थोर ।
मुकुर-मुख, दोउ नैन ढ़ारत, छनहिं-छन छबि-छोर ॥
सजल चपल कनीनिका पल अरुन ऐसे डोंर (ल) ।
रस भरे अंबुजन भीतर भ्रमत मानौ भौंर ॥
लकुट कैं डर देखि जैसे भए स्रोनित और ।
लाइ उरहिं, बहाइ रिस जिय, तजहु प्रकृति कठोर ॥
कछुक करुना करि जसोदा, करति निपट निहोर ।
सूर स्याम त्रिलोक की निधि, भलैहिं माखन-चोर ॥

राग केदारा

 तब तैं बाँधे ऊखल आनि

तब तैं बाँधे ऊखल आनि ।
बालमुकुंददहि कत तरसावति, अति कोमल अँग जानि ॥
प्रातकाल तैं बाँधे मोहन, तरनि चढ़यौ मधि आनि ।
कुम्हिलानौ मुख-चंद दिखावति, देखौं धौं नँदरानि ॥
तेरे त्रास तैं कोउ न छोरत, अब छोरौं तुम आनि ।
कमल-नैन बाँधेही छाँड़े, तू बैठी मनमानि ॥
जसुमति के मन के सुख कारन आपु बँधावत पानि ।
जमलार्जुन कौं मुक्त करन हित, सूर स्याम जिय ठानि ॥

राग धनाश्री

 कान्ह सौं आवत क्यौऽब रिसात

कान्ह सौं आवत क्यौऽब रिसात ।
लै-लै लकुट कठिन कर अपनै परसत कोमल गात ॥
दैखत आँसू गिरत नैन तैं यौं सोभित ढरि जात ।
मुक्ता मनौ चुगत खग खंजन, चोंच-पुटी न समात ॥
डरनि लोल डोलत हैं इहि बिधि, निरखि भ्रुवनि सुनि बात ॥
मानौ सूर सकात सरासन, उड़िबे कौ अकुलात ॥

राग नट

 जसुदा! यह न बूझि कौ काम

जसुदा! यह न बूझि कौ काम ।
कमल-नैन की भुजा देखि धौं, तैं बाँधे हैं दाम ॥
पुत्रहु तैं प्यारी कोउ है री, कुल-दीपक मनिधाम ।
हरि पर बारि डार सब तन, मन, धन, गोरस अरु ग्राम ॥
देखियत कमल-बदन कुमिलानौ, तू निरमोही बाम ।
बैठी है मंदिर सुख छहियाँ, सुत दुख पावत घाम ॥
येई हैं सब ब्रजके जीवन सुख प्रात लिएँ नाम ।
सूरदास-प्रभु भक्तनि कैं बस यह ठानी घनस्याम ॥

राग रामकली

ऐसी रिस तोकौं नँदरानी

ऐसी रिस तोकौं नँदरानी ।
बुद्धि तेरैं जिय उपजी बड़ी, बैस अब भई सयानी ॥
ढोटा एक भयौ कैसैहूँ करि, कौन-कौन करबर बिधि भानी ॥
क्रम-क्रम करि अब लौं उबर्‌यौ है, ताकौं मारि पितर दै पानी ॥
को निरदई रहै तेरैं घर, को तेरैं सँग बैठे आनी ।
सुनहु सूर कहि-कहि पचि हारीं , जुबती चलीं घरनि बिरुझानी ॥

राग धनाश्री

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