श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 2

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 2

 हरि मुख देखि हो बसुदेव

हरि मुख देखि हो बसुदेव ।
कोटि-काल-स्वरूप सुंदर, कोउ न जानत भेव ॥
चारि भुज जिहिं चारि आयुध, निरखि कै न पत्याउ ।
अजहुँ मन परतीति नाहीं नंद-घर लै जाउ ॥
स्वान सूते, पहरुवा सब, नींद उपजी गेह ।
निसि अँधेरी, बीजु चमकै, सघन बरषै मेह ॥
बंदि बेरी सबै छूटी, खुले बज्र -कपाट ।
सीस धरि श्रीकृष्ण लीने, चले गोकुल-बाट ॥
सिंह आगैं, सेष पाछैं, नदी भई भरिपूरि ।
नासिका लौं नीर बाढ़यौ, पार पैलो दूरि ॥
सीस तैं हुंकार कीनी, जमुन जान्यौ भेव ।
चरन परसत थाह दीन्हीं, पार गए बसुदेव ॥
महरि-ढिग उन जाइ राखे, अमर अति आनंद ।
सूरदास बिलास ब्रज-हित, प्रगटे आनँद-कंद ॥

राग बिलावल

गोकुल प्रगट भए हरि आइ

गोकुल प्रगट भए हरि आइ ।
अमर-उधारन असुर-संहारन, अंतरजामी त्रिभुवन राइ ॥
माथैं धरि बसुदेव जु ल्याए, नंद-महर-घर गए पहुँचाइ ।
जागी महरि, पुत्र-मुख देख्यौ, पुलकि अंग उर मैं न समाइ ॥
गदगद कंठ, बोलि नहिं आवै, हरषवंत ह्वै नंद बुलाइ ।
आवहु कंत,देव परसन भए, पुत्र भयौ, मुख देखौ धाइ ॥
दौरि नंद गए, सुत-मुख देख्यौ, सो सुख मापै बरनि न जाइ ।
सूरदास पहिलैं ही माँग्यौ, दूध पियावन जसुमति माइ ॥

उठीं सखी सब मंगल गाइ

उठीं सखी सब मंगल गाइ ।
जागु जसोदा, तेरैं बालक उपज्यो, कुँअर कन्हाइ ॥
जो तू रच्या-सच्यो या दिन कौं, सो सब देहि मँगाइ ।
देहि दान बंदीजन गुनि-गन, ब्रज-बासनि पहिराइ ॥
तब हँसि कहत जसोदा ऐसैं, महरहिं लेहु बुलाइ ।
प्रगट भयौ पूरब तप कौ फल, सुत-मुख देखौ आइ ॥
आए नंद हँसत तिहिं औसर, आनँद उर न समाइ ।
सूरदास ब्रज बासी हरषे, गनत न राजा-राइ ॥

राग गांधार

हौं इक नई बात सुनि आई

हौं इक नई बात सुनि आई ।
महरि जसौदा ढौटा जायौ, घर घर होति बधाई ॥
द्वारैं भीर गोप-गोपिनि की, महिमा बरनि न जाई ।
अति आनन्द होत गोकुल मैं, रतन भूमि सब छाई ॥
नाचत बृद्ध, तरुन अरु बालक, गोरस-कीच मचाई ।
सूरदास स्वामी सुख-सागर, सुंदर स्याम कन्हाई ॥

राग रामकली

हौं सखि, नई चाह इक पाई

हौं सखि, नई चाह इक पाई ।
ऐसे दिननि नंद कैं सुनियत, उपज्यौ पूत कन्हाई ॥
बाजत पनव-निसान पंचबिध, रुंज-मुरज सहनाई ।
महर-महरि ब्रज-हाट लुटावत, आनँद उर न समाई ॥
चलौं सखी, हमहूँ मिलि जैऐ, नैंकु करौ अतुराई ।
कोउ भूषन पहिर्‌यौ, कोउ पहिरति, कोउ वैसहिं उठि धाई ॥
कंचन-थार दूब-दधि-रोचन, गावति चारु बधाई ।
भाँति-भाति बनि चलीं जुवति जन, उपमा बरनि न जाई ॥
अमर बिमान चढ़े सुख देखत, जै-धुनि-सब्द सुनाई ।
सूरदास प्रभु भक्त-हेत-हित, दुष्टनि के दुखदाई ॥

ब्रज भयौ महर कैं पूत

ब्रज भयौ महर कैं पूत, जब यह बात सुनी ।
सुनि आनन्दे सब लोग, गोकुल नगर-सुनी ॥
अति पूरन पूरे पुन्य, रोपी सुथिर थुनी ।
ग्रह-लगन-नषत-पल सोधि, कीन्हीं बेद-धुनी ॥
सुनि धाई सब ब्रज नारि, सहज सिंगार किये ।
तन पहिरे नूतन चीर, काजर नैन दिये ॥
कसि कंचुकि, तिलक लिलार, सोभित हार हिये ।
कर-कंकन, कंचन-थार, मंगल-साज लिये ॥
सुभ स्रवननि तरल तरौन, बेनी सिथिल गुही ।
सिर बरषत सुमन सुदेस, मानौ मेघ फूही ॥
मुख मंडित रोरी रंग, सेंदूर माँग छुही ।
उर अंचल उड़त न जानि, सारी सुरँग सुही ॥
ते अपनैं-अपमैं मेल, निकसीं भाँति भली ।
मनु लाल-मुनैयनि पाँति, पिंजरा तोरि चली ॥
गुन गावत मंगल-गीत,मिलि दस पाँच अली ।
मनु भोर भऐँ रबि देखि, फूली कमल-कली ॥
पिय पहिलैं पहुँचीं जाइ अति आनंद भरीं ।
लइँ भीतर भुवन बुलाइ सब सिसु पाइ परी ॥
इक बदन उघारि निहारि, देहिं असीस खरी ।
चिरजीवो जसुदा-नंद, पूरन काम करी ॥
धनि दिन है, धनि ये राति, धनि-धनि पहर घरी ।
धनि-धन्य महरि की कोख, भाग-सुहाग भरी ॥
जिनि जायौ ऐसौ पूत, सब सुख-फरनि फरी ।
थिर थाप्यौ सब परिवार, मन की सूल हरी ॥
सुनि ग्वालनि गाइ बहोरि, बालक बोलि लए ।
गुहि गुंजा घसि बन-धातु, अंगनि चित्र ठए ॥
सिर दधि-माखन के माट, गावत गीत नए ।
डफ-झाँझ-मृदंग बजाइ, सब नँद-भवन गए ॥
मिलि नाचत करत कलोल, छिरकत हरद-दही ।
मनु बरषत भादौं मास, नदी घृत-दूध बही ॥
जब जहाँ-जहाँ चित जाइ, कौतुक तहीं-तहीं ।
सब आनँद-मगन गुवाल, काहूँ बदत नहीं ॥
इक धाइ नंद पै जाइ, पुनि-पुनि पाइ परैं ।
इक आपु आपुहीं माहिं, हँसि-हँसि मोद भरैं ॥
इक अभरन लेहिं उतारि, देत न संक करैं ।
इक दधि-गोरोचन-दूब, सब कैं सीस धरैं ॥
तब न्हाइ नंद भए ठाढ़, अरु कुस हाथ धरे ।
नाँदी मुख पितर पुजाइ, अंतर सोच हरे ॥
घसि चंदन चारु मँगाइ, बिप्रनि तिलक करे ।
द्विज-गुरु-जन कौं पहिराइ, सब कैं पाइ परे ॥
तहँ गैयाँ गनी न जाहिं, तरुनी बच्छ बढ़ीं ।
जे चरहिं जमुन कैं तीर, दूनैं दूध चढ़ीं ॥
खुर ताँबैं, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ीं ।
ते दीन्हीं द्विजनि अनेक, हरषि असीस पढ़ीं ॥
सब इष्ट मित्र अरु बंधु, हँसि-हँसि बोलि लिये ।
मथि मृगमद-मलय-कपूर, माथैं तिलक किये ॥
उर मनि माला पहिराइ, बसन बिचित्र दिये ।
दै दान-मान-परिधान, पूरन-काम किये ॥
बंदीजन-मागध-सूत, आँगन-भौन भरे ।
ते बोलैं लै-लै नाउँ, नहिं हित कोउ बिसरे ॥
मनु बरषत मास अषाढ़, दादुर-मोर ररे ।
जिन जो जाँच्यौ सोइ दीन, अस नँदराइ ढरे ॥
तब अंबर और मँगाइ, सारी सुरँग चुनी ।
ते दीन्हीं बधुनि बुलाइ, जैसी जाहि बनी ॥
ते निकसीं देति असीस, रुचि अपनी-अपनी ।
बहुरीं सब अति आनंद, निज गृह गोप-धनी ॥
पुर घर-घर भेरि-मृदंग, पटह-निसान बजे ।
बर बारनि बंदनवार, कंचन कलस सजे ॥
ता दिन तैं वै ब्रज लोग, सुख-संपति न तजे ।
सुनि सबकी गति यह सूर, जे हरि-चरन भजे ॥

राग आसावरी

आजु नंद के द्वारैं भीर

आजु नंद के द्वारैं भीर ।
इक आवत, इक जात विदा ह्वै , इक ठाढ़े मंदिर कैं तीर ॥
कोउकेसरि कौ तिलक बनावति, कोउ पहिरति कंचुकी सरीर ।
एकनि कौं गौ-दान समर्पत, एकनि कौं पहिरावत चीर ॥
एकनि कौं भूषन पाटंबर, एकनि कौं जु देत नग हीर ।
एकनि कौं पुहुपनि की माला, एकनि कौं चंदन घसि नीर ॥
एकनि माथैं दूब-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर ।
सूरदास धनि स्याम सनेही, धन्य जसोदा पुन्य-सरीर ॥

राग धनाश्री

बहुत नारि सुहाग-सुंदरि और घोष कुमारी

बहुत नारि सुहाग-सुंदरि और घोष कुमारी ।
सजन-प्रीतम-नाम लै-लै, दै परसपर गारि ॥
अनँद अतिसै भयौ घर-घर, नृत्य ठावँहि ठाँव ।
नंद-द्वारैं भेंट लै-लै उमह्यौ गोकुल गावँ ॥
चौक चंदन लीपि कै, धरि आरती संजोइ ।
कहति घोष-कुमारि, ऐसौ अनंद जौ नित होइ ॥
द्वार सथिया देति स्यामा, सात सींक बनाइ ।
नव किसोरी मुदित ह्वै-ह्वै गहति जसुदा-पाइ ॥
करि अलिंगन गोपिका, पहिरैं अभूषन-चीर ।
गाइ-बच्छ सँवारि ल्याए, भई ग्वारनि भीर ॥
मुदित मंगल सहित लीला करैं गोपी-ग्वाल ।
हरद, अच्छत, दूब, दधि लै, तिलक करैं ब्रजबाल ॥
एक एक न गनत काहूँ, इक खिलावत गाइ ।
एक हेरी देहिं, गावहिं, एक भेंटहिं धाइ ॥
एक बिरध-किसोर-बालक, एक जोबन जोग ।
कृष्न-जन्म सु प्रेम-सागर, क्रीड़ैं सब ब्रज-लोग ॥
प्रभु मुकुन्द कै हेत नूतन होहिं घोष-बिलास ।
देखि ब्रज की संपदा कौं, फूलै सूरदास ॥

राग गौरी

आजु बधायौ नंदराइ कैं

आजु बधायौ नंदराइ कैं, गावहु मंगलचार ।
आईं मंगल-कलस साजि कै, दधि फल नूतन-डार ॥
उर मेले नंदराइ कैं, गोप-सखनि मिलि हार ।
मागध-बंदी-सूत अति करत कुतूहल बार ॥
आए पूरन आस कै, सब मिलि देत असीस ।
नंदराइ कौ लाड़िलौ, जीवै कोटि बरीस ॥
तब ब्रज-लोगनि नंद जू, दीने बसन बनाइ ।
ऐसी सोभा देख कै, सूरदास बलि जाइ ॥

राग धनाश्री

 धनि-धनि नंद-जसोमति, धनि जग पावन रे

धनि-धनि नंद-जसोमति, धनि जग पावन रे । धनि हरि लियौ अवतार, सु धनि दिन आवन रे ॥
दसएँ मास भयौ पूत, पुनीत सुहावन रे । संख-चक्र-गदा-पद्म, चतुरभुज भावन रे ॥
बनि ब्रज-सुंदरि चलीं, सु गाइ बधावन रे । कनक-थार रोचन-दधि, तिलक बनावन रे ॥
नंद-घरहिं चलि गई, महरि जहँ पावन रे । पाइनि परि सब बधू, महरि बैठावन रे ॥
जसुमति धनि यह कोखि, जहाँ रहे बावन रे । भलैं सु दिन भयौ पूत, अमर अजरावन रे ॥
जुग-जुग जीवहु कान्ह, सबनि मन भावन रे । गोकुल -हाट-बजार करत जु लुटावन रे ॥
घर-घर बजै निसान, सु नगर सुहावन रे । अमर-नगर उतसाह, अप्सरा-गावन रे ॥
ब्रह्म लियौ अवतार, दुष्ट के दावन रे । दान सबै जन देत, बरषि जनु सावन रे ॥
मागध, सूत,भाँट, धन लेत जुरावन रे । चोवा-चंदन-अबिर, गलिनि छिरकावन रे ॥
ब्रह्मादिक, सनकादिक, गगन भरावन रे । कस्यप रिषि सुर-तात, सु लगन गनावत रे ॥
तीनि भुवन आनंद, कंस-डरपावन रे । सूरदास प्रभु जनमें, भक्त-हुलसावन रे ॥

राग गौरी

सोभा-सिंधु न अंत रही री

सोभा-सिंधु न अंत रही री ।
नंद-भवन भरि पूरि उमँगि चलि, ब्रज की बीथिनि फिरति बही री ॥
देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेंचति फिरति दही री ।
कहँ लगि कहौं बनाइ बहुत बिधि,कहत न मुख सहसहुँ निबही री ॥
जसुमति-उदर-अगाध-उदधि तैं, उपजी ऐसी सबनि कही री ।
सूरस्याम प्रभु इंद्र-नीलमनि, ब्रज-बनिता उर लाइ गही री ॥

राग कल्यान

आजु हो निसान बाजै, नंद जू महर के

आजु हो निसान बाजै, नंद जू महर के ।
आनँद-मगन नर गोकुल सहर के ॥
आनंद भरी जसोदा उमँगि अंग न माति, अनंदित भई गोपी गावति चहर के ।
दूब-दधि-रोचन कनक-थार लै-लै चली, मानौ इंद्र-बधु जुरीं पाँतिनि बहर के ॥
आनंदित ग्वाल-बाल, करत बिनोद ख्याल, भुज भरि-भरि अंकम महर के ।
आनंद-मगन धेनु स्रवैं थनु पय-फेनु, उमँग्यौ जमुन -जल उछलि लहर के ॥
अंकुरित तरु-पात, उकठि रहे जे गात, बन-बेली प्रफुलित कलिनि कहर के ।
आनंदित बिप्र, सूत, मागध, जाचक-गन, अमदगि असीस देत सब हित हरि के ॥
आनँद-मगन सब अमर गगन छाए पुहुप बिमान चढ़े पहर पहर के ।
सूरदास प्रभु आइ गोकुल प्रगट भए, संतनि हरष, दुष्ट-जन-मन धरके ॥

राग काफी

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