श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 19

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 19

बाँधौं आजु, कौन तोहि छोरै

बाँधौं आजु, कौन तोहि छोरै ।
बहुत लँगरई कीन्हीं मोसौं, भुज गहि ऊखल सौं जोरै ॥
जननी अति रिस जानि बँधायौ, निरखि बदन, लोचन जल ढोरै ।
यह सुनि ब्रज-जुवती सब धाई, कहतिं कान्ह अब क्यौं नहिं छोरै ॥
ऊखल सौं गहि बाँधि जसोदा, मारन कौं साँटी कर तोरै ।
साँटी देखि ग्वालि पछितानी, बिकल भई जहँ-तहँ मुख मोरे ॥
सुनहु महरि! ऐसी न बूझिए, सुत बाँधति माखन-दधि थोरैं ।
सूर स्याम कौं बहुत सतायौ, चूक परी हम तैं यह भोरैं ॥

राग सारंग

जाहु चली अपनैं-अपनैं घर

जाहु चली अपनैं-अपनैं घर ।
तुमहिं सबनि मिलि ढीठ करायौ, अब आईं छोरन बर ॥
मोहिं अपने बाबाकी सौहैं, कान्हि अब न पत्याउँ ।
भवन जाहु अपनैं-अपनैं सब, लागति हौं मैं पाउँ ॥
मोकौं जनि बरजौ जुवती कोउ, देखौ हरि के ख्याल ।
सूर स्याम सौं कहति जसोदा, बड़े नंद के लाल ॥

राग आसावरी

जसुदा! तेरौं मुख हरि जोवै

जसुदा! तेरौं मुख हरि जोवै ।
कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै, बंधन छोरि जसोवै ॥
जौ तेरौ सुत खरौ अचगरौ, तउ कोखि कौ जायौ ।
कहा भयौ जौ घर कैं ढोटा, चोरी माखन खायौ ॥
कोरी मटुकी दह्यौ जमायौ, जाख न पूजन पायौ ।
तिहिं घर देव-पितर काहे कौं , जा घर कान्हर आयौ ॥
जाकौ नाम लेत भ्रम छूटे, कर्म-फंद सब काटै ।
सोई इहाँ जेंवरी बाँधे, जननि साँटि लै डाँटै ॥
दुखित जानि दोउ सुत कुबेर के ऊखल आपु बँधायौ ।
सूरदास-प्रभु भक्त हेत ही देह धारि कै आयौ ॥

राग सोरठ

 देखौ माई कान्ह हिलकियनि रोवै

देखौ माई कान्ह हिलकियनि रोवै !
इतनक मुख माखन लपटान्यौ, डरनि आँसुवनि धोवै ॥
माखन लागि उलूखल बाँध्यौ, सकल लोग ब्रज जोवै ।
निरखि कुरुख उन बालनि की दिस, लाजनि अँखियनि गोवै ॥
ग्वाल कहैं धनि जननि हमारी, सुकर सुभि नित नोवै ।
बरबस हीं बैठारि गोद मैं, धारैं बदन निचोवै ॥
ग्वालि कहैं या गोरस कारन, कत सुतकी पति खोवै ?
आनि देहिं अपने घर तैं हम, चाहति जितौ जसोवै ॥
जब-जब बंधन छौर्‌यौ चाहतिं, सूर कहै यह को वै ।
मन माधौ तन, चित गोरस मैं, इहिं बिधि महरि बिलोवै ॥

राग बिहागरौ

 नैकुहूँ न दरद करति, हिलकिनी हरि रोवै

(माई) नैकुहूँ न दरद करति, हिलकिनी हरि रोवै ।
बज्रहु तैं कठिनु हियौ, तेरौ है जसोवै ॥
पलना पौढ़ाइ जिन्हैं बिकट बाउ काटै ॥
उलटे भुज बाँधि तिन्हैं लकुट लिए डाँटै ॥
नैकुहूँ न थकत पानि, निरदई अहीरी ।
अहौ नंदरानि, सीख कौन पै लही री ॥
जाकौं सिव-सनकादिक सदा रहत लोभा ।
सूरदास-प्रभु कौ मुख निरखि देखि सोभा ॥

राग सारंग

कुँवर जल लोचन भरि-भरि लेत

कुँवर जल लोचन भरि-भरि लेत ।
बालक-बदन बिलोकि जसोदा, कत रिस करति अचेत ॥
छोरि उदर तैं दुसह दाँवरी, डारि कठिन कर बेंत ।
कहि धौं री तोहि क्यौं करि आवै, सिसु पर तामस एत ॥
मुख आँसू अरु माखन-कनुका, निरखि नैन छबि देत ।
मानौ स्रवत सुधानिधि मोती, उडुगन-अवलि समेत ॥
ना जानौं किहिं पुन्य प्रगट भए इहिं ब्रज नंद -निकेत ।
तन-मन-धन न्यौछावर कीजै सूर स्याम कैं हेत ॥

राग बिहागरौ

 हरि के बदन तन धौं चाहि

हरि के बदन तन धौं चाहि ।
तनक दधि कारन जसोदा इतौ कहा रिसाहि ॥
लकुट कैं डर डरत ऐसैं सजल सोभित डोल ।
नील-नीरज-दल मनौ अलि-अंसकनि कृत लोल ॥
बात बस समृनाल जैसैं प्रात पंकज-कोस ।
नमित मुख इमि अधर सूचत, सकुच मैं कछु रोस ॥
कतिक गोरस-हानि, जाकौं करति है अपमान ।
सूर ऐसे बदन ऊपर वारिऐ तन-प्रान ॥

मुख छबि देखि हो नँद-घरनि

मुख छबि देखि हो नँद-घरनि !
सरद-निसि कौ अंसु अगनित इंदु-आभा-हरनि ॥
ललित श्रीगोपाल-लोचन लोल आँसू-ढरनि ।
मनहुँ बारिज बिथकि बिभ्रम, परे परबस परनि ॥
कनक मनिमय जटित कुंडल-जोति जगमग करनि ।
मित्र मोचन मनहुँ आए ,तरल गति द्वै तरनि ॥
कुटिल कुंतल, मधुप मिलि मनु कियो चाहत लरनि ।
बदन-कांति बिलोकि सोभा सकै सूर न बरनि ॥

मुख-छबि कहा कहौं बनाइ

मुख-छबि कहा कहौं बनाइ ।
निरखि निसि-पति बदन-सोभा, गयौ गगन दुराइ ॥
अमृत अलि मनु पिवन आए, आइ रहे लुभाइ ।
निकसि सर तैं मीन मानौ,, लरत कीर छुराइ ॥
कनक-कुंडल स्रवन बिभ्रम कुमुद निसि सकुचाइ।
सूर हरि की निरखि सोभा कोटि काम लजाइ ॥

हरि-मुख देखि हो नँद-नारि

हरि-मुख देखि हो नँद-नारि ।
महरि! ऐसे सुभग सुत सौं, इतौ कोह निवारि ॥
सरद मंजुल जलज लोचन लोल चितवनि दीन ।
मनहुँ खेलत हैं परस्पर मकरध्वज द्वै मीन ॥
ललित कन-संजुत कपोलनि लसत कज्जल-अंक ।
मनहुँ राजत रजनि, पूरन कलापति सकलंक ॥
बेगि बंधन छोरि, तन-मन वारि, लै हिय लाइ ।
नवल स्याम किसोर ऊपर, सूर जन बलि जाइ ॥

कहौ तौ माखन ल्यावैं घर तैं

कहौ तौ माखन ल्यावैं घर तैं ।
जा कारन तू छोरति नाहीं, लकुट न डारति कर तैं ॥
सुनहु महरि ! ऐसी न बूझियै, सकुचि गयौ मुख डर तैं ।
ज्यौं जलरुह ससि-रस्मि पाइ कै, फूलत नाहिं न सर तैं ॥
ऊखल लाइ भुजा धरि बाँधी, मोहनि मूरति बर तैं ।
सूर स्याम-लोचन जल बरषत जनु मुकुताहिमकर तैं ॥

राग बिहागरौ

कहन लागीं अब बढ़ि-बढ़ि बात

कहन लागीं अब बढ़ि-बढ़ि बात ।
ढोटा मेरौ तुमहिं बँधायौ तनकहि माखन खात ॥
अब मोहि माखन देतिं मँगाए, मेरैं घर कछु नाहिं !
उरहन कहि-कहि साँझ-सबारैं, तुमहिं बँधायौ याहि ॥
रिसही मैं मोकौं गहि दीन्हौ, अब लागीं पछितान ।
सूरदास अब कहति जसोदा बूझ्यौ सब कौ ज्ञान ॥

राग कल्याण

कहा भयौ जौ घर कैं लरिका चोरी माखन खायौ

कहा भयौ जौ घर कैं लरिका चोरी माखन खायौ ।
अहो जसोदा! कत त्रासति हौ, यहै कोखि कौ जायौ ॥
बालक अजौं अजान न जानै केतिक दह्यौ लुटायौ ।
तेरौ कहा गयौ? गोरस को गोकुल अंत न पायौ ॥
हा हा लकुट त्रास दिखरावति, आँगन पास बँधायौ ।
रुदन करत दोउ नैन रचे हैं, मनहुँ कमल-कन-छायौ ॥
पौढ़ि रहे धरनी पर तिरछैं, बिलखि बदन मुरझायौ ।
सूरदास-प्रभु रसिक-सिरोमनि, हँसि करि कंठ लगायौ ॥

राग धनाश्री

चित दै चितै तनय-मुख ओर

चित दै चितै तनय-मुख ओर ।
सकुचत सीत-भीत जलरुह ज्यौं, तुव कर लकुट निरखि सखि घोर ॥
आनन ललित स्रवत जल सोभित, अरुन चपल लोचन की कोर ।
कमल-नाल तैं मृदुल ललित भुज ऊखल बाँधे दाम कठोर ॥
लघु अपराध देखि बहु सोचति, निरदय हृदय बज्रसम तोर ।
सूर कहा सुत पर इतनी रिस, कहि इतनै कछु माखन-चौर ॥

जसुदा ! देखि सुत की ओर

जसुदा ! देखि सुत की ओर ।
बाल बैस रसाल पर रिस, इती कहा कठोर ॥
बार-बार निहारि तुव तन, नमित-मुख दधि -चोर ।
तरनि-किरनहिं परसि मानो, कुमुद सकुचत भोर ॥
त्रास तैं अति चपल गोलक, सजल सोभित छोर ।
मीन मानौ बेधि बंसी, करत जल झकझोर ॥
देत छबि अति गिरत उर पर, अंबु-कन कै जोर ।
ललित हिय जनु मुक्त-माला, गिरति टूटैं डोर ॥
नंद-नंदन जगत-बंदन करत आँसू कोर ।
दास सूरज मोहि सुख-हित निरखि नंदकिसोर ॥

राग बिलावल

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