श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 17

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 17

चौरी करत कान्ह धरि पाए

चौरी करत कान्ह धरि पाए ।
निसि-बासर मोहि बहुत सतायौ, अब हरि हाथहिं आए ॥
माखन-दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही ।
अब तौ घात परे हौ लालन, तुम्हें भलैं मैं चीन्ही ॥
दोउ भुज पकरि कह्यौ, कहँ जैहौ,माखन लेउँ मँगाइ।
तेरी सौं मैं नैकुँ न खायौ, सखा गए सब खाइ ॥
मुख तन चितै, बिहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ ।
लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ ॥

राग धनाश्री

कत हो कान्ह काहु कैं जात

कत हो कान्ह काहु कैं जात ।
वे सब ढीठ गरब गोरस कैं, मुख सँभारि बोलति नहिं बात ॥
जोइ-जोइ रुचै सोइ तुम मोपै माँगे लेहु किन तात ।
ज्यौं-ज्यौं बचन सुनौ मुख अमृत, त्यौ-त्यौं सुख पावत सब गात ॥
केशी टेव परी इन गोपिन, उरहन कैं मिस आवति प्रात ।
सूर सू कत हठि दोष लगावति, घरही कौ माखन नहिं खात ॥

राग गौरी

घर गौरस जनि जाहु पराए

घर गौरस जनि जाहु पराए ।
दूध भात भोजन घृत अमृत, अरु आछौ करि दह्यौ जमाए ॥
नव लख धेनु खरिक घर तेरैं, तू कत माखन खात पराए ।
निलज ग्वालिनी देति उरहनौ, वै झूठें करि बचन बनाए ॥
लघु-दीरघता कछु न जानैं, कहूँ बछरा कहुँ धेनु चराए ।
सूरदास प्रभु मोहन नागर, हँसि-हँसि जननी कंठ लगाए ॥

 ग्वालिनि! दोष लगावति जोर

(कान्ह कौं) ग्वालिनि! दोष लगावति जोर ।
इतनक दधि-माखन कैं कारन कबहिं गयौ तेरी ओर ॥
तू तौ धन-जोबन की माती, नित उठि आवति भोर ।
लाल कुँअर मेरौ कछू न जानै, तू है तरुनि किसोर ॥
कापर नैंन चढ़ाए डोलति, ब्रज मैं तिनुका तोर ।
सूरदास जसुदा अनखानी, यह जीवन-धन मोर ॥

राग बिलावल

गए स्याम ग्वालिनि -घर सूनैं

गए स्याम ग्वालिनि -घर सूनैं ।
माखन खाइ, डारि सब गोरस, बासन फोरि किए सब चूनै ॥
बड़ौ माट इक बहुत दिननि कौ, ताहि कर्‌यौ दस टूक ।
सोवत लरिकनि छिरकि मही सौं, हँसत चलै दै कूक ॥
आइ गई ग्वालिनि तिहिं औसर, निकसत हरि धरि पाए ।
देखे घर-बासन सब फूटे, दूध-दही ढरकाए ॥
दोउ भुज धरि गाढ़ैं करि लीन्हें, गई महरि कै आगैं ।
सूरदास अब बसै कौन ह्याँ, पति रहिहै ब्रज त्यागैं ॥

राग गौरी

 ऐसो हाल मेरैं घर कीन्हौ

ऐसो हाल मेरैं घर कीन्हौ, हौं ल्याई तुम पास पकरि कै ।
फौरि भाँड़ दधि माखन खायौ, उबर्‌यौ सो डार्‌यौ रिस करि कै ॥
लरिका छिरकि मही सौं देखै, उपज्यौ पूत सपूत महरि कै ।
बड़ौ माट घर धर्‌यौ जुगनि कौ, टूक-टूक कियौ सखनि पकरि कै ॥
पारि सपाट चले तब पाए, हौं ल्याई तुमहीं पै धरि कै ।
सूरदास प्रभु कौं यौं राखौ, ज्यौं राखिये जग मत्त जकरि कै ॥

राग-बिलावल

 करत कान्ह ब्रज-घरनि अचगरी

करत कान्ह ब्रज-घरनि अचगरी ।
खीजति महरि कान्ह सौं, पुनि-पुनि उरहन लै आवति हैं सगरी ॥
बड़े बाप के पूत कहावत, हम वै बास बसत इक बगरी ।
नंदहु तैं ये बड़े कहैहैं, फेरि बसैहैं यह ब्रज-नगरी ॥
जननी कैं खीझत हरि रोए, झूठहि मोहि लगावति धगरी ।
सूर स्याम-मुख पोंछि जसोदा, कहति सबै जुवती हैं लँगरी ॥

राग-कान्हरौ

मेरौ माई ! कौन कौ दधि चोरैं

मेरौ माई ! कौन कौ दधि चोरैं ।
मेरैं बहुत दई कौ दीन्हौ, लोग पियत हैं औरै ॥
कहा भयौ तेरे भवन गए जो, पियौ तनक लै भोरै ।
ता ऊपर काहैं गरजति है, मनु आई चढ़ि घोरै ॥
माखन खाइ, मह्यौ सब डारै, बहुरौ भाजन फोरै ।
सूरदास यह रसिक ग्वालिनी, नेह नवल सँग जोरै ॥

राग नट

अपनौ गाउँ लेउ नँदरानी

अपनौ गाउँ लेउ नँदरानी ।
बड़े बाप की बेटी, पूतहि भली पढ़ावति बानी ॥
सखा-भीर लै पैठत घर मैं, आपु खाइ तौ सहिऐ ।
मैं जब चली सामुहैं पकरन, तब के गुन कहा कहिऐ ॥
भाजि गए दुरि देखत कतहूँ, मैं घर पौढ़ी आइ ।
हरैं-हरैं बेनी गहि पाछै, बाँधी पाटी लाइ ॥
सुनु मैया, याकै गुन मोसौं, इन मोहि लयो बुलाई ।
दधि मैं पड़ी सेंत की मोपै चींटी सबै कढ़ाई ॥
टहल करत मैं याके घर की, यह पति सँग मिलि सोई ।
सूर-बचन सुनि हँसी जसोदा, ग्वालि रही मुख गोई ॥

राग रामकली

लोगनि कहत झुकति तू बौरी

लोगनि कहत झुकति तू बौरी ।
दधि माखन गाँठी दै राखति, करत फिरत सुत चोरी ॥
जाके घर की हानि होति नित, सो नहिं आनि कहै री ।
जाति-पाँति के लोग न देखति और बसैहै नैरी ॥
घर-घर कान्ह खान कौ डोलत, बड़ी कृपन तू है री ।
सूर स्याम कौं जब जोइ भावै, सोइ तबहीं तू दै री ॥

राग नटनारायन

 महरि तैं बड़ी कृपन है माई

महरि तैं बड़ी कृपन है माई ।
दूध-दही बहु बिधि कौ दीनौ, सुत सौं धरति छपाई ॥
बालक बहुत नहीं री तेरैं, एकै कुँवर कन्हाई ।
सोऊ तौ घरहीं घर डोलतु, माखन खात चोराई ॥
बृद्ध बयस पूरे पुन्यनि तैं, तैं बहुतै निधि पाई ।
ताहू के खैबे-पीबे कौं, कहा करति चतुराई ॥
सुनहु न बचन चतुर नागरि के, जसुमति नंद सुनाई ।
सूर स्याम कौं चोरी कैं, मिस, देखन है यह आई ॥

राग मलार

अनत सुत! गोरस कौं कत जात

अनत सुत! गोरस कौं कत जात ?
घर सुरभी कारी-धौरी कौ माखन माँगि न खात ॥
दिन प्रति सबै उरहनेकैं मिस, आवति हैं उठि प्रात ।
अनलहते अपराध लगावति, बिकट बनावति बात ॥
निपट निसंक बिबादित सनमुख, सुनि-सुनि नंद रिसात ।
मोसौं कहति कृपन तेरैं घर ढौटाहू न अघात ॥
करि मनुहारि उठाइ गोद लै, बरजति सुत कौं मात ।
सूर स्याम! नित सुनत उरहनौ, दुखख पावत तेरौ तात ॥

राग नट

 

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