श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 16

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 16

 

 आपु गए हरुएँ सूनैं घर

आपु गए हरुएँ सूनैं घर ।
सखा सबै बाहिर ही छाँड़े, देख्यौ दधि-माखन हरि भीतर ॥
तुरत मथ्यौ दधि-माखन पायौ, लै-लै खात, धरत अधरनि पर ।
सैन देइ सब सखा बुलाए, तिनहि देत भरि-भरि अपनैं कर ॥
छिटकि रही दधि-बूँद हृदय पर, इत उत चितवत करि मन मैं डर ।
उठत ओट लै लखत सबनि कौं, पुनि लै कात लेत ग्वालनि बर ॥
अंतर भई ग्वालि यह देखति मगन भई, अति उर आनँद भरि ।
सूर स्याम-मुख निरखि थकित भइ,कहत न बनै, रही मन दै हरि ॥

राग गौरी

गोपाल दुरे हैं माखन खात

गोपाल दुरे हैं माखन खात ।
देखि सखी ! सोभा जु बनी है स्याम मनोहर गात ॥
उठि,अवलोकि ओट ठाढ़े ह्वै, जिहिं बिधि हैं लखि लेत ।
चकित नैन चहूँ दिसि चितवत, और सखनि कौं देत ॥
सुंदर कर आनन समीप, अति राजत इहिं आकार ।
जलरुह मनौ बैर बिधु सौं तजि, मिलत लएँ उपहार ॥
गिरि-गिरि परत बदन तैं उर पर हैं दधि, सूत के बिंदु ।
मानहुँ सुभग सुधा-कन बरषत प्रियजन आगम इंदु ॥
बाल-बिनोद बिलोकि सूर-प्रभु सिथिल भईं ब्रजनारि ।
फुरै न बचन बरजिवैं कारन, रहीं बिचारि-बिचारि ॥

राग धनाश्री

ग्वालिनि जौ घर देखै आइ

ग्वालिनि जौ घर देखै आइ ।
माखन खाइ चोराइ स्याम सब, आपुन रहे छपाइ ॥
ठाढ़ी भई मथनियाँ कैं ढिग, रीती परि कमोरी ।
अबहिं गई, आई इनि पाइनि, लै गयौ को करि चोरी ?
भीतर गई, तहाँ हरि पाए, स्याम रहे गहि पाइ ।
सूरदास प्रभु ग्वालिनि आगैं, अपनौं नाम सुनाइ ॥

राग-सारंग

 जौ तुम सुनहु जसोदा गोरी

जौ तुम सुनहु जसोदा गोरी ।
नंदँ-नंदन मेरे मंदिर मैं आजु करन गए चोरी ॥
हौं भइ जाइ अचानक ठाढ़ी, कह्यौ भवन मैं को री ।
रहे छपाइ, सकुचि, रंचक ह्वै, भइ सहज मति भोरी ॥
मोहिं भयौ माखन-पछितावौ, रीती देखि कमोरी ।
जब गहिं बाँह कुलाहल कीनी, तब गहि चरन निहोरी ॥
लागे लैन नैन जल भरि-भरि, तब मैं कानि न तोरी ॥
सूरदास-प्रभु देत दिनहिं-दिन ऐसियै लरिक-सलोरी ॥

राग गौरी

देखी ग्वालि जमुना जात

देखी ग्वालि जमुना जात ।
आपु ता घर गए पूछत, कौन है, कहि बात ॥
जाइ देखे भवन भीतर , ग्वाल-बालक दोइ ।
भीर देखत अति डराने, दुहुनि दीन्हौं रोइ ॥
ग्वाल के काँधैं चड़े तब, लिए छींके उतारि ।
दह्यौ-माखन खात सब मिलि,दूध दीन्हौं डारि ॥
बच्छ ल सब छोरि दीन्हें, गए बन समुहाइ ।
छिरकि लरिकनि महीं सौं भरि, ग्वाल दए चलाइ ॥
देखि आवत सखी घर कौं, सखनि कह्यौ जु दौरि ।
आनि देखे स्याम घर मैं, भई ठाढ़ी पौरि ॥
प्रेम अंतर, रिस भरे मुख, जुवति बूझति बात ।
चितै मुख तन-सुधि बिसारी, कियौ उर नख-घात ॥
अतिहिं रस-बस भई ग्वालिनि, गेह-देह बिसारि ।
सूर-प्रभु-भुज गहे ल्याई, महरि पैं अनुसारि ॥

राग नट

महरि ! तुम मानौ मेरी बात

महरि ! तुम मानौ मेरी बात ।
ढूँढ़ि-ढ़ँढ़ि गोरस सब घर कौ, हर्‌यौ तुम्हारैं तात ॥
कैसें कहति लियौ छींके तैं, ग्वाल-कंध दै लात ।
घर नहिं पियत दूध धौरी कौ, कैसैं तेरैं खात ?
असंभाव बोलन आई है, ढीठ ग्वालिनी प्रात ।
ऐसौ नाहिं अचगरौ मेरौ, कहा बनावति बात ॥
का मैं कहौं, कहत सकुचति हौं, कहा दिखाऊँ गात !
हैं गुन बड़े सूर के प्रभु के, ह्याँ लरिका ह्वै जात ॥

राग गौरी

साँवरेहि बरजति क्यौं जु नहीं

साँवरेहि बरजति क्यौं जु नहीं ।
कहा करौं दिन प्रति की बातैं, नाहिन परतिं सही ॥
माखन खात, दूध लै डारत, लेपत देह दही ।
ता पाछैं घरहू के लरिकन, भाजत छिरकि मही ॥
जो कछु धरहिं दुराइ, दूरि लै, जानत ताहि तहीं ।
सुनहु महरि, तेरे या सुत सौं, हम पचि हारि रहीं ॥
चोरी अधिक चतुरई सीखी, जाइ न कथा कही ।
ता पर सूर बछुरुवनि ढीलत, बन-बन फिरतिं बही ॥

अब ये झूठहु बोलत लोग

अब ये झूठहु बोलत लोग ।
पाँच बरष अरु कछुक दिननिकौ, कब भयौ चोरी जोग ॥
इहिं मिस देखन आवतिं ग्वालिनि, मुँह फाटे जु गँवारि ।
अनदोषे कौं दोष लगावतिं, दई देइगौ टारि ॥
कैसैं करि याकी भुज पहुँची, कौन बेग ह्याँ आयौ ?
ऊखल ऊपर आनि पीठ दै, तापर सखा चढ़ायौ ॥
जौ न पत्याहु चलौ सँग जसुमति, देखौ नैन निहारि ।
सूरदास-प्रभु नैकु न बरज्यौ, मन मैं महरि बिचारि ॥

राग कान्हरौ

मेरौ गोपाल तनक, सौ, कहा करि जानै

मेरौ गोपाल तनक, सौ, कहा करि जानै दधि की चोरी ।
हाथ नचावत आवति ग्वारिनि, जीभ करै किन थोरी ॥
कब सीकैं चढ़ि माखन खायौ, कब दधि-मटुकी फोरी ।
अँगुरी करि कबहूँ नहिं चाखत, घरहीं भरी कमोरी ॥
इतनी सुनत घोष की नारी, रहसि चली मुख मोरी ।
सूरदास जसुदा कौ नंदन, जो कछु करै सो थोरी ॥

राग देवगंधार

कहै जनि ग्वारिन! झूठी बात

कहै जनि ग्वारिन! झूठी बात ।
कबहूँ नहिं मनमोहन मेरौ, धेनु चरावन जात ॥
बोलत है बतियाँ तुतरौहीं, चलि चरननि न सकात ।
केसैं करै माखन की चोरी, कत चोरी दधि खात ॥
देहीं लाइ तिलक केसरि कौ, जोबन-मद इतराति ।
सूरज दोष देति गोबिंद कौं, गुरु-लोगनि न लजाति ॥

राग सारंग

मेरे लाड़िले हो! तुम जाउ न कहूँ

मेरे लाड़िले हो! तुम जाउ न कहूँ ।
तेरेही काजैं गोपाल, सुनहु लाड़िले लाल ,राखे हैं भाजन भरि सुरस छहूँ ॥
काहे कौं पराएँ जाइ करत इते उपाइ, दूध-दही-घृत अरु माखन तहूँ ।
करति कछु न कानि, बकति हैं कटु बानि, निपट निलज बैन बिलखि सहूँ ॥
ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि,सकुचैं न देत गारि झगरत हूँ ।
कहाँ लगि सहौं रिस, बकत भई हौं कृस,इहिं मिस सूर स्याम-बदन चहूँ ॥

राग नटनारायन

इन अँखियन आगैं तैं मोहन

इन अँखियन आगैं तैं मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे ।
हौं बलि गई, दरस देखैं बिनु, तलफत हैं नैननि के तारे ॥
औरौ सखा बुलाइ आपने, इहिं आगन खेलौ मेरे बारे ।
निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं, सुंदर बाल-बिनोद तिहारे ॥
मधु, मेवा, पकवान, मिठाई, व्यंजन खाटे, मीठे, खारे ।
सूर स्याम जोइ-जोइ तुम चाहौ, सोइ-सोइ माँगि लेहु मेरे बारे ॥

राग कान्हरौ

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