श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 14

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 14

आँगन मैं हरि सोइ गए री

आँगन मैं हरि सोइ गए री ।
दोउ जननी मिलि कै हरुऐं करि सेज सहित तब भवन लए री ॥
नैकु नहीं घर मैं बैठत हैं, खेलहि के अब रंग रए री ।
इहिं बिधि स्याम कबहुँ नहिं सोए बहुत नींद के बसहिं भए री ॥
कहति रोहिनी सोवन देहु न, खेलत दौरत हारि गए री ।
सूरदास प्रभु कौ मुख निरखत हरखत जिय नित नेह नए री ॥

महराने तैं पाँड़े आयौ

महराने तैं पाँड़े आयौ ।
ब्रज घर-घर बूझत नँद-राउर पुत्र भयौ, सुनि कै, उठि धायौ ॥
पहुँच्यौ आइ नंद के द्वारैं, जसुमति देखि अनंद बढ़ायौ ।
पाँइ धोइ भीतर बैठार्‌यौ, भौजन कौं निज भवन लिपायौ ॥
जो भावै सो भोजन कीजै, बिप्र मनहिं अति हर्ष बढ़ायौ ।
बड़ी बैस बिधि भयौ दाहिनौ, धनि जसुमति ऐसौ सुत जायौ ॥
धेनु दुहाइ, दूध लै आई, पाँड़े रुचि करि खीर चढ़ायौ ।
घृत मिष्ठान्न, खीर मिश्रित करि, परुसि कृष्न हित ध्यान लगायौ ॥
नैन उघारि बिप्र जौ देखै, खात कन्हैया देखन पायौ ।
देखौ आइ जसोदा ! सुत-कृति, सिद्ध पाक इहिं आइ जुठायौ ॥
महरि बिनय करि दुहुकर जो रे, घृत-मधु-पय फिरि बहुत मँगायौ ॥
सूर स्याम कत करत अचगरी, बार-बार बाम्हनहि खिझायौ ॥

राग धनाश्री

 पाँड़े नहिं भोग लगावन पावै

पाँड़े नहिं भोग लगावन पावै ।
करि-करि पाक जबै अर्पत है, तबहीं-तब छूवैं आवै ॥
इच्छा करि मैं बाम्हन न्यौत्यौ, ताकौं स्याम खिझावै ।
वह अपने ठाकुरहि जिंवावै, तू ऐसैं उठि धावै ॥
जननी दोष देति कत मोकौं,बहु बिधान करि ध्यावै ।
नैन मूँदि, कर जोरि, नाम लै बारहिं बार बुलावै ॥
कहि अंतर क्यौं होइ भक्त सौं जो मेरैं मन भावै ?
सूरदास बलि-बलि बिलास पर, जन्म-जन्म जस गावै ॥

राग रामकली

 सफल जन्म प्रभु आजु भयौ

सफल जन्म प्रभु आजु भयौ ।
धनि गोकुल, धनि नंद-जसोदा, जाकैं हरि अवतार लयौ ॥
प्रगट भयौ अब पुन्य-सुकृत-फल , दीन बंधु मोहि दरस दयौ ।
बारंबार नंद कैं आँगन, लोटन द्विज आनंदमयौ ॥
मैं अपराध कियौ बिनु जानैं, कौ जानै किहिं भेष जयौ ।
सूरदास-प्रभु भक्त -हेत बस जसुमति-गृह आनन्द लयौ ॥

राग बिलावल

अहो नाथ ! जेइ-जेइ सरन आए

अहो नाथ ! जेइ-जेइ सरन आए तेइ तेइ भए पावन ।
महापतित-कुल -तारन, एकनाम अघ जारन, दारुन दुख बिसरावन ॥
मोतैं को हो अनाथ, दरसन तैं भयौं सनाथ देखत नैन जुड़ावन ।
भक्त हेतदेह धरन, पुहुमी कौ भार हरन, जनम-जनम मुक्तावन ॥
दीनबंधु, असरनके सरन, सुखनि जसुमति के कारन देह धरावन ।
हित कै चित की मानत सबके जियकी जानत सूरदास-मन-भावन ॥

 मया करिये कृपाल, प्रतिपाल संसार

मया करिये कृपाल, प्रतिपाल संसार उदधि जंजाल तैं परौं पार ।
काहू के ब्रह्मा, काहू के महेस, प्रभु! मेरे तौ तुमही अधार ॥
दीन के दयाल हरि, कृपा मोकौं करि, यह कहि-कहि लोटत बार-बार ।
सूर स्याम अंतरजामी स्वामी जगत के कहा कहौं करौ निरवार ॥

राग बिलावल

खेलत स्याम पौरि कैं बाहर

खेलत स्याम पौरि कैं बाहर ब्रज-लरिका सँग जोरी ।
तैसेइ आपु तैसेई लरिका, अज्ञ सबनि मति थोरी ॥
गावत हाँक देत, किलकारत, दुरि देखति नँदरानी ।
अति पुलकित गदगद मुख बानी, मन-मन महरि सिहानी ॥
माटी लै मुख मेलि दई हरि, तबहिं जसोदा जानी ।
साँटी लिए दौरि भुज पकर्‌यौ, स्याम लँगरई ठानी ॥
लरिकन कौं तुम सब दिन झुठवत, मोसौं कहा कहौगे ।
मैया मैं माटी नहिं खाई, मुख देखैं निबहौगे ॥
बदन उधारि दिखायौ त्रिभुवन, बन घन नदी-सुमेर ।
नभ-ससि-रबि मुख भीतरहीं सब सागर-धरनी-फेर ॥
यह देखत जननी मन ब्याकुल, बालक-मुख कहा आहि ।
नैन उधारि, बदन हरि मुँद्यौ, माता-मन अवगाहि ॥
झूठैं लोग लगावत मोकौं, माटी मोहि न सुहावै ।
सूरदास तब कहति जसोदा, ब्रज-लोगनि यह भावै ॥

मोहन काहैं न उगिलौ माटी

मोहन काहैं न उगिलौ माटी ।
बार-बार अनरुचि उपजावति, महरि हाथ लिये साँटी ॥
महतारी सौं मानत नाहीं कपट-चतुरई ठाटी ।
बदन उधारि दिखायौ अपनौ, नाटक की परिपाटी ॥
बड़ी बार भइ, लोचन उधरे, भरम-जवनिका फाटी ।
सूर निरखि नँदरानि भ्रमित भइ, कहति न मीठी-खाटी ॥

राग धनाश्री

मो देखत जसुमति तेरैं ढोटा

मो देखत जसुमति तेरैं ढोटा, अबहीं माटी खाई ।
यह सुनि कै रिस करि उठि धाई, बाहँ पकरि लै आई ॥
इक कर सौं भुज गहि गाढ़ैं करि, इक कर लीन्हीं साँटी ।
मारति हौं तोहि अबहिं कन्हैया, बेगि न उगिलै माटी ॥
ब्रज-लरिका सब तेरे आगैं, झूठी कहत बनाइ ।
मेरे कहैं नहीं तू मानति, दिखरावौं मुख बाइ ॥
अखिल ब्रह्मंड-खंड की महिमा, दिखराई मुख माँहि ।
सिंधु-सुमेर-नदी-बन-पर्वत चकित भई मन चाहि ॥
करतैं साँटि गिरत नहिं जानी, भुजा छाँड़ि अकुलानी ।
सूर कहै जसुमति मुख मूँदौ, बलि गई सारँगपानी ॥

राग रामकली

नंदहि कहति जसोदा रानी

नंदहि कहति जसोदा रानी ।
माटी कैं मिस मुख दिखरायौ, तिहूँ लोक रजधानी ॥
स्वर्ग, पताल, धरनि, बन, पर्वत, बदन माँझ रहे आनी ।
नदी-सुमेर देखि चकित भई, याकी अकथ कहानी ॥
चितै रहे तब नंद जुवति-मुख मन-मन करत बिनानी ।
सूरदास तब कहति जसोदा गर्ग कही यह बानी ॥

राग सारंग

कहत नंद जसुमति सौं बात

कहत नंद जसुमति सौं बात ।
कहा जानिए, कह तैं देख्यौ, मेरैं कान्ह रिसात ॥
पाँच बरष को मेरौ नन्हैया, अचरज तेरी बात ।
बिनहीं काज साँटि लै धावति, ता पाछै बिललात ॥
कुसल रहैं बलराम स्याम दोउ, खेलत-खात-अन्हात ।
सूर स्याम कौं कहा लगावति, बालक कोमल-बात ॥

राग सोरठ

देखौ री! जसुमति बौरानी

देखौ री! जसुमति बौरानी ।
घर घर हाथ दिखावति डोलति,गोद लिए गोपाल बिनानी ॥
जानत नाहिं जगतगुरु माधव, इहिं आए आपदा नसानी ।
जाकौ नाउँ सक्ति पुनि जाकी, ताकौं देत मंत्र पढ़ि पानी॥
अखिल ब्रह्मंड उदर गत जाकैं, जाकी जोति जल-थलहिं समानी ।
सूर सकल साँची मोहि लागति, जो कछु कही गर्ग मुख बानी ॥

राग बिलावल

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