श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 11

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 11

 जागिए गोपाल लाल, आनँद-निधि नंद-बाल

जागिए गोपाल लाल, आनँद-निधि नंद-बाल,जसुमति कहै बार-बार, भोर भयौ प्यारे ।
नैन कमल-दल बिसाल, प्रीति-बापिका-मराल,मदन ललित बदन उपर कोटि वारि डारे ॥
उगत अरुन बिगत सर्बरी, ससांक किरन-हीन,दीपक सु मलीन, छीन-दुति समूह तारे ।
मनौ ज्ञान घन प्रकास, बीते सब भव-बिलास, आस-त्रास-तिमिर तोष-तरनि-तेज जारे ॥
बोलत खग-निकर मुखर, मधुर होइ प्रतीति सुनौ,परम प्रान-जीवन-धन मेरे तुम बारे ।
मनौ बेद बंदीजन सूत-बृंद मागध-गन,बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे ॥
बिकसत कमलावती, चले प्रपुंज-चंचरीक, गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज न्यारे ।
मानौ बैराग पाइ, सकल सोक-गृह बिहाइ,प्रेम-मत्त फिरत भृत्य, गुनत गुन तिहारे ॥
सुनत बचन प्रिय रसाल, जागे अतिसय दयाल ,भागे जंजाल-जाल, दुख-कदंब टारे ।
त्यागे-भ्रम-फंद-द्वंद्व निरखि कै मुखारबिंद,सूरदास अति अनंद, मेटे मद भारे ॥

राग ललित

प्रात भयौ, जागौ गोपाल

प्रात भयौ, जागौ गोपाल ।
नवल सुंदरी आईं, बोलत तुमहि सबै ब्रजबाल ॥
प्रगट्यौ भानु, मंद भयौ उड़पति, फूले तरुन तमाल ।
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजवनिता, गूँथि कुसुम बनमाल ॥
मुखहि धौइ सुंदर बलिहारी, करहु कलेऊ लाल ।
सूरदास प्रभु आनँद के निधि, अंबुज-नैन बिसाल ॥

जागौ, जागौ हो गोपाल

जागौ, जागौ हो गोपाल ।
नाहिन इतौ सोइयत सुनि सुत, प्रात परम सुचि काल ॥
फिरि-फिरि जात निरखि मुख छिन-छिन, सब गोपनि बाल ।
बिन बिकसे कल कमल-कोष तैं मनु मधुपनि की माल ॥
जो तुम मोहि न पत्याहु सूर-प्रभु, सुन्दर स्याम तमाल ।
तौ तुमहीं देखौ आपुन तजि निद्रा नैन बिसाल ॥

उठौ नँदलाल भयौ भिनसार

उठौ नँदलाल भयौ भिनसार, जगावति नंद की रानी ।
झारी कैं जल बदन पखारौ, सुख करि सारँगपानी ॥
माखन-रोटी अरु मधु-मेवा जो भावै लेउ आनी ।
सूर स्याम मुख निरखि जसोदा,मन-हीं-मन जु सिहानी ॥

राग भैरव

तुम जागौ मेरे लाड़िले

तुम जागौ मेरे लाड़िले, गोकुल -सुखदाई ।
कहति जननि आनन्द सौं, उठौ कुँवर कन्हाई ॥
तुम कौं माखन-दूध-दधि, मिस्री हौं ल्याई ।
उठि कै भोजन कीजिऐ, पकवान-मिठाई ॥
सखा द्वार परभात सौं, सब टेर लगाई ।
वन कौं चलिए साँवरे, दयौ तरनि दिखाई ॥
सुनत बचन अति मोद सौं जागे जदुराई ।
भोजन करि बन कौं चले, सूरज बलि जाई ॥

राग बिलावल

भोर भयौ जागौ नँद-नंद

भोर भयौ जागौ नँद-नंद ।
तात निसि बिगत भई, चकई आनंदमई,तरनि की किरन तैं चंद भयौ नंद ॥
तमचूर खग रोर, अलि करैं बहु सोर,बेगि मोचन करहु, सुरभि-गल-फंद ।
उठहु भोजन करहु, खोरी उतारि धरहु,जननि प्रति देहु सिसु रूप निज कंद ॥
तीय दधि-मथन करैं, मधुर धुनि श्रवन परैं,कृष्न जस बिमल गुनि करति आनंद ।
सूरप्रभु हरि-नाम उधारत जग-जननि, गुननि कौं देखि कै छकित भयौ छंद ॥

कौन परी मेरे लालहि बानि

कौन परी मेरे लालहि बानि ।
प्रात समय जगन की बिरियाँ सोवत है पीतांबर तानि।।
संग सखा ब्रज-बाल खरे सब, मधुबन धेनु चरावन जान ।
मातु जसोदा कब को ठाढ़ी, दधि-ओदन भोजन लिये पान।।
तुम मोहन ! जीवन-धन मेरे, मुरली नैकु सुनावहु कान ।
यह सुनि स्रवन उठे नन्दनन्दन, बंसी निज मांग्यौ मृदु बानि।।
जननी कहति लेहु मनमोहन, दधि ओदन घृत आन्यौ सानि ।
सूर सु बलि-बलि जाऊं बेनु को, जिहि लगि लाल जगे हित मानि।।

जागिये गुपाल लाल! ग्वाल द्वार ठाढ़े

जागिये गुपाल लाल! ग्वाल द्वार ठाढ़े ।
रैनि-अंधकार गयौ, चंद्रमा मलीन भयौ,
तारागन देखियत नहिं तरनि-किरनि बाढ़े ॥
मुकुलित भये कमल-जाल, गुंज करत भृंग-माल,
प्रफुलित बन पुहुप डाल, कुमुदिनि कुँभिलानी ।
गंध्रबगन गान करत, स्नान दान नेम धरत,
हरत सकल पाप, बदत बिप्र बेद-बानी ॥
बोलत,नँद बार-बार देखैं मुख तुव कुमार,
गाइनि भइ बड़ी बार बृंदाबन जैबैं ।
जननि कहति उठौ स्याम, जानत जिय रजनि ताम,
सूरदास प्रभु कृपाल , तुम कौं कछु खैबैं ॥

 सो सुख नंद भाग्य तैं पायौ

सो सुख नंद भाग्य तैं पायौ ।
जो सुख ब्रह्मादिक कौं नाहीं, सोई जसुमति गोद खिलायौ ॥
सोइ सुख सुरभि-बच्छ बृंदाबन, सोइ सुख ग्वालनि टेरि बुलायौ ।
सोइ सुख जमुना-कूल-कदंब चढ़ि, कोप कियौ काली गहि ल्यायौ ॥
सुख-ही सुख डोलत कुंजनि मैं, सब सुख निधि बन तैं ब्रज आयौ ।
सूरदास-प्रभु सुख-सागर अति, सोइ सुख सेस सहस मुख गायौ ॥

राग सोरठ

खेलत स्याम ग्वालनि संग

खेलत स्याम ग्वालनि संग ।
सुबल हलधर अरु श्रीदामा, करत नाना रंग ॥
हाथ तारी देत भाजत, सबै करि करि होड़ ।
बरजै हलधर ! तुम जनि, चोट लागै गोड़ ॥
तब कह्यौ मैं दौरि जानत, बहुत बल मो गात ।
मेरी जोरी है श्रीदामा, हाथ मारे जात ॥
उठे बोलि तबै श्रीदामा, जाहु तारी मारि ।
आगैं हरि पाछैं श्रीदामा, धर्‌यौ स्याम हँकारि ॥
जानि कै मैं रह्यो ठाढ़ौ छुवत कहा जु मोहि ।
सूर हरि खीझत सखा सौं, मनहिं कीन्हौ कोह ॥

राग रामकली

सखा कहत हैं स्याम खिसाने

सखा कहत हैं स्याम खिसाने ।
आपुहि-आपु बलकि भए ठाढ़े, अब तुम कहा रिसाने ?
बीचहिं बोलि उठे हलधर तब याके माइ न बाप ।
हारि-जीत कछु नैकु न समुझत, लरिकनि लावत पाप ॥
आपुन हारि सखनि सौं झगरत, यह कहि दियौ पठाइ ।
सूर स्याम उठि चले रोइ कै, जननी पूछति धाइ ॥

राग गौरी

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ ।
मोसौ कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ ?
कहा करौं इहि रिस के मारैं खेलन हौं नहिं जात ।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता को है तेरौ तात ॥
गोरे नंद जसोदा गोरी, तू कत स्यामल गात ।
चुटुकी दै-दै ग्वाल नवावत, हँसत, सबै मुसुकात ॥
तू मोही कौं मारन सीखी, दाउहि कबहुँ न खीझै ।
मोहन-मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै ॥
सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत ।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं, हौं माता तू पूत ॥

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