श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 10

श्रीकृष्ण बाल-माधुरी -भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 10

ऐसौ हठी बाल गोविन्दा

(मेरी माई) ऐसौ हठी बाल गोविन्दा ।
अपने कर गहि गगन बतावत, खेलन कौं माँगै चंदा ॥
बासन मैं जल धर्‌यौ जसोदा, हरि कौं आनि दिखावै ।
रुदन करत, ढूँढ़त नहिं पावत, चंद धरनि क्यों आवै !
मधु-मेवा-पकवान-मिठाई, माँगि लेहु मेरे छौना ।
चकई-डोरि पाट के लटकन, लेहु मेरे लाल खिलौना ॥
संत-उबारन, असुर-सँहारन, दूरि करन दुख-दंदा ।
सूरदास बलि गई जसोदा, उपज्यौ कंस-निकंदा ॥

राग रामकली

मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं

मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं ।
जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं ॥
सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं ।
ह्वै हौं पूत नंद बाबा को , तेरौ सुत न कहैहौं ॥
आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं ।
हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं ॥
तेरी सौ, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं ॥
सूरदास ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं ॥

राग केदारौ

मैया री मैं चंद लहौंगौ

मैया री मैं चंद लहौंगौ ।
कहा करौं जलपुट भीतर कौ, बाहर ब्यौंकि गहौंगौ ॥
यह तौ झलमलात झकझोरत, कैसैं कै जु लहौंगौ ?
वह तौ निपट निकटहीं देखत ,बरज्यौ हौं न रहौंगौ ॥
तुम्हरौ प्रेम प्रगट मैं जान्यौ, बौराऐँ न बहौंगौ ।
सूरस्याम कहै कर गहि ल्याऊँ ससि-तन-दाप दहौंगौ ॥

राग रामकली

 लै लै मोहन ,चंदा लै

लै लै मोहन ,चंदा लै ।
कमल-नैन! बलि जाउँ सुचित ह्वै, नीचैं नैकु चितै ॥
जा कारन तैं सुनि सुत सुंदर, कीन्ही इती अरै ।
सोइ सुधाकर देखि कन्हैया, भाजन माहिं परै ॥
नभ तैं निकट आनि राख्यौ है, जल-पुट जतन जुगै ।
लै अपने कर काढ़ि चंद कौं, जो भावै सो कै ॥
गगन-मँडल तैं गहि आन्यौ है, पंछी एक पठै ।
सूरदास प्रभु इती बात कौं कत मेरौ लाल हठै ॥

राग धनाश्री

तुव मुख देखि डरत ससि भारी

तुव मुख देखि डरत ससि भारी ।
कर करि कै हरि हेर्‌यौ चाहत, भाजि पताल गयौ अपहारी ॥
वह ससि तौ कैसेहुँ नहिं आवत, यह ऐसी कछु बुद्धि बिचारी ।
बदन देखि बिधु-बुधि सकात मन, नैन कंज कुंडल इजियारी ॥
सुनौ स्याम, तुम कौं ससि डरपत, यहै कहत मैं सरन तुम्हारी ।
सूर स्याम बिरुझाने सोए, लिए लगाइ छतिया महतारी ॥

राग बिहागरौ

 जसुमति लै पलिका पौढ़ावति

जसुमति लै पलिका पौढ़ावति ।
मेरौ आजु अतिहिं बिरुझानौ, यह कहि-कहि मधुरै सुर गावति ॥
पौढ़ि गई हरुऐं करि आपुन, अंग मोर तब हरि जँभुआने ।
कर सौं ठोंकि सुतहि दुलरावति, चटपटाइ बैठे अतुराने ॥
पौढ़ौ लाल, कथा इक कहिहौं, अति मीठी, स्रवननि कौं प्यारी ।
यह सुनि सूर स्याम मन हरषे, पौढ़ि गए हँसि देत हुँकारी ॥

राग कैदारौ

सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी

सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी ।
कमल-नैन मन आनँद उपज्यौ, चतुर-सिरोमनि देत हुँकारी ॥
दसरथ नृपति हती रघुबंसी, ताकैं प्रगट भए सुत चारी ।
तिन मैं मुख्य राम जो कहियत, जनक-सुता ताकी बर नारी ॥
तात-बचन लगि राज तज्यौ तिन, अनुज-घरनि सँग गए बनचारी ।
धावत कनक-मृगा के पाछैं, राजिव-लोचन परम उदारी ॥
रावन हरन सिया कौ कीन्हौ, सुनि नँद-नंदन नींद निवारी ।
चाप-चाप करि उठे सूर-प्रभु. लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी ॥

नाहिनै जगाइ सकत, सुनि सुबात सजनी

नाहिनै जगाइ सकत, सुनि सुबात सजनी ।
अपनैं जान अजहुँ कान्ह मानत हैं रजनी ॥
जब जब हौं निकट जाति, रहति लागि लोभा ।
तन की गति बिसरि जाति, निरखत मुख-सोभा ॥
बचननि कौं बहुत करति, सोचति जिय ठाढ़ी ।
नैननि न बिचारि परत देखत रुचि बाढ़ी ॥
इहिं बिधि बदनारबिंद, जसुमति जिय भावै ।
सूरदास सुख की रासि, कापै कहि आवै ॥

राग ललित

 जागिए, व्रजराज-कुँवर, कमल-कुसुम फूले

जागिए, व्रजराज-कुँवर, कमल-कुसुम फूले ।
कुमुद-बृँद सकुचित भए, भृंग लता भूले ॥
तमचुर खग रोर सुनहु, बोलत बनराई ।
राँभति गो खरिकनि मैं, बछरा हित धाई ॥
बिधु मलीन रबि-प्रकास गावत नर-नारी ।
सूर स्याम प्रात उठौ, अंबुज-कर-धारी ॥

राग बिलावल

प्रात समय उठि, सोवत सुत कौ

प्रात समय उठि, सोवत सुत कौ बदन उघार्‌यौ नंद ।
रहि न सके अतिसय अकुलाने, बिरह निसा कैं द्वंद ॥
स्वच्छ सेज मैं तैं मुख निकसत, गयौ तिमिर मिटि मंद ।
मनु पय-निधि सुर मथत फेन फटि, दयौ दिखाई चंद ॥
धाए चतुर चकोर सूर सुनि, सब सखि -सखा सुछंद ।
रही न सुधि सरीर अरु मन की, पीवत किरनि अमंद ॥

राग रामकली

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