शैतान का पतन-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

शैतान का पतन-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

जानते हो कि शैतान का पतन क्यों हुआ?
इसलिए कि भगवान
जरा ज्यादा ऊँचा उठ गये थे ।

इसी से शैतान का दिमाग फिरा ।
दुनिया का सन्तुलन ठीक रखने के लिए
बेचारा नीचे नरक में गिरा-

भगवान को ललकारता हुआ
कि अगर तुम बिना दाग वाले चित्र हो,
प्रभो! तुम यदि इतने ऊँचे हो,
इतने पवित्र हो,
तो मैं नीचे अवश्य गिरूँगा ।
और जो रास्ता नरक को जाता है,
उसके दोनों ओर अंगूर के बाग लगाऊँगा;
अंगूर की लताएँ, अफीम के पौधे और गूलर के पेड़,
और भी अनेक तरह के फूल रंग-बिरंगे, ढेर के ढेर ।

और जो आत्माएँ मेरे समान गिर जायेंगी,
वे खाने को अंगूर पायेंगी ।
थरथराते हाथों से जाम धरे हुए,
बालों में अफीम के फूल भरे हुए,
ये आत्माएँ मस्ती के गीत गायेंगी ।
उछलती, कूदती, खेलती,
एक-दूसरी को गुदगुदाती-ढकेलती
हंसी-खुशी के साथ नरक की ओर जायेंगी ।

स्वर्ग और नरक
एक ही तराजू के दो पल्ले हैं ।
मूँज की डोरी और रेशम के छल्ले हैं।
तराजू के दोनों पल्ले जब हिलते हैं,
कभी-कभी एक दूसरे से जा मिलते हैं।

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