शेष पूंजी-प्यार के सौजन्य से-परिवेश : हम-तुम-कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan 

शेष पूंजी-प्यार के सौजन्य से-परिवेश : हम-तुम-कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

तुमसे फिर मिल रहा हूँ;
तुम जैसे एक कथानक के पूर्व,
और मैं एक ट्रेजेडी के बाद।

जो कुछ संचित है
वह तुम नहीं,
तुम्हें अप्राप्य समझती हुई
मेरी पहली महत्त्वाकांक्षा है
जिसने जीवन को सिद्ध किया।
जिसका इतिहास
पत्थरों की ज़बानी
एक फटेहाल, नंगे सिर, छिले पाँव
नायक की कहानी है,
पक लम्बी यात्रा
जो वहीं समाप्त होती है जहाँ से शुरू!
जिसकी आँखें बहता पानी,
तट को छूकर अपने में डूब जाती
लहरों की तरंग-कथा…

उद्गम!
तुमसे मिले ताप ने, शीत ने, जल ने
मुझको भविष्य दिया :
सारांश,
अब मैं उन चेष्टाओं की
शेष पूँजी हूँ
जिसे तुम नहीं समय प्राप्त करेगा।

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