शेर और समुद्र- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

शेर और समुद्र- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

दूध चूल्हे पर
आग तेज़ होती जाती
चोर को देंगे फाँसी
या बच निकलेगा
समय यह बेमौसम
कहाँ जाओगे?
यहीं बैठ जाओ
मेरे निकट!

आधी रात जब खिड़की बन्द थी
द्वार भी बन्द
काले कागों ने पर्वत शिखरों के ऊपर
भरी उड़ान
बहुत लम्बी सड़क
पदचिह्नों से उगलता विष
हमारी भी माँ
हमारा भी पिता
तुमने भी पत्तों में से लौ देखी
मुझे भी उस पदचिह्न ने डंसा
क़ाफ़िला दौड़ा, कोहरा, गुब्बार
कभी-कभी मुझे भी खिली
घोड़ों की टापों में बिजली
कभी-कभी तेरी ऊँटनी ने
मेरे खजूर के तनों को छीला

समय यह बेमौसम
कहाँ जाओगे?
शेर के सर के बाल उड़ रहे हैं
समुद्र रात्रि दहाड़ता है
अभी यहीं बैठ जाओ
मेरे निकट!

यहीं चिल्लाएँ क्या? कठफोड़वा को ढूँढ़ें ?
सर पर नहीं टिकती है चुनरी
पकड़े रख
अश्रु-बूंदों से खिलती है हँसी
खिलाये जा
हब्शी पक्षी सरसों के फूलों के बदले
अब भोग रहे हैं बर्फ
एक… एक… एक
यहीं विराजो मेरे निकट!
दूध चूल्हे पर
आग तेज़ होती जाती।

(कश्मीरी से अनुवाद : सतीश विमल)

 

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