शून्य-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal 

शून्य-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

क्या सोच रही हो गुमसुम रजनी में
प्यार में सिमटी किस शून्य में समायी हो
बस एक बार मदिर मुस्कुरा दो
इतनी स्तब्ध भी न रहो जैसे परायी हो

कभी इन आँखों में झांको
तो अनुभव करोगी प्यार का अथाह
अधरों को शब्दों से कर दूँ आश्वस्त
मांग लूँ उल्का से तुम्हारी हर चाह

सोचो, क्या कभी सागर सिकुड़ता है
क्या क्षितिज का विस्तार सिमटता है
तुम तो सुन्दर हो आकाशगंगा सी
क्या कभी तुमसा कोई तारा टूटता है

आओ छुप जाओ बाँहों में
कुछ कानों में मन की कह लें
स्पर्श कर लें उभरती मादकता
कुछ देर यूँ ही शरद की
चांदनी में रह लें

तुम मेरी स्वप्नप्रिया
कभी खोना नहीं अँधेरे में
तुम हो तो ये संसार है
चलें चीर कहीं दूर इस कोहरे में

ईश्वर से तुम्हे मांग लूँगा
डूब जाना फिर श्रृंगार में
चलना चम्पई पंखुड़ियों पर
क्षितिज तक कुसुमयी प्यार में

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