शुहदा-ए-जंगे-आज़ादी 1857 के नाम-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

शुहदा-ए-जंगे-आज़ादी 1857 के नाम-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

तुमने जिस दिन के लिए अपने जिगर चाक किए
सौ बरस बाद सही दिन तो वो आया आख़िर
तुमने जिस दश्त-ए-तमन्ना को लहू से सींचा
हमने उसको गुलो-गुलज़ार बनाया आख़िर
नस्ल-दर-नस्ल रही जहदे-मुसलसल की तड़प
एक इक बूँद ने तूफ़ान उठाया आख़िर
तुमने इक ज़र्ब लगाई थी हिसारे-शब पर
हमने हर ज़ुल्म की दीवार को ढाया आख़िर

वक़्त तारीक ख़राबों का वो अफ़्रीत है जो
हर घड़ी ताज़ा चराग़ों का लहू पीता है
ज़ुल्फ़े-आज़ादी के हर तार से दस्ते-अय्याम
हुर्रियतकेश जवानों के क़फ़न सीता है
तुमसे जिस दौरे-अलमनाक का आग़ाज़ हुआ
हम पे वो अहदे-सितम एक सदी बीता है
तुमने जो जंग लड़ी नंगे-वतन की ख़ातिर
माना उस जंग में तुम हारे अदू जीता है

लेकिन ऐ जज़्बे-मुक़द्दस के शहीदाने-अज़ीम
कल की हार अपने लिए जीत की तम्हीद बनी
हम सलीबों पे चढ़े ज़िन्दा गड़े फिर भी बढ़े
वादी-ए-मर्ग भी मंज़िल-गहे-उम्मीद बनी
हाथ कटते रहे पर मशअलें ताबिन्दा रहीं
रस्म जो तुमसे चली बाइसे-तक़्लीद बनी
शब के सफ़्फ़ाफ़ ख़ुदाओं को ख़बर हो कि न हो
जो किरन क़त्ल हुई शोला-ए-ख़ुर्शीद बनी

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