शीशा सवाल करता है-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

शीशा सवाल करता है-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

लाहौर शहर में
शाही किले के सामने
गुरुद्वारा डेरा साहिब में
बहुत बड़ा
आकाश जितना शीशा लगा है।
जिसमें जहांगीर हर रोज़
अपना चेहरा निहारता।
खुद को फटकारता
कुछ इस तरह मुँह से उचारता है:

जिस शबद को
मैंने गर्म तवे पर बिठाया।
हर जुल्म कमाया।
वह आज भी सहज गति से
शीतलता बाँटे।
दुहाई ओ मेरे अल्लाह की दुहाई,
मुझे यह बात समझ में न आए।

शहर लाहौर से
बर्फ़ के घर काश्मीर में जाकर भी,
आग मेरे साथ साथ चली आई।
छाती में जलती है,
तब की लुकेठी लगाई।
इतनी सदियों बाद पुश्त दर पुश्त,
यही आग मेरा आज भी पीछा करती,
जब्र ज़ुल्म से तनिक भी न डरती।
होनी मीठा कर मानती
साँस साँस हर हर करती
यही कहती है,
जहांगीर! सत्ता के साथ बगलगीर!
भूलना मत।
बादशाहों की बदी रक्त चूसती है
पर
पातशाह* सँभालते हैं स्वाभिमानी प्रतिष्ठा।
वक्त! मुझे माफ करना
मैं गर्म तवे, जलती रेत,
और बहती रावी में
हर रोज़ तपता, जलता और डूबता हूँ।
किले में से निकलते हर रोज़,
शीशा मुझसे अनेकों सवाल करता है।
हाल से बेहाल करता है,
सारा दिन पीछा नहीं छोड़ता।
बेहद निढाल करता है।

सवाल दर सवाल करता शीशा,
बेजिस्म है
मुझसे टूटता नहीं
निराकार है
तनिक भी फूटता नहीं।
यह शीशा मुझे सोने नहीं देता।

*सिख गुरुओं को पातशाह कहते हैं।

 

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