शाश्वत-काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 3

शाश्वत-काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 3

शाश्वत

अपनी अपनी अहमियत, सूई या तलवार।
उपयोगी हैं भूख में, केवल रोटी चार।।
केवल रोटी चार, नहीं खा सकते सोना ।
सूई का कुछ काम, न तलवारों से होना ।
‘ठकुरेला’ कविराय, सभी की माला जपनी ।
बड़ा हो कि लघुरूप, अहमियत सबकी अपनी ।।

***

सोना तपता आग में, और निखरता रूप।
कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप।।
छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें।
कभी न बनें अधीर, नहीं मन में घबरायें।
‘ठकुरेला’ कविराय, दुखों से कभी न रोना।
निखरे सहकर कष्ट, आदमी हो या सोना।।

***

चलते चलते एक दिन, तट पर लगती नाव।
मिल जाता है सब उसे, हो जिसके मन चाव।।
हो जिसके मन चाव, कोशिशें सफल करातीं।
लगे रहो अविराम, सभी निधि दौड़ी आतीं।
‘ठकुरेला’ कविराय, आलसी निज कर मलते।
पा लेते गंतव्य, सुधीजन चलते चलते।।

***

मानव की कीमत तभी, जब हो ठीक चरित्र।
दो कौड़ी का भी नहीं, बिना महक का इत्र।।
बिना महक का इत्र, पूछ सद्गुण की होती।
किस मतलब का यार, चमक जो खोये मोती।
‘ठकुरेला’ कविराय, गुणों की ही महिमा सब।
गुण, अवगुण अनुसार, असुर, सुर, मुनि-गण, मानव।।

***

असली नकली की करे, सदा कसौटी जाँच ।
मालुम होता सहज ही, हीरा है या काँच ।।
हीरा है या काँच, देर तक कभी न छलता ।
कौन मीत, रिपु कौन, समय पर मालुम चलता ।
‘ठकुरेला’ कविराय, कमर जिसने भी कस ली ।
हुआ बहुत आसान, जानना नकली असली।।

***

नहीं समझता मंदमति, समझाओ सौ बार।
मूरख से पाला पडे़, चुप रहने में सार।।
चुप रहने मे सार, कठिन इनको समझाना।
जब भी ले ज़िद ठान, हारता सकल जमाना।
‘ठकुरेला’ कविराय, समय का डंडा बजता ।
करो कोशिशें लाख, मंदमति नहीं समझता।।

***

जो मीठी बातें करें, बनते उनके काम।
मीठे मीठे बोल सुन, बनें सहायक वाम।।
बनें सहायक वाम, सहज जीवन हो जाता।
जायें देश विदेश, सहज में बनता नाता।
‘ठकुरेला’ कविराय, सुखद दिन, भीनी रातें।
पायें सबसे प्यार, करें जो मीठी बातें।।

***

जैसा चाहो और से, दो औरों को यार।
आवक जावक के जुडे़, आपस मे सब तार।।
आपस मे सब तार, गणित इतना ही होता।
वैसी पैदावार, बीज जो जैसे बोता।
‘ठकुरेला’ कविराय, नियम इस जग का ऐसा।
पाओगे हर बार, यार बाँटोगे जैसा।।

***

धन की महिमा अमित है, सभी समेटें अंक।
पाकर बौरायें सभी, राजा हो या रंक।।
राजा हो या रंक, सभी इस धन पर मरते।
धन की खातिर लोग, न जाने क्या क्या करते।
‘ठकुरेला’ कविराय, कामना यह हर जन की।
जीवन भर बरसात, रहे उसके घर धन की।।

***

मोती बन जीवन जियो, या बन जाओ सीप।
जीवन उसका ही भला, जो जीता बन दीप।।
जो जीता बन दीप, जगत को जगमग करता।
मोती सी मुस्कान, सभी के मन मे भरता।
‘ठकुरेला’ कविराय, गुणों की पूजा होती।।
बनो गुणों की खान, फूल, दीपक या मोती।

***

मिलते हैं हर एक को, अवसर सौ सौ बार।
चाहे उन्हें भुनाइये, या कर दो बेकार।।
या कर दो बेकार, समय को देखो जाते।
पर ऐसा कर लोग, फिरें फिर फिर पछताते।
‘ठकुरेला’ कविराय, फूल मेहनत के खिलते।
जीवन में बहु बार, सभी को अवसर मिलते।।

***

मोती मिलते हैं उसे, जिसकी गहरी पैठ।
उसको कुछ मिलना नहीं, रहा किनारे बैठ।।
रहा किनारे बैठ, डरा, सहमा, सकुचाया।
जिसने किया प्रयास, सदा मनचाहा पाया।
‘ठकुरेला’ कविराय, महत्ता श्रम की होती।
की जिसने भी खोज, मिले उसको ही मोती।।

***

दुविधा में जीवन कटे, पास न हों यदि दाम।
रुपया पैसे से जुटें, घर की चीज तमाम।।
घर की चीज तमाम, दाम ही सब कुछ भैया।
मेला लगे उदास, न हों यदि पास रुपैया।
‘ठकुरेला’ कविराय, दाम से मिलती सुविधा।
बिना दाम के, मीत, जगत में सौ सौ दुविधा।।

***

रोना कभी न हो सका, बाधा का उपचार।
जो साहस से काम ले, वही उतरता पार।।
वही उतरता पार, करो मजबूत इरादा।
लगे रहो अविराम, जतन यह सीधा सादा।
‘ठकुरेला’ कविराय, न कुछ भी यूँ ही होना।
लगो काम में यार, छोड़कर पल पल रोना।।

***

काँटे को कहता रहे, यह जग ऊलजुलूल।
पर उसकी उपयोगिता, खूब समझते फूल।।
खूब समझते फूल, बाड़ हो काँटे वाली।।
तभी खिले उद्यान, फूल की हो रखवाली।।
‘ठकुरेला’ कविराय, यहाँ जो कुदरत बाँटे।।
उपयोगी हर चीज, फूल हों या फिर काँटे।।

***

मजबूरी में आदमी, करे न क्या क्या काम।
वह औरों की चाकरी, करता सुबहो-शाम।।
करता सुबहो-शाम, मान, गरिमा निज तजता।।
सहे बोल चुपचाप, जमाना खूब गरजता।।
‘ठकुरेला’ कविराय, बनाते अपने दूरी।।
जाने बस भगवान, कराये क्या मजबूरी।।

***

रूखी सूखी ठीक है, यदि मिलता हो मान।
अगर मिले अपमान से, ठीक नहीं पकवान।।
ठीक नही पकवान, घूँट विष का है पीना।
जब तक जीना, यार, सदा इज्जत से जीना।
‘ठकुरेला’ कविराय, मान की दुनिया भूखी।
भली मान के साथ, रोटियाँ रूखी सूखी।।

***

पीड़ा के दिन ठीक हैं, यदि दिन हों दो चार।
कौन मीत, मालुम पडे़, कौन मतलबी यार।।
कौन मतलबी यार, समय पहचान कराता।
रहे हितैषी साथ, मतलबी पास न आता।
‘ठकुरेला’ कविराय, उठाकर सच का बीड़ा।
हो सब की पहचान, अगर हो कुछ दिन पीड़ा।।

***

हँसना सेहत के लिये, अति हितकारी, मीत।
कभी न करें मुकाबला, मधु, मेवा, नवनीत।।
मधु, मेवा, नवनीत, दूध, दधि, कुछ भी खायें।
अवसर हो उपयुक्त, साथियो, हँसें, हँसायें।
‘ठकुरेला’ कविराय, पास हँसमुख के बसना।
रखो समय का ध्यान, कभी असमय मत हँसना।।

***

मैली चादर ओढ़कर, किसने पाया मान।
उजले निखरे रूप का, दुनिया में गुणगान ।।
दुनिया मे गुणगान, दाग किसको भाते हैं।
दाग-हीन छवि देख, सभी दौडे़ आते हैं।
‘ठकुरेला’ कविराय, यही जीवन की शैली।
जीयें दाग-विहीन, फेंक कर चादर मैली।।

***

सुखिया वह जो कर सके, निज मन पर अधिकार।
सुख दुःख मन के खेल हैं, इतना ही है सार।।
इतना ही है सार, खेल मन के हैं सारे।
मन जीता तो जीत, हार है मन के हारे।
‘ठकुरेला’ कविराय, बनो निज मन के मुखिया।
जो मन को ले जीत, वही बन जाता सुखिया।।

***

कर्मों की गति गहन है, कौन पा सका पार।
फल मिलते हर एक को, करनी के अनुसार।।
करनी के अनुसार, सीख गीता की इतनी।
आती सब के हाथ, कमाई जिसकी जितनी।
‘ठकुरेला’ कविराय, सीख यह सब धर्मों की।
सदा करो शुभ कर्म, गहन गति है कर्मों की।।

***

रोटी रोटी की जगह, अपनी जगह खदान।
सोने को मिलता नही, रोटी वाला मान।।
रोटी वाला मान, भले मँहगा हो सोना।
रोटी का जो काम, न वह सोने से होना।
‘ठकुरेला’ कविराय, बैठती कभी न गोटी।
हो सोना बहुमूल्य, किन्तु पहले हो रोटी।।

***

उपयोगी हैं साथियो, जग की चीज तमाम।
पर यह दीगर बात है, कब किससे हो काम।।
कब किससे हो काम, जरूरत जब पड़ जाये।
किसका क्या उपयोग, समझ में तब ही आये।
‘ठकुरेला’ कविराय, जानते ज्ञानी, योगी।
कुछ भी नहीं असार, जगत में सब उपयोगी।।

***

पल पल जीवन जा रहा, कुछ तो कर शुभ काम।
जाना हाथ पसार कर, साथ न चले छदाम।।
साथ न चले छदाम, दे रहे खुद को धोखा।
चित्रगुप्त के पास, कर्म का लेखा जोखा।
‘ठकुरेला’ कविराय, छोड़िये सभी कपट छल।
काम करो जी नेक, जा रहा जीवन पल पल।।

***

असफलता को देखकर, रोक न देना काम।
मंजिल उनको ही मिली, जो चलते अविराम।।
जो चलते अविराम, न बाधाओं से डरते।
असफलता को देख, जोश दूना मन भरते।
‘ठकुरेला’ कविराय, समय टेड़ा भी टलता।
मत बैठो मन मार, अगर आये असफलता।।

***

गतिविधियाँ यदि ठीक हों, सब कुछ होगा ठीक।।
आ जायेंगे सहज ही, सारे सुख नजदीक।।
सारे सुख नजदीक, आचरण की सब माया।
रहे आचरण ठीक, निखरते यश, धन, काया।
‘ठकुरेला’ कविराय, सहज मिलती सब निधियाँ।
हो सुख की बरसात, ठीक हों यदि गतिविधियाँ।।

***

माया को ठगिनी कहे, सारा ही संसार।
लेकिन भौतिक जगत में, माया ही है सार।।
माया ही है सार, काम सारे बन जाते।
माया के अनुसार, बिगड़ते बनते नाते।
‘ठकुरेला’ कविराय, सुखी हो जाती काया।
बनें सहायक लाख, अगर घर आये माया।।

***

आखें कह देतीं सखे, मन का सारा हाल।
चाहे तू स्वीकार कर, या फिर हँसकर टाल।।
या फिर हँस कर टाल, देख कर माथा ठनके।
आँखों में प्रतिबिम्ब, उतरते रहते मन के।
‘ठकुरेला’ कविराय, सन्तजन ऐसा भाखैं।
मन के सारे भाव, बताती रहती आँखें।।

***

मानवता ही है सखे, सबसे बढ कर धर्म।
जिसमें परहित निहित हो, करना ऐसे कर्म।।
करना ऐसे कर्म, सभी सुख मानें मन में।
सुख की बहे बयार, सहज सब के जीवन में।
‘ठकुरेला’ कविराय, सभी में आये समता।
धरती पर हो स्वर्ग, फले फूले मानवता।।

***

वाणी में ही जहर है, वाणी जीवनदान।
वाणी के गुण दोष का, सहज नहीं अनुमान।।
सहज नहीं अनुमान, कौन सी विपदा लाये।
जग में यश, धन, मान, मीत, सुख, राज दिलाये।
‘ठकुरेला’ कविराय, विविध विधि हो कल्याणी।
हो विवेक से युक्त, सरल, रसभीनी वाणी।।

***

शठता कब पहचानती, विनय-मान-मनुहार।
उसको सुख देती रही, परपीड़ा हर बार।।
परपीड़ा हर बार, मोद उसके मन भरती।
परेशान बहु भाँति, साधुता को वह करती।
‘ठकुरेला’ कविराय, जगत सदियों से रटता।
शठ जैसा व्यवहार, सुधारे शठ की शठता।।

***

कामी भजे शरीर को, लोभी भजता दाम।
पर उसका कल्याण है, जो भज लेता राम।।
जो भज लेता राम, दोष निज मन के हरता।
सुबह शाम अविराम, काम परहित के करता।
‘ठकुरेला’ कविराय, बनें सच के अनुगामी।
सच का बेड़ा पार, तरे अति लोभी, कामी।।

***

भूखा हो यदि आदमी, कर लेता है पाप।
आग लगे यदि पेट में, कौन करेगा जाप।।
कौन करेगा जाप, रहेगा वह मन मारे।
वृथा लगे हर बात, न भायें चन्दा तारे।
‘ठकुरेला’ कविराय, भले हो रूखा-सूखा।
भरे सभी का पेट, न कोई सोये भूखा।।

***

पाया उसने ही सदा, जिसने किया प्रयास।
कभी हिरण जाता नहीं, सोते सिंह के पास।।
सोते सिंह के पास, राह तकते युग बीते।
बैठे ठाले लोग, रहेंगे हरदम रीते।
‘ठकुरेला’ कविराय, समय ने यह समझाया।
जिसने किया प्रयास, मधुर फल उसने पाया।।

***

आता कभी न समझ में, जीवन गणित विचित्र।
जोड़, गुणा, बाकी सभी, अति रहस्यमय, मित्र।।
अति रहस्यमय, मित्र, अचम्भित दुनिया सारी।
कोशिश हुईं हजार, थके योगी, तपधारी।
‘ठकुरेला’ कविराय, जानता सिर्फ विधाता।
जीवन एक रहस्य, समझ में कभी न आता।।

***

जल मे रहकर मगर से, जो भी ठाने बैर।
उस अबोध की साथियो, रहे किस तरह खैर।।
रहे किस तरह खैर, बिछाये पथ में काँटे।
रहे समस्या-ग्रस्त, और दुख खुद को बाँटे।
‘ठकुरेला’ कविराय, बने बिगड़े सब पल में।
रखो मगर से प्रीति, अगर रहना है जल में।।

***

आ जाते हैं जब कभी, मन में बुरे विचार।
उन्हें ज्ञान के खड़्ग से, ज्ञानी लेता मार।।
ज्ञानी लेता मार, और अज्ञानी फँसते।
बिगड़ें उनके काम, लोग सब उन पर हँसते।
‘ठकुरेला’ कविराय, असर अपना दिखलाते।
दुःख की जड़ कुविचार, अगर मन मे आ जाते।।

***

होता है मुश्किल वही, जिसे कठिन लें मान।
करें अगर अभ्यास तो, सब कुछ है आसान।।
सब कुछ है आसान, बहे पत्थर से पानी।
कोशिश करता मूढ़, और बन जाता ज्ञानी।
‘ठकुरेला’ कविराय, सहज पढ़ जाता तोता।
कुछ भी नही अगम्य, पहँुच में सब कुछ होता।।

***

दुनिया मरती रूप पर, गुण देखें दो चार।
सुन्दरता करती रही, लोगों पर अधिकार।।
लोगों पर अधिकार, फिसल जाता सबका मन।
और लुटाते लोग, रूप पर अपना जीवन।
‘ठकुरेला’ कविराय, गुणों को देखे गुनिया।
मन मोहे रंग, रूप, रूप पर मरती दुनिया।।

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