शायरी संग्रह-3-शायरी -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

शायरी संग्रह-3-शायरी -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

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महफिल हमेशा सजी है मेरी,
पर एक आग है सीने में

जो न दिखे तू पर बेशक दिल में है मेरी,
पर कुछ बाते चुभती है मन मे।

लाख चाहत हो पर वादे का पक्का हू,
समुद्र की तरह हर राज रखूगा मन मे।

दीपक हू जल जाऊगा,
सब खुशिया दे दूगा तुममे।

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वो तेरा तस्बीरो मे हँसते दिखना,
आवाजो की अंताबछड़ी है।

तेरा जिक्र खुद से है हर रोज,
बस जो तू दूर खड़ी है।

एक दिन दर्द ही दर्द को निगलता है।
पर क्या कर लोगे यादो का,
जो मेरे पास पड़ी है।

 

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अगर दर्द देना फित़रत हो ,
तो बर्दाश्त करना सीखो।
अगर हिसाब लेना फित़रत हो,
तो हिसाब देना सीखो।

खुद की नजरों में गिरे,
और गवाही खुद ही का दिल न दे।

तो दूसरों का दर्द क्या समझोगे,
हो सके तो खुद ऐहतराम करके सीखो।

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