शायरी/ शेर -मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Sher part 2

शायरी/ शेर -मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Sher part 2

आदम-ए-ख़ाकी से आलम को जिला है वर्ना
आईना था तो मगर क़ाबिल-ए-दीदार न था
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आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
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आशिक़ों की ख़स्तगी बद-हाली की पर्वा नहीं
ऐ सरापा नाज़ तू ने बे-नियाज़ी ख़ूब की
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आवरगान-ए-इश्क़ का पूछा जो मैं निशाँ
मुश्त-ए-ग़ुबार ले के सबा ने उड़ा दिया
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अब देख ले कि सीना भी ताज़ा हुआ है चाक
फिर हम से अपना हाल दिखाया न जाएगा
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अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है
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अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे
पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे
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अब के जुनूँ में फ़ासला शायद न कुछ रहे
दामन के चाक और गिरेबाँ के चाक में
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अब मुझ ज़ईफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करो
जाती नहीं है मुझ से किसू की उठाई बात
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अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
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अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया
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अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मत मिला कर ‘मीर’
कि हम ग़रीब हुए हैं इन्हीं की दौलत से
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इज्ज़-ओ-नियाज़ अपना अपनी तरफ़ है सारा
इस मुश्त-ए-ख़ाक को हम मसजूद जानते हैं
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इक़रार में कहाँ है इंकार की सी सूरत
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर
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इश्क़ है इश्क़ करने वालों को
कैसा कैसा बहम क्या है इश्क़
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इश्क़ है तर्ज़ ओ तौर इश्क़ के तईं
कहीं बंदा कहीं ख़ुदा है इश्क़
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इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो
सारे आलम में भर रहा है इश्क़
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इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
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इश्क़ का घर है ‘मीर’ से आबाद
ऐसे फिर ख़ानमाँ-ख़राब कहाँ
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इश्क़ करते हैं उस परी-रू से
‘मीर’ साहब भी क्या दिवाने हैं
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इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़
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इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ
उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ
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इश्क़ से जा नहीं कोई ख़ाली
दिल से ले अर्श तक भरा है इश्क़
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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
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उम्र गुज़री दवाएँ करते ‘मीर’
दर्द-ए-दिल का हुआ न चारा हनूज़
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काबे में जाँ-ब-लब थे हम दूरी-ए-बुताँ से
आए हैं फिर के यारो अब के ख़ुदा के हाँ से
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काम थे इश्क़ में बहुत पर ‘मीर’
हम ही फ़ारिग़ हुए शिताबी से
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कासा-ए-चश्म ले के जूँ नर्गिस
हम ने दीदार की गदाई की
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कहा मैं ने गुल का है कितना सबात
कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया
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कहते तो हो यूँ कहते यूँ कहते जो वो आता
ये कहने की बातें हैं कुछ भी न कहा जाता
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कौन कहता है न ग़ैरों पे तुम इमदाद करो
हम फ़रामोशियों को भी कभू याद करो
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कौन लेता था नाम मजनूँ का
जब कि अहद-ए-जुनूँ हमारा था
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ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मय-ख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतिक़ाम लिया
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खिलना कम कम कली ने सीखा है
उस की आँखों की नीम-ख़्वाबी से
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ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैं ने सब लेकिन
रहे है ख़ौफ़ मुझे वाँ की बे-नियाज़ी का
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किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया
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किसू से दिल नहीं मिलता है या रब
हुआ था किस घड़ी उन से जुदा मैं
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कितनी बातें बना के लाऊँ लेक
याद रहतीं तिरे हुज़ूर नहीं
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कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
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कोहकन क्या पहाड़ तोड़ेगा
इश्क़ ने ज़ोर-आज़माई की
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कुछ हो रहेगा इश्क़-ओ-हवस में भी इम्तियाज़
आया है अब मिज़ाज तिरा इम्तिहान पर
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कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
धूम है फिर बहार आने की
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कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन
शौक़ ने हम को बे-हवास किया
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क्या आज-कल से उस की ये बे-तवज्जोही है
मुँह उन ने इस तरफ़ से फेरा है ‘मीर’ कब का
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क्या जानूँ चश्म-ए-तर से उधर दिल को क्या हुआ
किस को ख़बर है ‘मीर’ समुंदर के पार की
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क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता
अब तो चुप भी रहा नहीं जाता
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क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़
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क़बा-ए-लाला-ओ-गुल में झलक रही थी ख़िज़ाँ
भरी बहार में रोया किए बहार को हम
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उस के फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर
शम-ए-हरम हो या हो दिया सोमनात का
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उस के ईफ़ा-ए-अहद तक न जिए
उम्र ने हम से बेवफ़ाई की
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चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
जमाल-ए-यार ने मुँह उस का ख़ूब लाल किया
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चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच
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दावा किया था गुल ने तिरे रुख़ से बाग़ में
सैली लगी सबा की तो मुँह लाल हो गया
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दे के दिल हम जो हो गए मजबूर
इस में क्या इख़्तियार है अपना
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देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
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दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
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दिल कि यक क़तरा ख़ूँ नहीं है बेश
एक आलम के सर बला लाया
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दूर बैठा ग़ुबार-ए-‘मीर’ उस से
इश्क़ बिन ये अदब नहीं आता
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ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
दिल के जाने का निहायत ग़म रहा
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गुफ़्तुगू रेख़्ते में हम से न कर
ये हमारी ज़बान है प्यारे
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जाए है जी नजात के ग़म में
ऐसी जन्नत गई जहन्नम में
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जब कि पहलू से यार उठता है
दर्द बे-इख़्तियार उठता है
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जम गया ख़ूँ कफ़-ए-क़ातिल पे तिरा ‘मीर’ ज़ि-बस
उन ने रो रो दिया कल हाथ को धोते धोते
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जौर क्या क्या जफ़ाएँ क्या क्या हैं
आशिक़ी में बलाएँ क्या क्या हैं
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जिन जिन को था ये इश्क़ का आज़ार मर गए
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गए
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जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताज-वरी का
कल उस पे यहीं शोर है फिर नौहागरी का
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जो इस शोर से ‘मीर’ रोता रहेगा
तो हम-साया काहे को सोता रहेगा
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जो तुझ बिन न जीने को कहते थे हम
सो इस अहद को अब वफ़ा कर चले
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तदबीर मेरे इश्क़ की क्या फ़ाएदा तबीब
अब जान ही के साथ ये आज़ार जाएगा
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