शायरी/ शेर -मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Sher part 3

शायरी/ शेर -मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Sher part 3

 

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
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रात तो सारी गई सुनते परेशाँ-गोई
‘मीर’-जी कोई घड़ी तुम भी तो आराम करो
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रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं
साथ उस कारवाँ के हम भी हैं
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रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना
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रोज़ आने पे नहीं निस्बत-ए-इश्क़ी मौक़ूफ़
उम्र भर एक मुलाक़ात चली जाती है
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रू-ए-सुख़न है कीधर अहल-ए-जहाँ का या रब
सब मुत्तफ़िक़ हैं इस पर हर एक का ख़ुदा है
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सब पे जिस बार ने गिरानी की
उस को ये ना-तवाँ उठा लाया
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सदा हम तो खोए गए से रहे
कभू आप में तुम ने पाया हमें
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सख़्त काफ़िर था जिन ने पहले ‘मीर’
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया
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सरापा आरज़ू होने ने बंदा कर दिया हम को
वगर्ना हम ख़ुदा थे गर दिल-ए-बे-मुद्दआ होते
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शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
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शफ़क़ से हैं दर-ओ-दीवार ज़र्द शाम-ओ-सहर
हुआ है लखनऊ इस रहगुज़र में पीलीभीत
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शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए
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शेर मेरे हैं गो ख़वास-पसंद
पर मुझे गुफ़्तुगू अवाम से है
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शिकवा-ए-आबला अभी से ‘मीर’
है पियारे हनूज़ दिल्ली दूर
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वस्ल में रंग उड़ गया मेरा
क्या जुदाई को मुँह दिखाऊँगा
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वस्ल उस का ख़ुदा नसीब करे
‘मीर’ दिल चाहता है क्या क्या कुछ
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वे दिन गए कि आँखें दरिया सी बहतियाँ थीं
सूखा पड़ा है अब तो मुद्दत से ये दो-आबा
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याद उस की इतनी ख़ूब नहीं ‘मीर’ बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
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हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं
अपने सिवाए किस को मौजूद जानते हैं
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हम फ़क़ीरों से बे-अदाई क्या
आन बैठे जो तुम ने प्यार किया
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हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
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हम जानते तो इश्क़ न करते किसू के साथ
ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरज़ू के साथ
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हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन
मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं
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हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ ‘मीर’
पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
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हम तौर-ए-इश्क़ से तो वाक़िफ़ नहीं हैं लेकिन
सीने में जैसे कोई दिल को मला करे है
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हमारे आगे तिरा जब किसू ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया
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हर क़दम पर थी उस की मंज़िल लेक
सर से सौदा-ए-जुस्तजू न गया
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हस्ती अपनी हबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है
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होगा किसी दीवार के साए में पड़ा ‘मीर’
क्या काम मोहब्बत से उस आराम-तलब को
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होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता
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सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ
मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ
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सिरहाने ‘मीर’ के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है

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