शायरी/ शेर -मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Sher part 1

शायरी/ शेर -मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Sher part 1

तन के मामूरे में यही दिल-ओ-चशम
घर थे दो सो ख़राब हैं दोनों
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था मुस्तआर हुस्न से उस के जो नूर था
ख़ुर्शीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़ुहूर था
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तुझ को मस्जिद है मुझ को मय-ख़ाना
वाइज़ा अपनी अपनी क़िस्मत है
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तुझी पर कुछ ऐ बुत नहीं मुनहसिर
जिसे हम ने पूजा ख़ुदा कर दिया
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ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत
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ज़िंदाँ में भी शोरिश न गई अपने जुनूँ की
अब संग मुदावा है इस आशुफ़्ता-सरी का
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बाल-ओ-पर भी गए बहार के साथ
अब तवक़्क़ो नहीं रिहाई की
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बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
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बहुत कुछ कहा है करो ‘मीर’ बस
कि अल्लाह बस और बाक़ी हवस
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बज़्म-ए-इशरत में मलामत हम निगूँ बख़्तों के तईं
जूँ हुबाब-ए-बादा साग़र सर-निगूँ हो जाएगा
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बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना
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बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा
क़हर होता जो बा-वफ़ा होता
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बुलबुल ग़ज़ल-सराई आगे हमारे मत कर
सब हम से सीखते हैं अंदाज़ गुफ़्तुगू का
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दीदनी है शिकस्तगी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढाई है
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दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
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दिल मुझे उस गली में ले जा कर
और भी ख़ाक में मिला लाया
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दिल से रुख़्सत हुई कोई ख़्वाहिश
गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता
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दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-नकू न गया
झाँकना ताकना कभू न गया
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दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
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दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई
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दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का
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फ़ुर्सत में इक नफ़स के क्या दर्द-ए-दिल सुनोगे
आए तो तुम व-लेकिन वक़्त-ए-अख़ीर आए
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नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया
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नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
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नाज़ुक-मिज़ाज आप क़यामत हैं ‘मीर’ जी
जूँ शीशा मेरे मुँह न लगो मैं नशे में हूँ
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पढ़ते फिरेंगे गलियों में इन रेख़्तों को लोग
मुद्दत रहेंगी याद ये बातें हमारीयाँ
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पैदा कहाँ हैं ऐसे परागंदा-तब्अ लोग
अफ़सोस तुम को ‘मीर’ से सोहबत नहीं रही
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पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है
दुनिया तिरी आँखों को भी क्या क्या न कहे है
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परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
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फिरते हैं ‘मीर’ ख़्वार कोई पूछता नहीं
इस आशिक़ी में इज़्ज़त-ए-सादात भी गई
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मअरका गर्म तो हो लेने दो ख़ूँ-रेज़ी का
पहले शमशीर के नीचे हमीं जा बैठेंगे
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मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़
उसी ख़ाना-ख़राब की सी है
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मर्ग इक माँदगी का वक़्फ़ा है
यानी आगे चलेंगे दम ले कर
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मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानेहा सा हो गया है
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मत रंजा कर किसी को कि अपने तू ए’तिक़ाद
दिल ढाए कर जो काबा बनाया तो क्या हुआ
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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
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मेरे रोने की हक़ीक़त जिस में थी
एक मुद्दत तक वो काग़ज़ नम रहा
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‘मीर’ अमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे
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‘मीर’ बंदों से काम कब निकला
माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग
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‘मीर’ हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे
इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो
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‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
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‘मीर’ को क्यूँ न मुग़्तनिम जाने
अगले लोगों में इक रहा है ये
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‘मीर’ साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ
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‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
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‘मीर’-जी ज़र्द होते जाते हो
क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क
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‘मीर’-साहिब ज़माना नाज़ुक है
दोनों हाथों से थामिए दस्तार
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मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया
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मुँह तका ही करे है जिस तिस का
हैरती है ये आईना किस का
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मुझ को शायर न कहो ‘मीर’ कि साहब मैं ने
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया
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मुझे काम रोने से अक्सर है नासेह
तू कब तक मिरे मुँह को धोता रहेगा
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यही जाना कि कुछ न जाना हाए
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
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ये जो मोहलत जिसे कहे हैं उम्र
देखो तो इंतिज़ार सा है कुछ
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ये तवहहुम का कार-ख़ाना है
याँ वही है जो ए’तिबार क्या
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यूँ नाकाम रहेंगे कब तक जी में है इक काम करें
रुस्वा हो कर मर जावें उस को भी बदनाम करें
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यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है
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लाया है मिरा शौक़ मुझे पर्दे से बाहर
मैं वर्ना वही ख़ल्वती-ए-राज़-ए-निहाँ हूँ
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लगा न दिल को कहीं क्या सुना नहीं तू ने
जो कुछ कि ‘मीर’ का इस आशिक़ी ने हाल किया
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ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का
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लेते ही नाम उस का सोते से चौंक उठ्ठे
है ख़ैर ‘मीर’-साहिब कुछ तुम ने ख़्वाब देखा
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लिखते रुक़आ लिखे गए दफ़्तर
शौक़ ने बात क्या बढ़ाई है
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