शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 10

शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 10

चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया

चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
जमाल-ए-यार ने मुँह उस का ख़ूब लाल किया

फ़लक ने आह तिरी रह में हम को पैदा कर
ब-रंग-ए-सब्ज़-ए-नूरस्ता पाएमाल किया

रही थी दम की कशाकश गले में कुछ बाक़ी
सो उस की तेग़ ने झगड़ा ही इंफ़िसाल किया

मिरी अब आँखें नहीं खुलतीं ज़ोफ़ से हमदम
न कह कि नींद में है तू ये क्या ख़याल किया

बहार-ए-रफ़्ता फिर आई तिरे तमाशे को
चमन को युम्न-ए-क़दम ने तिरे निहाल किया

जवाब-नामा सियाही का अपनी है वो ज़ुल्फ़
किसू ने हश्र को हम से अगर सवाल किया

लगा न दिल को कहीं क्या सुना नहीं तू ने
जो कुछ कि ‘मीर’ का इस आशिक़ी ने हाल किया

क्या लड़के दिल्ली के हैं अय्यार और नट-खट

क्या लड़के दिल्ली के हैं अय्यार और नट-खट
दिल लें हैं यूँ कि हरगिज़ होती नहीं है आहट

हम आशिक़ों को मरते क्या देर कुछ लगे है
चट जिन ने दिल पे खाई वो हो गया है चट-पट

दिल है जिधर को ऊधर कुछ आग सी लगी थी
उस पहलू हम जो लेटे जल जल गई है करवट

कलियों को तू ने चट चट ऐ बाग़बाँ जो तोड़ा
बुलबुल के दिल जिगर को ज़ालिम लगी है क्या चट

जी ही हटे न मेरा तो उस को क्या करूँ मैं
हर-चंद बैठता हूँ मज्लिस में उस से हट हट

देती है तूल बुलबुल क्या नाला ओ फ़ुग़ाँ को
दिल के उलझने से हैं ये आशिक़ों की फट फट

मुर्दे न थे हम ऐसे दरिया पे जब था तकिया
उस घाट गाह ओ बीगह रहने लगा था जमघट

रुक रुक के दिल हमारा बे-ताब क्यूँ न होवे
कसरत से दर्द ओ ग़म की रहता है उस पे झुरमुट

शब ‘मीर’ से मिले हम इक वहम रह गया है
उस के ख़याल-ए-मू में अब तो गया बहुत लट

क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश

क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
यक जान ओ सद तमन्ना यक दिल हज़ार ख़्वाहिश

ले हाथ में क़फ़स टुक सय्याद चल चमन तक
मुद्दत से है हमें भी सैर-ए-बहार ख़्वाहिश

ने कुछ गुनह है दिल का ने जुर्म-ए-चश्म इस में
रखती है हम को इतना बे-इख़्तियार ख़्वाहिश

हालाँकि उम्र सारी मायूस गुज़री तिस पर
क्या क्या रखें हैं उस के उम्मीद-वार ख़्वाहिश

ग़ैरत से दोस्ती की किस किस से हो जे दुश्मन
रखता है यारी ही की सारा दयार ख़्वाहिश

हम मेहर ओ रज़ क्यूँ कर ख़ाली हों आरज़ू से
शेवा यही तमन्ना फ़न ओ शिआर ख़्वाहिश

उठती है मौज हर यक आग़ोश ही की सूरत
दरिया को है ये किस का बोस ओ कनार ख़्वाहिश

सद रंग जल्वा-गर है हर जादा ग़ैरत गुल
आशिक़ की एक पावे क्यूँ कर क़रार ख़्वाहिश

यक बार बर न आए उस से उम्मीद दिल की
इज़हार करते कब तक यूँ बार बार ख़्वाहिश

करते हैं सब तमन्ना पर ‘मीर’ जी न इतनी
रक्खेगी मार तुम को पायान-ए-कार ख़्वाहिश

कहते हो इत्तिहाद है हम को

कहते हो इत्तिहाद है हम को
हाँ कहो ए’तिमाद है हम को

शौक़ ही शौक़ है नहीं मालूम
इस से क्या दिल निहाद है हम को

ख़त से निकले है बेवफ़ाई-ए-हुस्न
इस क़दर तो सवाद है हम को

आह किस ढब से रोइए कम कम
शौक़ हद से ज़ियाद है हम को

शैख़ ओ पीर-ए-मुग़ाँ की ख़िदमत में
दिल से इक ए’तिक़ाद है हम को

सादगी देख इश्क़ में उस के
ख़्वाहिश-ए-जान शाद है हम को

बद-गुमानी है जिस से तिस से आह
क़स्द-ए-शोर-ओ-फ़साद है हम को

दोस्ती एक से भी तुझ को नहीं
और सब से इनाद है हम को

नामुरादाना ज़ीस्त करता था
‘मीर’ का तौर याद है हम को

इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया

इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया
जी का जाना ठहर रहा है सुब्ह गया या शाम गया

इश्क़ किया सो दीन गया ईमान गया इस्लाम गया
दिल ने ऐसा काम किया कुछ जिस से मैं नाकाम गया

किस किस अपनी कल को रोवे हिज्राँ में बेकल उस का
ख़्वाब गई है ताब गई है चैन गया आराम गया

आया याँ से जाना ही तो जी का छुपाना क्या हासिल
आज गया या कल जावेगा सुब्ह गया या शाम गया

हाए जवानी क्या क्या कहिए शोर सरों में रखते थे
अब क्या है वो अहद गया वो मौसम वो हंगाम गया

गाली झड़की ख़श्म ओ ख़ुशुनत ये तो सर-ए-दस्त अक्सर हैं
लुत्फ़ गया एहसान गया इनआम गया इकराम गया

लिखना कहना तर्क हुआ था आपस में तो मुद्दत से
अब जो क़रार किया है दिल से ख़त भी गया पैग़ाम गया

नाला-ए-मीर सवाद में हम तक दोशीं शब से नहीं आया
शायद शहर से उस ज़ालिम के आशिक़ वो बदनाम गया

आह जिस वक़्त सर उठाती है

आह जिस वक़्त सर उठाती है
अर्श पर बर्छियाँ चलाती है

नाज़-बरदार-ए-लब है जाँ जब से
तेरे ख़त की ख़बर को पाती है

ऐ शब-ए-हिज्र रास्त कह तुझ को
बात कुछ सुब्ह की भी आती है

चश्म-ए-बद्दूर-चश्म-ए-तर ऐ ‘मीर’
आँखें तूफ़ान को दिखाती है

अब नहीं सीने में मेरे जा-ए-दाग़

अब नहीं सीने में मेरे जा-ए-दाग़
सोज़-ए-दिल से दाग़ है बाला-ए-दाग़

दिल जला आँखें जलीं जी जल गया
इश्क़ ने क्या क्या हमें दिखलाए दाग़

दिल जिगर जल कर हुए हैं दोनों एक
दरमियाँ आया है जब से पा-ए-दाग़

मुन्फ़इल हैं लाला ओ शम्अ ओ चराग़
हम ने भी क्या आशिक़ी में खाए दाग़

वो नहीं अब ‘मीर’ जो छाती जले
खा गया सारे जिगर को हाए दाग़

न दिमाग है कि किसू से हम

न‍ दिमाग है कि किसू से हम,करें गुफ्तगू गम-ए-यार में
न फिराग है कि फकीरों से,मिलें जा के दिल्‍ली दयार में

कहे कौन सैद-ए-रमीद: से,कि उधर भी फिरके नजर करे
कि निकाब उलटे सवार है, तिरे पीछे कोई गुबार में

कोई शोल: है कि शरार: है,कि हवा है यह कि सितार: है
यही दिल जो लेके गड़ेंगे हम,तो लगेगी आग मजार में

हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया

हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हमने थाम-थाम लिया

ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मयख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतक़ाम लिया

वो कज-रविश न मिला मुझसे रास्ते में कभू
न सीधी तरहा से उसने मेरा सलाम लिया

मेरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

अगरचे गोशा-गुज़ीं हूँ मैं शाइरों में ‘मीर’
प’ मेरे शोर ने रू-ए-ज़मीं तमाम किया

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मेख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़ले में सुबहा के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरत-ए-युसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़
“मीर” इस को रायगाँ खोता है क्या

मसाइब और थे पर दिल का जाना

मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानेहा सा हो गया है

सरहाने मीर के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते-रोते सो गया है

हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ

हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ,
ले जाते दिल को खाक में इस आरजू के साथ।

नाजां हो उसके सामने क्या गुल खिला हुआ,
रखता है लुत्फे-नाज भी रू-ए-निकू के साथ।

हंगामे जैसे रहते हैं उस कूचे में सदा,
जाहिर है हश्र होगी ऐसी गलू के साथ।

मजरूह अपनी छाती को बखिया किया बहुत,
सीना गठा है ‘मीर’ हमारा रफू के साथ.

इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ

इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ
उस से आँखें लगीं तो ख़्वाब कहाँ

बेकली दिल ही की तमाशा है
बर्क़ में ऐसे इज़्तेराब कहाँ

हस्ती अपनी है बीच में पर्दा
हम न होवें तो फिर हिजाब कहाँ

गिरिया-ए-शब से सुर्ख़ हैं आँखें
मुझ बला नोश को शराब कहाँ

इश्क़ है आशिक़ों को जलने को
ये जहन्नुम में है अज़ाब कहाँ

महव हैं इस किताबी चेहरे के
आशिक़ों को सर-ए-किताब कहाँ

इश्क़ का घर है ‘मीर’ से आबाद
ऐसे फिर ख़ानमाँख़राब कहाँ

 

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