शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 8

शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 8

ख़ातिर करे है जमा वो हर बार एक तरह

ख़ातिर करे है जमा वो हर बार एक तरह
करता है चर्ख़ मुझ से नए यार एक तरह

मैं और क़ैस ओ कोहकन अब जो ज़बाँ पे हैं
मारे गए हैं सब ये गुनहगार एक तरह

मंज़ूर उस को पर्दे में हैं बे-हिजाबियाँ
किस से हुआ दो-चार वो अय्यार एक तरह

सब तरहें उस की अपनी नज़र में थीं क्या कहें
पर हम भी हो गए हैं गिरफ़्तार एक तरह

घर उस के जा के आते हैं पामाल हो के हम
करिए मकाँ ही अब सर-ए-बाज़ार एक तरह

गह गुल है गाह रंग गहे बाग़ की है बू
आता नहीं नज़र वो तरह-दार एक तरह

नैरंग हुस्न-ए-दोस्त से कर आँखें आश्ना
मुमकिन नहीं वगरना हो दीदार एक तरह

सौ तरह तरह देख तबीबों ने ये कहा
सेहत पज़ीर हुए ये बीमार एक तरह

सो भी हज़ार तरह से ठहरवाते हैं हम
तस्कीन के लिए तिरी नाचार एक तरह

बिन जी दिए हो कोई तरह फ़ाएदा नहीं
गर है तो ये है ऐ जिगर अफ़गार एक तरह

हर तरह तू ज़लील ही रखता है ‘मीर’ को
होता है आशिक़ी में कोई ख़्वार एक तरह

क्या मुआफ़िक़ हो दवा इश्क़ के बीमार के साथ

क्या मुआफ़िक़ हो दवा इश्क़ के बीमार के साथ
जी ही जाते नज़र आए हैं इस आज़ार के साथ

रात मज्लिस में तिरी हम भी खड़े थे चुपके
जैसे तस्वीर लगा दे कोई दीवार के साथ

मर गए पर भी खुली रह गईं आँखें अपनी
कौन इस तरह मुआ हसरत-ए-दीदार के साथ

शौक़ का काम खिंचा दूर कि अब मेहर मिसाल
चश्म-ए-मुश्ताक़ लगी जाए है तूमार के साथ

राह उस शोख़ की आशिक़ से नहीं रुक सकती
जान जाती है चली ख़ूबी-ए-रफ़्तार के साथ

वे दिन अब सालते हैं रातों को बरसों गुज़रे
जिन दिनों देर रहा करते थे हम यार के साथ

ज़िक्र-ए-गुल क्या है सबा अब कि ख़िज़ाँ में हम ने
दिल को नाचार लगाया है ख़स ओ ख़ार के साथ

किस को हर दम है लहू रोने का हिज्राँ में दिमाग़
दिल को इक रब्त सा है दीदा-ए-ख़ूँ-बार के साथ

मेरी उस शोख़ से सोहबत है बे-ऐनिहि वैसी
जैसे बन जाए किसू सादे को अय्यार के साथ

देखिए किस को शहादत से सर-अफ़राज़ करें
लाग तो सब को है उस शोख़ की तलवार के साथ

बेकली उस की न ज़ाहिर थी जो तू ऐ बुलबुल
दमकश-ए-‘मीर’ हुई उस लब ओ गुफ़्तार के साथ

कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है

कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
दिन गुज़र जाएँ हैं पर बात चली जाती है

रह गए गाह तबस्सुम पे गहे बात ही पर
बारे ऐ हम-नशीं औक़ात चली जाती है

टुक तो वक़्फ़ा भी कर ऐ गर्दिश-ए-दौराँ कि ये जान
उम्र के हैफ़ ही क्या सात चली जाती है

याँ तो आती नहीं शतरंज-ज़माना की चाल
और वाँ बाज़ी हुई मात चली जाती है

रोज़ आने पे नहीं निस्बत-ए-इश्क़ी मौक़ूफ़
उम्र भर एक मुलाक़ात चली जाती है

शैख़-ए-बे-नफ़स को नज़ला नहीं है नाक की राह
ये है ज़िर्यान-ए-मनी धात चली जाती है

ख़िर्क़ा मिंदील ओ रिदा मस्त लिए जाते हैं
शैख़ की सारी करामात चली जाती है

है मुअज़्ज़िन जो बड़ा मुर्ग़ मुसल्ली उस की
मस्तों से नोक ही की बात चली जाती है

पाँव रुकता नहीं मस्जिद से दम-ए-आख़िर भी
मरने पर आया है पर लात चली जाती है

एक हम ही से तफ़ावुत है सुलूकों में ‘मीर’
यूँ तो औरों की मुदारात चली जाती है

कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था

कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था
शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था

शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया
वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था

मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं
अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था

इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं
वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था

रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे
ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था

याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था

जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के
या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था

बाद ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा
हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था

ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह
ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था

सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे
जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था

शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त
शम्अ का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था

रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं
सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था

रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने
गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था

‘मीर’ भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का
लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था

इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़ा

इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़ा
कुढि़ए कब तक न हो बला से नफ़ा

कब तलक इन बुतों से चश्म रहे
हो रहेगा बस अब ख़ुदा से नफ़ा

मैं तो ग़ैर अज़ ज़रर न देखा कुछ
ढूँढो तुम यार ओ आश्ना से नफ़ा

मुग़्तनिम जान गर किसू के तईं
पहुँचे है तेरे दस्त ओ पा से नफ़ा

अब फ़क़ीरों से कह हक़ीक़त-ए-दिल
‘मीर’ शायद कि हो दुआ से नफ़ा

आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से

आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से
करना सुलूक ख़ूब है अहल-ए-नियाज़ से

फिरते हो क्या दरख़्तों के साए में दूर दूर
कर लो मुवाफ़क़त किसू बेबर्ग-ओ-साज़ से

हिज्राँ में उस के ज़िंदगी करना भला न था
कोताही जो न होवे ये उम्र-ए-दराज़ से

मानिंद-ए-सुब्हा उक़दे न दिल के कभू खुले
जी अपना क्यूँ कि उचटे न रोज़े नमाज़ से

करता है छेद छेद हमारा जिगर तमाम
वो देखना तिरा मिज़ा-ए-नीम-बाज़ से

दिल पर हो इख़्तियार तो हरगिज़ न करिए इश्क़
परहेज़ करिए इस मरज़-ए-जाँ-गुदाज़ से

आगे बिछा के नता को लाते थे तेग़ ओ तश्त
करते थे यानी ख़ून तो इक इम्तियाज़ से

माने हों क्यूँ कि गिर्या-ए-ख़ूनीं के इश्क़ में
है रब्त-ए-ख़ास चश्म को इफ़शा-ए-राज़ से

शायद शराब-ख़ाने में शब को रहे थे ‘मीर’
खेले था एक मुग़बचा मोहर-ए-नमाज़ से

चाक करना है इसी ग़म से

चाक करना है इसी ग़म से गिरेबान-ए-कफ़न
कौन खोलेगा तेरे बन्द-ए-कबा मेरे बाद

वो हवाख़्वाह-ए-चमन हूँ कि चमन में हर सुब्ह
पहले मैं जाता था और बाद-ए-सबा मेरे बाद

तेज़ रखना सर-ए-हर ख़ार को ऐ दश्त-ए-जुनूं
शायद आ जाए कोई आबला पा मेरे बाद

मुँह पे रख दामन-ए-गुल रोएंगे मुर्ग़ान-ए-चमन
हर रविश ख़ाक उड़ाएगी सबा मेरे बाद

बाद मरने के मेरी क़ब्र पे आया वो ‘मीर’
याद आई मेरे ईसा को दवा मेरे बाद

दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया

दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले

मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर

मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर
अल्लाह रे दिमाग़ कि है आसमान पर

कुछ हो रहेगा इश्क़-ओ-हवस में भी इम्तियाज़
आया है अब मिज़ाज तेरा इम्तिहान पर

मोहताज को ख़ुदा न निकाले कि जू हिलाल
तश्हीर कौन शहर में हो पारा-नान पर

शोख़ी तो देखो आप कहा आओ बैठो “मीर”
पूछा कहाँ तो बोले कि मेरी ज़ुबान पर

बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं

बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं
एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं

दर्द अगर ये है तो मुझे बस है
अब दवा की कुछ एहतेयाज नहीं

हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन
मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं

शहर-ए-ख़ूबाँ को ख़ूब देखा मीर
जिंस-ए-दिल का कहीं रिवाज नहीं

नाला जब गर्मकार होता है

नाला जब गर्मकार होता है
दिल कलेजे के पार होता है

सब मज़े दरकिनार आलम के
यार जब हमकिनार होता है

जब्र है, क़ह्र है, क़यामत है
दिल जो बेइख़तियार होता है

रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी

रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
न इस दयार में समझा कोई ज़बाँ मेरी

बरंग-ए-सौत-ए-जरस तुझ से दूर हूँ तनहा
ख़बर नहीं है तुझे आह कारवाँ मेरी

उसी से दूर रहा अस्ल-ए-मुद्दा जो था
गई ये उम्र-ए-अज़ीज़ आह रायगाँ मेरी

तेरे फ़िराक़ में जैसे ख़याल मुफ़्लिस का
गई है फ़िक्र-ए-परेशाँ कहाँ कहाँ मेरी

दिया दिखाई मुझे तो उसी का जल्वा “मीर”
पड़ी जहाँ में जा कर नज़र जहाँ मेरी

 

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