शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 14

शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 14

ऐ हुबे-जाह वालो जो आज ताजवर है

ऐ हुबे-जाह वालो जो आज ताजवर है
कल उसको देखीयो तुम न ताज है न सर है

अब के हवा-ए-गुल में सेराबी है निहायत
जू-ए-चमन पे सबज़ा मिज़गाने-चशमेतर है

शमए-अख़ीरे-शब हूं सुन सरगुज़शत मेरी
फिर सुबह होने तक तो किस्सा ही मुख़तसर है

अब फिर हमारा उसका महशर में माजिरा है
देखें तो उस जगह क्या इनसाफ़े-दादगर है

आफ़त-रसीद हम क्या सर खेंचें इस चमन में
जूं-नख़ले-ख़ुशक हमको न साया न समर है

सुख़न मुश्ताक़ है आलम हमारा

सुख़न मुश्ताक़ है आलम हमारा
बहुत आलम करेगा ग़म हमारा

पढ़ेंगे शेर रो रो लोग बैठे
रहेगा देर तक मातम हमारा

नहीं है मर्जा-ए-आदम अगर ख़ाक
किधर जाता है क़द्द-ए-ख़म हमारा

ज़मीन ओ आसमाँ ज़ेर-ओ-ज़बर है
नहीं कम हश्र से ऊधम हमारा

किसू के बाल दरहम देखते ‘मीर’
हुआ है काम-ए-दिल बरहम हमारा

वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला

वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
याँ शर्म से अरक़ में डूब आफ़्ताब निकला

आया जो वाक़िए में दरपेश आलम-ए-मर्ग
ये जागना हमारा देखा तो ख़्वाब निकला

देखा जो ओस पड़ते गुलशन में हम तो आख़िर
गुल का वो रू-ए-ख़ंदाँ चश्म-ए-पुर-आब निकला

पर्दे ही में चला जा ख़ुर्शीद तो है बेहतर
इक हश्र है जो घर से वो बे-हिजाब निकला

कुछ देर ही लगी न दिल को तो तीर लगते
उस सैद-ए-नातवाँ का क्या जी शिताब निकला

हर हर्फ़-ए-ग़म ने मेरे मज्लिस के तईं रुलाया
गोया ग़ुबार दिल का पढ़ता किताब निकला

रू-ए-अरक़-फ़िशाँ को बस पोंछ गर्म मत हो
उस गुल में क्या रहेगा जिस का गुलाब निकला

मुतलक़ न ए’तिना की अहवाल पर हमारे
नामे का नामे ही में सब पेच-ओ-ताब निकला

शान-ए-तग़ाफ़ुल अपने नौ-ख़त की क्या लिखें हम
क़ासिद मुआ तब उस के मुँह से जवाब निकला

किस की निगह की गर्दिश थी ‘मीर’ रू-ब-मस्जिद
मेहराब में से ज़ाहिद मस्त-ओ-ख़राब निकला

रात गुज़रे है मुझे नज़अ में रोते रोते

रात गुज़रे है मुझे नज़अ में रोते रोते
आँखें फिर जाएँगी अब सुब्ह के होते होते

खोल कर आँख उड़ा दीद जहाँ का ग़ाफ़िल
ख़्वाब हो जाएगा फिर जागना सोते सोते

दाग़ उगते रहे दिल में मिरी नौमीदी से
हारा मैं तुख़्म-ए-तमन्ना को भी बोते बोते

जी चला था कि तिरे होंठ मुझे याद आए
लाल पाएँ हैं मैं इस जी ही के खोते खोते

जम गया ख़ूँ कफ़-ए-क़ातिल पे तिरा ‘मीर’ ज़ि-बस
उन ने रो रो दिया कल हाथ को धोते धोते

यार मेरा बहुत है यार-फ़रेब

यार मेरा बहुत है यार-फ़रेब
मक्र है अहद सब क़रार-फ़रेब

राह रखते हैं उस के दाम से सैद
है बला कोई वो शिकार-फ़रेब

ओहदे से निकलें किस तरह आशिक़
एक अदा उस की है हज़ार-फ़रेब

इल्तिफ़ात-ए-ज़माना पर मत जा
‘मीर’ देता है रोज़गार-फ़रेब

मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में

मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में
कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में

गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें
लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में

अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत
क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में

यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिला जा मिस्र में हुआ था
पाकीज़ा गौहरों की इज़्ज़त नहीं वतन में

दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला
हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में

आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई
क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में

हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की
तब दर्द है हमारे ऐ ‘मीर’ हर सुख़न में

बातें हमारी याद रहें फिर बातें ऐसी न सुनिएगा

बातें हमारी याद रहें फिर बातें ऐसी न सुनिएगा
पढ़ते किसू को सुनिएगा तो देर तलक सर धुनिएगा

सई ओ तलाश बहुत सी रहेगी इस अंदाज़ के कहने की
सोहबत में उलमा फ़ुज़ला की जा कर पढ़िए गिनयेगा

दिल की तसल्ली जब कि होगी गुफ़्त ओ शुनूद से लोगों की
आग फुंकेगी ग़म की बदन में उस में जलिए भुनिएगा

गर्म अशआर ‘मीर’ दरूना दाग़ों से ये भर देंगे
ज़र्द-रू शहर में फिरिएगा गलियों में ने गुल चुनिएगा

दिल-ए-बेताब आफ़त है बला है

दिल-ए-बेताब आफ़त है बला है
जिगर सब खा गया अब क्या रहा है

हमारा तो है अस्ल-ए-मुद्दआ तू
ख़ुदा जाने तिरा क्या मुद्दआ है

मोहब्बत-कुश्ता हैं हम याँ किसू पास
हमारे दर्द की भी कुछ दवा है

हरम से दैर उठ जाना नहीं ऐब
अगर याँ है ख़ुदा वाँ भी ख़ुदा है

नहीं मिलता सुख़न अपना किसू से
हमारा गुफ़्तुगू का ढब जुदा है

कोई है दिल खिंचे जाते हैं ऊधर
फ़ुज़ूली है तजस्सुस ये कि क्या है

मरूँ मैं इस में या रह जाऊँ जीता
यही शेवा मिरा मेहर-ओ-वफ़ा है

सबा ऊधर गुल ऊधर सर्व ऊधर
उसी की बाग़ में अब तो हवा है

तमाशा-कर्दनी है दाग़-ए-सीना
ये फूल इस तख़्ते में ताज़ा खिला है

हज़ारों उन ने ऐसी कीं अदाएँ
क़यामत जैसे इक उस की अदा है

जगह अफ़्सोस की है बाद चंदे
अभी तो दिल हमारा भी बजा है

जो चुपके हूँ कहे चुपके हो क्यूँ तुम
कहो जो कुछ तुम्हारा मुद्दआ है

सुख़न करिए तो होवे हर्फ़-ज़न यूँ
बस अब मुँह मूँद ले मैं ने सुना है

कब उस बेगाना-ख़ू को समझे आलम
अगरचे यार आलम-आश्ना है

न आलम में है ने आलम से बाहर
प सब आलम से आलम ही जुदा है

लगा मैं गिर्द सर फिरने तो बोला
तुम्हारा ‘मीर’ साहिब सर-फिरा है

तेरा रुख़-ए-मुख़त्तत क़ुरआन है हमारा

तेरा रुख़-ए-मुख़त्तत क़ुरआन है हमारा
बोसा भी लें तो क्या है ईमान है हमारा

गर है ये बे-क़रारी तो रह चुका बग़ल में
दो रोज़ दिल हमारा मेहमान है हमारा

हैं इस ख़राब दिल से मशहूर शहर-ए-ख़ूबाँ
इस सारी बस्ती में घर वीरान है हमारा

मुश्किल बहुत है हम सा फिर कोई हाथ आना
यूँ मारना तो प्यारे आसान है हमारा

इदरीस ओ ख़िज़्र ओ ईसा क़ातिल से हम छुड़ाए
उन ख़ूँ-गिरफ़्तगाँ पर एहसान है हमारा

हम वे हैं सुन रखो तुम मर जाएँ रुक के यकजा
क्या कूचा कूचा फिरना उनवान है हमारा

हैं सैद-गह के मेरी सय्याद क्या न धड़के
कहते हैं सैद जो है बे-जान है हमारा

करते हैं बातें किस किस हंगामे की ये ज़ाहिद
दीवान-ए-हश्र गोया दीवान है हमारा

ख़ुर्शीद-रू का परतव आँखों में रोज़ हैगा
यानी कि शर्क़-रूया दालान है हमारा

माहिय्यत-ए-दो-आलम खाती फिरे है ग़ोते
यक क़तरा ख़ून ये दिल तूफ़ान है हमारा

नाले में अपने हर शब आते हैं हम भी पिन्हाँ
ग़ाफ़िल तिरी गली में मिंदान है हमारा

क्या ख़ानदाँ का अपने तुझ से कहें तक़द्दुस
रूहुल-क़ुदूस इक अदना दरबान है हमारा

करता है काम वो दिल जो अक़्ल में न आवे
घर का मुशीर कितना नादान है हमारा

जी जा न आह ज़ालिम तेरा ही तो है सब कुछ
किस मुँह से फिर कहें जी क़ुर्बान है हमारा

बंजर ज़मीन दिल की है ‘मीर’ मिल्क अपनी
पुर-दाग़ सीना मोहर-ए-फ़रमान है हमारा

जो कहो तुम सो है बजा साहब

जो कहो तुम सो है बजा साहब
हम बुरे ही सही भला साहब

सादा ज़ेहनी में नुक्ता-चीं थे तुम
अब तो हैं हर्फ़ आश्ना साहब

न दिया रहम टुक बुतों के तईं
क्या किया हाए ये ख़ुदा साहब

बंदगी एक अपनी क्या कम है
और कुछ तुम से कहिए क्या साहब

मेहर अफ़ज़ा है मुँह तुम्हारा ही
कुछ ग़ज़ब तो नहीं हुआ साहब

ख़त के फटने का तुम से क्या शिकवा
अपने ताले का ये लिखा साहब

फिर गईं आँखें तुम न आन फिरे
देखा तुम को भी वाह वा साहब

शौक़-ए-रुख़ याद-ए-लब ग़म-ए-दीदार
जी में क्या क्या मिरे रहा साहब

भूल जाना नहीं ग़ुलाम का ख़ूब
याद ख़ातिर रहे मिरा साहब

किन ने सुन शेर ‘मीर’ ये न कहा
कहियो फिर हाए क्या कहा साहब

जब हम-कलाम हम से होता है पान खा कर

जब हम-कलाम हम से होता है पान खा कर
किस रंग से करे है बातें चबा चबा कर

थी जुम्लातन लताफ़त आलम में जाँ के हम तो
मिट्टी में अट गए हैं इस ख़ाक-दाँ में आ कर

सई ओ तलब बहुत की मतलब के तईं न पहुँचे
नाचार अब जहाँ से बैठे हैं हाथ उठा कर

ग़ैरत ये थी कि आया उस से जो मैं ख़फ़ा हो
मरते मुआ पे हरगिज़ ऊधर फिरा न जा कर

क़ुदरत ख़ुदा की सब में ख़लउल-इज़ार आओ
बैठो जो मुझ कने तो पर्दे में मुँह छुपा कर

अरमान है जिन्हों को वे अब करें मोहब्बत
हम तो हुए पशीमाँ दिल के तईं लगा कर
मैं ‘मीर’ तर्क ले कर दुनिया से हाथ उठाया
दरवेश तू भी तो है हक़ में मिरे दुआ कर

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