शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 13

शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 13

हो गई शहर शहर रुस्वाई

हो गई शहर शहर रुस्वाई
ऐ मिरी मौत तू भली आई

यक बयाबाँ ब-रंग सौत-ए-जरस
मुझ पे है बेकसी ओ तन्हाई

न खिंचे तुझ से एक जा नक़्क़ाश
उस की तस्वीर वो है हरजाई

सर रखूँ उस के पाँव पर लेकिन
दस्त-ए-क़ुदरत ये मैं कहाँ पाई

‘मीर’ जब से गया है दिल तब से
मैं तो कुछ हो गया हूँ सौदाई

शायद उस सादा ने रखा है ख़त

शायद उस सादा ने रखा है ख़त
कि हमें मुत्तसिल लिक्खा है ख़त

शौक़ से बात बढ़ गई थी बहुत
दफ़्तर उस को लिखें हैं क्या है ख़त

नामा कब यार ने पढ़ा सारा
न कहा ये भी आश्ना है ख़त

साथ हम भी गए हैं दूर तलक
जब उधर के तईं चला है ख़त

कुछ ख़लल राह में हुआ ऐ ‘मीर’
नामा-बर कब से ले गया है ख़त

वहशत थी हमें भी वही घर-बार से अब तक

वहशत थी हमें भी वही घर-बार से अब तक
सर मारे हैं अपने दर ओ दीवार से अब तक

मरते ही सुना उन को जिन्हें दिल-लगी कुछ थी
अच्छा हुआ कोई इस आज़ार से अब तक

जब से लगी हैं आँखें खुली राह तके हैं
सोए नहीं साथ उस के कभू प्यार से अब तक

आया था कभू यार सो मामूल हम उस के
बिस्तर पे गिरे रहते हैं बीमार से अब तक

बद-अहदियों में वक़्त-ए-वफ़ात आन भी पहुँचा
वादा न हुआ एक वफ़ा यार से अब तक

है क़हर ओ ग़ज़ब देख तरफ़ कुश्ते के ज़ालिम
करता है इशारत भी तू तलवार से अब तक

कुछ रंज-ए-दिली ‘मीर’ जवानी में खिंचा था
ज़र्दी नहीं जाती मिरे रुख़्सार से अब तक

रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं

रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं
साथ उस कारवाँ के हम भी हैं

शम्अ ही सर न दे गई बर्बाद
कुश्ता अपनी ज़बाँ के हम भी हैं

हम को मजनूँ को इश्क़ में मत बूझ
नंग उस ख़ानदाँ के हम भी हैं

जिस चमन-ज़ार का है तू गुल-ए-तर
बुलबुल इस गुलसिताँ के हम भी हैं

नहीं मजनूँ से दिल क़वी लेकिन
यार उस ना-तवाँ के हम भी हैं

बोसा मत दे किसू के दर पे नसीम
ख़ाक उस आस्ताँ के हम भी हैं

गो शब उस दर से दूर पहरों फिरें
पास तो पासबाँ के हम भी हैं

वजह-ए-बेगानगी नहीं मालूम
तुम जहाँ के हो वाँ के हम भी हैं

मर गए मर गए नहीं तो नहीं
ख़ाक से मुँह को ढाँके हम भी हैं

अपना शेवा नहीं कजी यूँ तो
यार जी टेढ़े बाँके हम भी हैं

इस सिरे की है पारसाई ‘मीर’
मो’तक़िद उस जवाँ के हम भी हैं

यार ने हम से बे-अदाई की

यार ने हम से बे-अदाई की
वस्ल की रात में लड़ाई की

बाल-ओ-पर भी गए बहार के साथ
अब तवक़्क़ो नहीं रिहाई की

कुल्फ़त-ए-रंज-ए-इश्क़ कम न हुई
मैं दवा की बहुत शिफ़ाई की

तुर्फ़ा रफ़्तार के हैं रफ़्ता सब
धूम है उस की रहगिराई की

ख़ंदा-ए-यार से तरफ़ हो कर
बर्क़ ने अपनी जग-हँसाई की

कुछ मुरव्वत न थी उन आँखों में
देख कर क्या ये आश्नाई की

वस्ल के दिन को कार-ए-जाँ न खिंचा
शब न आख़िर हुई जुदाई की

मुँह लगाया न दुख़्तर-ए-रज़ को
मैं जवानी में पारसाई की

जौर उस संग-दिल के सब न खिंचे
उम्र ने सख़्त बेवफ़ाई की

कोहकन क्या पहाड़ तोड़ेगा
इश्क़ ने ज़ोर-आज़माई की

चुपके उस की गली में फिरते रहे
देर वाँ हम ने बे-नवाई की

इक निगह में हज़ार जी मारे
साहिरी की कि दिलरुबाई की

निस्बत उस आस्ताँ से कुछ न हुई
बरसों तक हम ने जब्हा-साई की

‘मीर’ की बंदगी में जाँ-बाज़ी
सैर सी हो गई ख़ुदाई की

मक्का गया मदीना गया कर्बला गया

मक्का गया मदीना गया कर्बला गया
जैसा गया था वैसा ही चल फिर के आ गया

देखा हो कुछ उस आमद-ओ-शुद में तो मैं कहूँ
ख़ुद गुम हुआ हूँ बात की तह अब जो पा गया

कपड़े गले के मेरे न हों आब-दीदा क्यूँ
मानिंद-ए-अब्र-ए-दीदा-ए-तर अब तो छा गया

जाँ-सोज़ आह ओ नाला समझता नहीं हूँ मैं
यक शोला मेरे दिल से उठा था जला गया

वो मुझ से भागता ही फिरा किब्र-ओ-नाज़ से
जूँ जूँ नियाज़ कर के मैं उस से लगा गया

जोर-ए-सिपहर-ए-दूँ से बुरा हाल था बहुत
मैं शर्म-ए-ना-कसी से ज़मीं में समा गया

देखा जो राह जाते तबख़्तुर के साथ उसे
फिर मुझ शिकस्ता-पा से न इक-दम रहा गया

बैठा तो बोरिए के तईं सर पे रख के ‘मीर’
सफ़ किस अदब से हम फ़ुक़रा की उठा गया

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल
छानी चमन की ख़ाक न था नक़्श-ए-पा-ए-गुल

अल्लाह रे अंदलीब की आवाज़-ए-दिल-ख़राश
जी ही निकल गया जो कहा उन ने हाए गुल

मक़्दूर तक शराब से रख अँखड़ियों में रंग
ये चश्मक-ए-प्याला है साक़ी हवा-ए-गुल

ये देख सीना दाग़ से रश्क-ए-चमन है याँ
बुलबुल सितम हुआ न जो तू ने भी खाए गुल

बुलबुल हज़ार जी से ख़रीदार उस की है
ऐ गुलफ़रोश करियो समझ कर बहा-ए-गुल

निकला है ऐसी ख़ाक से किस सादा-रू की ये
क़ाबिल दुरूद भेजने के है सफ़ा-ए-गुल

बारे सरिश्क-ए-सुर्ख़ के दाग़ों से रात को
बिस्तर पर अपने सोते थे हम भी बिछाए गुल

आ अंदलीब सुल्ह करें जंग हो चुकी
ले ऐ ज़बाँ-दराज़ तू सब कुछ सिवाए गुल

गुलचीं समझ के चुनियो कि गुलशन में ‘मीर’ के
लख़्त-ए-जिगर पड़े हैं नहीं बर्ग-हा-ए-गुल

दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला

दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला
आ पड़ी ये ऐसी चिंगारी कि पैराहन जला

सरकशी ही है जो दिखलाती है इस मज्लिस में दाग़
हो सके तो शम्अ साँ दीजे रग-ए-गर्दन जला

बदर साँ अब आख़िर आख़िर छा गई मुझ पर ये आग
वर्ना पहले था मिरा जूँ माह नौ दामन जला

कब तलक धूनी लगाए जोगियों की सी रहूँ
बैठे बैठे दर पे तेरे तो मिरा आसन जला

गर्मी उस आतिश के पर काले से रखे चश्म तब
जब कोई मेरी तरह से देवे सब तन मन जला

हो जो मिन्नत से तो क्या वो शब नशीनी बाग़ की
काट अपनी रात को ख़ार-ओ-ख़स-ए-गुल ख़न जला

सूखते ही आँसुओं के नूर आँखों का गया
बुझ ही जाते हैं दिए जिस वक़्त सब रोग़न जला

शोला अफ़्शानी नहीं ये कुछ नई इस आह से
दूँ लगी है ऐसी ऐसी भी कि सारा बन जला

आग सी इक दिल में सुलगे है कभू भड़की तो ‘मीर’
देगी मेरी हड्डियों का ढेर जूँ ईंधन जला

ताब-ए-दिल सर्फ़-ए-जुदाई हो चुकी

ताब-ए-दिल सर्फ़-ए-जुदाई हो चुकी
यानी ताक़त आज़माई हो चुकी

छूटता कब है असीर-ए-ख़ुश-ज़बाँ
जीते जी अपनी रिहाई हो चुकी

आगे हो मस्जिद के निकली उस की राह
शैख़ से अब पारसाई हो चुकी

दरमियाँ ऐसा नहीं अब आईना
मेरे उस के अब सफ़ाई हो चुकी

एक बोसा माँगते लड़ने लगे
इतने ही में आश्नाई हो चुकी

बीच में हम ही न हों तो लुत्फ़ क्या
रहम कर अब बेवफ़ाई हो चुकी

आज फिर था बे-हमीयत ‘मीर’ वाँ
कल लड़ाई सी लड़ाई हो चुकी

जिस जगह दौर-ए-जाम होता है

जिस जगह दौर-ए-जाम होता है
वाँ ये आजिज़ मुदाम होता है

हम तो इक हर्फ़ के नहीं मम्नून
कैसा ख़त ओ पयाम होता है

तेग़ नाकामों पे न हर दम खींच
इक करिश्मे में काम होता है

पूछ मत आह आशिक़ों की मआश
रोज़ उन का भी शाम होता है

ज़ख़्म बिन ग़म बिन और ग़ुस्सा बिन
अपना खाना हराम होता है

शैख़ की सी ही शक्ल है शैतान
जिस पे शब एहतेलाम होता है

क़त्ल को मैं कहा तो उठ बोला
आज कल सुब्ह ओ शाम होता है

आख़िर आऊँगा नाश पर अब आह
कि ये आशिक़ तमाम होता है

‘मीर’ साहब भी उस के हाँ थे पर
जैसे कोई ग़ुलाम होता है

जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है

जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है
रूमाल दो दो दिन तक जूँ अब्र-ए-तर रहे है

आह-ए-सहर की मेरी बरछी के वसवसे से
ख़ुर्शीद के मुँह ऊपर अक्सर सिपर रहे है

आगह तो रहिए उस की तर्ज़-ए-रह-ओ-रविश से
आने में उस के लेकिन किस को ख़बर रहे है

उन रोज़ों इतनी ग़फ़लत अच्छी नहीं इधर से
अब इज़्तिराब हम को दो दो पहर रहे है

आब-ए-हयात की सी सारी रविश है उस की
पर जब वो उठ चले है एक आध मर रहे है

तलवार अब लगा है बे-डोल पास रखने
ख़ून आज कल किसू का वो शोख़ कर रहे है

दर से कभू जो आते देखा है मैं ने उस को
तब से उधर ही अक्सर मेरी नज़र रहे है

आख़िर कहाँ तलक हम इक रोज़ हो चुकेंगे
बरसों से वादा-ए-शब हर सुब्ह पर रहे है

‘मीर’ अब बहार आई सहरा में चल जुनूँ कर
कोई भी फ़स्ल-ए-गुल में नादान घर रहे है

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