शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 7

शायरी-मीर तक़ी मीर-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mir Taqi Mir Poetry/Shayari part 7

आ के सज्जादः नशीं क़ैस हुआ मेरे बाद

आ के सज्जादः नशीं क़ैस हुआ मेरे बाद
न रही दश्त में ख़ाली कोई जा मेरे बाद

चाक करना है इसी ग़म से गिरेबान-ए-क़फ़न
कौन खोलेगा तेरे बन्द-ए-कबा मेरे बाद

वो हवाख़्वाहे-चमन हूँ कि चमन में हर सुब्ह
पहले मैं जाता था और बाद-ए-सबा मेरे बाद

तेज़ रखना सर-ए-हर ख़ार को ऐ दश्त-ए-जुनूँ !
शायद आ जाए कोई आबला-पा मेरे बाद

मुँह पे रख दामन-ए-गुल रोएंगे मुर्ग़ान-ए-चमन
हर रविश ख़ाक उड़ाएगी सबा मेरे बाद

बाद मरने के मेरी क़ब्र पे आया वो ‘मीर’
याद आई मेरे ईसा को दवा मेरे बाद

दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया

दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया
झँकना ताकना कभु न गया

हर क़दम पर थी उस की मंज़िल लेक
सर से सौदा-ए-जुस्तजू न गया

सब गये होश-ओ-सब्र-ओ-ताब-ओ-तवाँ
लेकिन ऐ दाग़ दिल से तु न गया

हम ख़ुदा के कभी क़ायल तो न थे
उन को देखा तो ख़ुदा याद आ गया

दिल में कितने मसौदे थे वले
एक पेश उस के रू-ब-रू न गया

सुबाह गर्दान ही ‘मीर’ हम तो रहे
दस्त-ए-कोताह ता सबू न गया

आरज़ूएं हज़ार रखते हैं

आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
तो भी हम दिल को मार रखते हैं

बर्क़ कम हौसला है, हम भी तो
दिलक एे बेक़रार रखते हैं

ग़ैर है मौरीद ए इनायत हाये
हम भी तो तुझ से प्यार रखते हैं

न निगह ने पयाम ने वादा
नाम को हम भी यार रखते हैं

हम से ख़ुश-ज़मज़मा कहाँ यूँ तो
लब ओ लहजा हज़ार रखते हैं

चोटटे दिल की हैं बुतां मशहूर
बस, यही एतबार रखते हैं

फिर भी करते हैं ‘मीर’ साहब इश्क
हैं जवाँ, इख़्तियार रखते

यही इश्क़ ही जी खपा जानता है

यही इश्क़ ही जी खपा जानता है
कि जानाँ से भी दिल मिला जानता है

मेरा शे’र अच्छा भी दानिस्ता ज़िद से
किसी और ही का कहा जानता है

ज़माने के अक्सर सितम्गार देखे
वही ख़ूब तर्ज़-ए-जफ़ा जानता है

नहीं विश्वास जी गँवाने के

नहीं विश्वास जी गँवाने के
हाय रे ज़ौक़ दिल लगाने के

मेरे तग़यीर-ए-हाल पर मत जा
इत्तेफ़ाक़ात हैं ज़माने के

दम-ए-आखिर ही क्या न आना था
और भी वक़्त थे बहाने के

इस कदूरत को हम समझते हैं
ढब हैं ये ख़ाक में मिलाने के

दिल-ओ-दीं, होश-ओ-सब्र, सब ही गए
आगे-आगे तुम्हारे आने के

मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर

मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर
मस्जिद में है क्या शेख़ प्याला न निवाला

गुज़रे है लहू वाँ सर-ए-हर-ख़ार से अब तक
जिस दश्त में फूटा है मेरे पांव का छाला

देखे है मुझे दीदा-ए-पुरचश्म से वो “मीर”
मेरे ही नसीबों में था ये ज़हर का प्याला

हर जी का हयात है

हर जी हयात का, है सबब जो हयात का
निकले है जी उसी के लिए, कायनात का

बिखरे हैं जुल्‍फ, उस रूख-ए-आलम फ़रोज पर
वर्न:, बनाव होवे न दिन और रात का

उसके फ़रोग-ए-हुस्‍न से, झमके है सब में नूर
शम्म-ए-हरम हो या कि दिया सोमनात का

क्‍या मीर तुझ को नाम: सियाही की फ़िक्र है
ख़त्‍म-ए-रूसुल सा शख्‍स है, जामिन नजात का

अमीरों तक रसाई हो चुकी बस

अमीरों तक रसाई हो चुकी बस
मिरी बख़्त-आज़माई हो चुकी बस

बहार अब के भी जो गुज़री क़फ़स में
तो फिर अपनी रिहाई हो चुकी बस

कहाँ तक उस से क़िस्सा क़ज़िया हर शब
बहुत बाहम लड़ाई हो चुकी बस

न आया वो मिरे जाते जहाँ से
यहीं तक आश्नाई हो चुकी बस

लगा है हौसला भी करने तंगी
ग़मों की अब समाई हो चुकी बस

बराबर ख़ाक के तो कर दिखाया
फ़लक बस बे-अदाई हो चुकी बस

दनी के पास कुछ रहती है दौलत
हमारे हाथ आई हो चुकी बस

दिखा उस बुत को फिर भी या ख़ुदाया
तिरी क़ुदरत-नुमाई हो चुकी बस

शरर की सी है चश्मक फ़ुर्सत-ए-उम्र
जहाँ दे टुक दिखाई हो चुकी बस

गले में गेरवी कफ़नी है अब ‘मीर’
तुम्हारी मीरज़ाई हो चुकी बस

इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा

इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
आख़िर अब दूरी में जी जाता रहा

मेहर ओ मह गुल फूल सब थे पर हमें
चेहरई चेहरा ही वो भाता रहा

दिल हुआ कब इश्क़ की रह का दलील
मैं तो ख़ुद गुम ही उसे पाता रहा

मुँह दिखाता बरसों वो ख़ुश-रू नहीं
चाह का यूँ कब तलक नाता रहा

कुछ न मैं समझा जुनून ओ इश्क़ में
देर नासेह मुझ को समझाता रहा

दाग़ था जो सर पे मेरे शम्अ साँ
पाँव तक मुझ को वही खाता रहा

कैसे कैसे रुक गए हैं ‘मीर’ हम
मुद्दतों मुँह तक जिगर आता रहा

उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया

उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
क़स्मे कि इश्क़ जी से मिरे ताब ले गया

किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया

आवे जो मस्तबा में तो सुन लो कि राह से
वाइज़ को एक जाम-ए-मय-ए-नाब ले गया

ने दिल रहा बजा है न सब्र ओ हवास ओ होश
आया जो सैल-ए-इश्क़ सब अस्बाब ले गया

मेरे हुज़ूर शम्अ ने गिर्या जो सर किया
रोया मैं इस क़दर कि मुझे आब ले गया

अहवाल उस शिकार ज़ुबूँ का है जाए रहम
जिस ना-तवाँ को मुफ़्त न क़स्साब ले गया

मुँह की झलक से यार के बेहोश हो गए
शब हम को ‘मीर’ परतव-ए-महताब ले गया

काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच

काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच
हों जो रहमत के सज़ा-वारों के बीच

जी सदा उन अबरूओं ही में रहा
की बसर हम उम्र तलवारों के बीच

चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच

हैं अनासिर की ये सूरत बाज़ियाँ
शोबदे क्या क्या हैं उन चारों के बीच

जब से ले निकला है तू ये जिंस-ए-हुस्न
पड़ गई है धूम बाज़ारों के बीच

आशिक़ी ओ बेकसी ओ रफ़्तगी
जी रहा कब ऐसे आज़ारों के बीच

जो सरिश्क उस माह बिन झमके है शब
वो चमक काहे को है तारों के बीच

उस के आतिशनाक रुख़्सारों बग़ैर
लोटिए यूँ कब तक अँगारों के बीच

बैठना ग़ैरों में कब है नंग-ए-यार
फूल गुल होते ही हैं ख़ारों के बीच

यारो मत उस का फ़रेब-ए-मेहर खाओ
‘मीर’ भी थे उस के ही यारों के बीच

क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं

क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
छातियाँ सुलगें हैं ऐसी कि जले जाते हैं

गौहर-ए-गोश किसू का नहीं जी से जाता
आँसू मोती से मिरे मुँह पे ढले जाते हैं

यही मसदूद है कुछ राह-ए-वफ़ा वर्ना बहम
सब कहीं नामा ओ पैग़ाम चले जाते हैं

बार-ए-हिरमान-ओ-गुल-ओ-दाग़ नहीं अपने साथ
शजर-ए-बाग़-ए-वफ़ा फूले फले जाते हैं

हैरत-ए-इश्क़ में तस्वीर से रफ़्ता ही रहे
ऐसे जाते हैं जो हम भी तो भले जाते हैं

हिज्र की कोफ़्त जो खींचे हैं उन्हीं से पूछो
दिल दिए जाते हैं जी अपने मले जाते हैं

याद-ए-क़द में तिरे आँखों से बहें हैं जुएँ
गर किसू बाग़ में हम सर्व तले जाते हैं

देखें पेश आवे है क्या इश्क़ में अब तो जूँ सैल
हम भी इस राह में सर गाड़े चले जाते हैं

पुर-ग़ुबारी-ए-जहाँ से नहीं सुध ‘मीर’ हमें
गर्द इतनी है कि मिट्टी में रुले जाते हैं

क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़

क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़
हक़-शनासों के हाँ ख़ुदा है इश्क़

दिल लगा हो तो जी जहाँ से उठा
मौत का नाम प्यार का है इश्क़

और तदबीर को नहीं कुछ दख़्ल
इश्क़ के दर्द की दवा है इश्क़

क्या डुबाया मुहीत में ग़म के
हम ने जाना था आश्ना है इश्क़

इश्क़ से जा नहीं कोई ख़ाली
दिल से ले अर्श तक भरा है इश्क़

कोहकन क्या पहाड़ काटेगा
पर्दे में ज़ोर-आज़मा है इश्क़

इश्क़ है इश्क़ करने वालों को
कैसा कैसा बहम क्या है इश्क़

कौन मक़्सद को इश्क़ बिन पहुँचा
आरज़ू इश्क़ मुद्दआ है इश्क़

‘मीर’ मरना पड़े है ख़ूबाँ पर
इश्क़ मत कर कि बद बला है इश्क़

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