शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 2

शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 2

 बस कि दुशवार है हर काम का आसां होना

बस कि दुशवार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इनसां होना

गिरीया चाहे है खराबी मिरे काशाने की
दरो-दीवार से टपके है बयाबां होना

वाए दीवानगी-ए-शौक कि हरदम मुझको
आप जाना उधर और आप ही हैरां होना

जलवा अज़-बसकि तकाज़ा-ए-निगह करता है
जौहरे-आईना भी चाहे है मिज़गां होना

इशरते-कतलगहे-अहले-तमन्ना मत पूछ
ईदे-नज़्ज़ारा है शमशीर का उरीयां होना

ले गए ख़ाक में हम, दाग़े-तमन्ना-ए-निशात
तू हो और आप बसद रंग गुलिसतां होना

इशरते-पारा-ए-दिल, ज़ख़्म-तमन्ना खाना
लज़्ज़ते-रेशे-जिगर, ग़रके-नमकदां होना

की मिरे कतल के बाद, उसने जफ़ा से तौबा
हाय, उस जूद पशेमां का पशेमां होना

हैफ़, उस चार गिरह कपड़े की किस्मत ‘ग़ालिब’
जिसकी किस्मत में हो, आशिक का गिरेबां होना

दिले-नादां तुझे हुआ क्या है

दिले-नादां तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुशताक और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है

मैं भी मूंह में ज़ुबान रखता हूं
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है

जबकि तुज बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा-ए-ख़ुदा क्या है

ये परी चेहरा लोग कैसे हैं
ग़मज़ा-ओ-इशवा-यो अदा क्या है

शिकने-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरी क्या है
निगह-ए-चशम-ए-सुरमा क्या है

सबज़ा-ओ-गुल कहां से आये हैं
अबर क्या चीज है हवा क्या है

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

हां भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

जान तुम पर निसार करता हूं
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

मैंने माना कि कुछ नहीं ‘ग़ालिब’
मुफ़त हाथ आये तो बुरा क्या है

घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता

घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता

तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशां होता

वादे-यक उम्र-वराय बार तो देता बारे
काश रिज़वां ही दरे-यार का दरबां होता

की वफ़ा हमसे तो ग़ैर उसको जफ़ा कहते हैं

की वफ़ा हमसे तो ग़ैर उसको जफ़ा कहते हैं
होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उनसे
कहने जाते तो हैं, पर देखीए क्या कहते हैं

अगले वकतों के हैं ये लोग इनहें कुछ न कहो
जो मै-ओ-नग़मा को अन्दोहरुबा कहते हैं

दिल में आ जाये है होती है जो फ़ुरसत ग़म से
और फिर कौन से नाले को रसा कहते हैं

है परे सरहदे-इदराक से अपना मसजूद
किबले को अहले-नज़र किबला नुमा कहते हैं

पाए-अफ़गार पे जब तुझे रहम आया है
खारे-रह को तेरे हम मेहर गिया कहते हैं

इक शरर दिल में है उससे कोई घबराएगा क्या
आग मतलूब है हमको जो हवा कहते हैं

देखीए लाती है उस शोख़ की नख़वत क्या रंग
उसकी हर बात पे हम नामे-ख़ुदा कहते हैं

वहशत-ओ-शेफ़ता अब मरसीया कहवें शायद
मर गया ग़ालिब-ए-आसुफ़ता-नवा कहते हैं

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता

हुआ जब ग़म से यूं बेहस, तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से, तो जानूं पर धरा होता

हुयी मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया, पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता

शौक हर रंग, रकीबे-सरो-सामां निकला

शौक हर रंग, रकीबे-सरो-सामां निकला
कैस तसवीर के परदे में भी उरीयां निकला

ज़ख़्म ने दाद न दी तंगीए-दिल की या रब
तीर भी सीना-ए-बिसमिल से पर-अफ़शां निकला

बूए-गुल, नाला-ए-दिल, दूदे-चराग़े-महफ़िल
जो तिरी बज़म से निकला, सो परीशां निकला

दिले-हसरतज़दा था मायद-ए-लज़्ज़ते-दर्द
काम यारों का, बकदरे-लबो-दन्दां निकला

है नौआमोज़े-फ़ना, हिंमते-दुशवार-पसन्द
सख़त मुशकिल है, कि यह काम भी आसां निकला

दिल में फिर गिरीए ने जोर (शोर) उठाया, ‘ग़ालिब’
आह जो कतरा न निकला था, सो तूफ़ां निकला

सब कहां ? कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायां हो गईं

सब कहां ? कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायां हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिनहां हो गईं

याद थी हमको भी रंगा-रंग बज़मआराययां
लेकिन अब नक्श-ओ-निगार-ए-ताक-ए-निसियां हो गईं

थीं बनातुन्नाश-ए-गरदूं दिन को परदे में नेहां
शब को उनके जी में क्या आई कि उरियां हो गईं

कैद से याकूब ने ली गो न यूसुफ़ की ख़बर
लेकिन आंखें रौज़न-ए-दीवार-ए-ज़िन्दां हो गईं

सब रकीबों से हों नाख़ुश, पर ज़नान-ए-मिस्र से
है ज़ुलेख़ा ख़ुश कि महवे-माह-ए-कनआं हो गईं

जू-ए-ख़ूं आंखों से बहने दो कि है शाम-ए-फ़िराक
मैं ये समझूंगा के दो शमअएं फ़रोज़ां हो गईं

इन परीज़ादों से लेंगे ख़ुलद में हम इंतकाम
कुदरत-ए-हक से यही हूरें अगर वां हो गईं

नींद उसकी है, दिमाग़ उसका है, रातें उसकी हैं
तेरी ज़ुल्फ़ें जिसके बाज़ू पर परीशां हो गईं

मैं चमन में क्या गया, गोया दबिसतां खुल गया
बुलबुलें सुन कर मेरे नाले, ग़ज़लख़्वां हो गईं

वो निगाहें कयों हुयी जाती हैं यारब दिल के पार
जो मेरी कोताही-ए-किस्मत से मिज़गां हो गईं

बस कि रोका मैंने और सीने में उभरीं पै-ब-पै
मेरी आहें बख़िया-ए-चाक-ए-गरीबां हो गईं

वां गया भी मैं, तो उनकी गालियों का क्या जवाब ?
याद थीं जितनी दुआयें, सरफ़-ए-दरबां हो गईं

जां-फ़िज़ां है बादा, जिसके हाथ में जाम आ गया
सब लकीरें हाथ की गोया रग-ए-जां हो गईं

हम मुवहद्द हैं, हमारा केश है तरक-ए-रूसूम
मिल्लतें जब मिट गईं, अज़्ज़ा-ए-ईमां, हो गईं

रंज से ख़ूगर हुआ इनसां तो मिट जाता है रंज
मुशिकलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं

यूं ही गर रोता रहा ‘ग़ालिब’, तो ऐ अहल-ए-जहां !
देखना इन बसितयों को तुम, कि वीरां हो गईं

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