शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 9

शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 9

ज़ख़्म पर छिड़कें कहां तिफ़लान-ए-बेपरवा नमक

ज़ख़्म पर छिड़कें कहां तिफ़लान-ए-बेपरवा नमक
क्या मज़ा होता अगर पत्थर में भी होता नमक
गरद-ए-राह-ए-यार है सामान-ए-नाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल
वरना होता है जहां में किस कदर पैदा नमक

मुझ को अरज़ानी रहे तुझ को मुबारक हो जयूं
नाला-ए-बुलबुल का दर्द और ख़न्दा-ए-गुल का नमक

शोर-ए-जौलां था कनार-ए-बहर पर किस का कि आज
गरद-ए-साहल है ब-ज़ख़्म-ए-मौज-ए-दरिया नमक

दाद देता है मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर की वाह वाह
याद करता है मुझे देखे है वो जिस जा नमक

छोड़ कर जाना तन-ए-मजरूह-ए-आशिक हैफ़ है
दिल तलब करता है ज़ख़्म और मांगे हैं आज़ा नमक

ग़ैर की मिन्नत न खींचूंगा पय-ए-तौफ़ीर-ए-दर्द
ज़ख़्म मिसल-ए-ख़न्दा-ए-कातिल है सर-ता-पा नमक

याद हैं ‘ग़ालिब’ तुझे वो दिन कि वजद-ए-ज़ौक में
ज़ख़्म से गिरता तो मैं पलकों से चुनता था नमक

आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं

आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं
है गरेबां नंग-ए-पैराहन जो दामन में नहीं

ज़ोफ़ से ऐ गिरिया, कुछ बाकी मेरे तन में नहीं
रंग हो कर उड़ गया, जो ख़ूं कि दामन में नहीं

हो गए हैं जमा अज़्ज़ा-ए-निगाहे-आफ़ताब
ज़र्रे उसके घर की दीवारों के रौज़न में नहीं

क्या कहूं तारीकी-ए-ज़िन्दान-ए-ग़म अंधेर है
पुम्बा नूर-व-सुबह से कम जिसके रौज़न में नहीं

रौनक-ए-हसती है इशके-ख़ाना-वीरां-साज़ से
अंजुमन बे-शमय है, गर बरक ख़िरमन में नहीं

ज़खम सिलवाने से मुझ पर चाराजोयी का है ताअन
ग़ैर समझा है कि लज़्ज़त ज़ख़्मे-सोज़न में नहीं

बस कि हैं हम इक बहारे-नाज़ के मारे हुए
जलवा-ए-गुल के सिवा गरद अपने मदफ़न में नहीं

कतरा-कतरा इक हयूला है, नए नासूर का
ख़ूं भी ज़ौके-दर्द से फ़ारिग़ मेरे तन में नहीं

ले गई साकी की नख़वत कुलज़ुम-आशामी मेरी
मौजे-मय की आज रग मीना की गरदन में नहीं

हो फ़िशारे-ज़ोफ़ में क्या नातवानी की नुमूद
कद के झुकने की भी गुंजायश मेरे तन में नहीं

थी वतन में शान क्या ग़ालिब, कि हो ग़ुरबत में कद्र
बे-तकललुफ़ हूं वो मुशते-ख़स कि गुलख़न में नहीं

हम पर जफ़ा से तरक-ए-वफ़ा का गुमां नहीं

हम पर जफ़ा से तरक-ए-वफ़ा का गुमां नहीं
इक छेड़ है, वगरना मुराद इमतहां नहीं

किस मुंह से शुक्र कीजिए इस लुतफ़-ए-ख़ास का
पुरसिश है और पा-ए-सुख़न दरमियां नहीं

हमको सितम अज़ीज़ सितमगर को हम अज़ीज़
ना-मेहरबां नहीं है, अगर मेहरबां नहीं

बोसा नहीं न दीजिए दुशनाम ही सही
आख़िर ज़बां तो रखते हो तुम, गर दहां नहीं

हरचन्द जां-गुदाज़ी-ए-कहर-ओ-इताब है
हरचन्द पुशत-गरमी-ए-ताब-ओ-तवां नहीं

जां मुतरिब-ए-तराना-ए-‘हल-मिम-मज़ीद’ है
लब, परदा संज-ए-ज़मज़म-ए-अल-अमां नहीं

ख़ंजर से चीर सीना, अगर दिल न हो दो-नीम
दिल में छुरी चुभो, मिज़गां गर ख़ूंचकां नहीं

है नंग-ए-सीना दिल अगर आतिश-कदा न हो
है आर-ए-दिल-नफ़स अगर आज़र-फ़िशां नहीं

नुकसां नहीं, जुनूं में बला से हो घर ख़राब
सौ ग़ज़ ज़मीं के बदले बयाबां गिरां नहीं

कहते हो क्या लिखा है तेरे सरनविशत में
गोया जबीं पे सिजदा-ए-बुत का निशां नहीं

पाता हूं उससे दाद कुछ अपने कलाम की
रूहुल-कुदूस अगरचे मेरा हमज़बां नहीं

जां से बहा-ए-बोसा वले कयूं कहे अभी
‘ग़ालिब’ को जानता है कि वो नीम-जां नहीं

जिस जा कि पा-ए-सैल-ए-बला दरमियां नहीं
दीवानगां को वां हवस-ए-ख़ान-मां नहीं

गुल ग़ुंचग़ी में ग़रक-ए-दरिया-ए-रंग है
ऐ आगही फ़रेब-ए-तमाशा कहां नहीं

देखना किस्मत कि आप अपने पे रशक आ जाये है

देखना किस्मत कि आप अपने पे रशक आ जाये है
मैं उसे देखूं, भला कब मुझसे देखा जाये है

हाथ धो दिल से यही गरमी गर अन्देशे में है
आबगीना तुन्दी-ए-सहबा से पिघला जाये है

ग़ैर को या रब ! वो कयों कर मना-ए-गुसताख़ी करे
गर हया भी उसको आती है, तो शरमा जाये है

शौक को ये लत, कि हरदम नाला ख़ींचे जायए
दिल कि वो हालत, कि दम लेने से घबरा जाये है

दूर चशम-ए-बद ! तेरी बज़म-ए-तरब से वाह, वाह
नग़मा हो जाता है वां गर नाला मेरा जाये है

गरचे है तरज़-ए-तग़ाफ़ुल, परदादार-ए-राज़-ए-इशक
पर हम ऐसे खोये जाते हैं कि वो पा जाये है

उसकी बज़म-आराययां सुनकर दिल-ए-रंजूर यां
मिसल-ए-नक्श-ए-मुद्दआ-ए-ग़ैर बैठा जाये है

होके आशिक, वो परीरुख़ और नाज़ुक बन गया
रंग खुलता जाये है, जितना कि उड़ता जाये है

नक्श को उसके मुसव्विर पर भी क्या-क्या नाज़ है
खींचता है जिस कदर, उतना ही खिंचता जाये है

साया मेरा मुझसे मिसल-ए-दूद भागे है ”असद”
पास मुझ आतिश-ब-ज़ां के किस से ठहरा जाये है

 सादगी पर उस की मर जाने की हसरत दिल में है

सादगी पर उस की मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता कि फिर ख़ंजर कफ़-ए-कातिल में है

देखना तकरीर की लज़्ज़त कि जो उसने कहा
मैंने यह जाना कि गोया यह भी मेरे दिल में है

गरचे है किस किस बुरायी से वले बाईं-हमा
ज़िक्र मेरा मुझ से बेहतर है कि उस महफ़िल में है

बस हुजूम-ए-ना उम्मीदी ख़ाक में मिल जायगी
यह जो इक लज़्ज़त हमारी सई-ए-बे-हासिल में है

रंज-ए-रह कयों खींचे वामांदगी को इशक है
उठ नहीं सकता हमारा जो कदम मंज़िल में है

जलवा ज़ार-ए-आतिश-ए-दोज़ख़ हमारा दिल सही
फ़ितना-ए-शोर-ए-कयामत किस की आब-ओ-गिल में है

है दिल-ए-शोरीदा-ए-ग़ालिब तिलिसम-ए-पेच-ओ-ताब
रहम कर अपनी तमन्ना पर कि किस मुशिकल में है

अजब निशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे

अजब निशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे
कि अपने साए से सर पांव से है दो कदम आगे

कज़ा ने था मुझे चाहा ख़राब-ए-बादा-ए-उलफ़त
फ़कत ”ख़राब” लिखा बस, न चल सका कलम आगे

ग़म-ए-ज़माना ने झाड़ी निशात-ए-इशक की मसती
वगरना हम भी उठाते थे लज़्ज़त-ए-अलम आगे

ख़ुदा के वासते दाद उस जुनून-ए-शौक की देना
कि उस के दर पे पहुंचते हैं नामा-बर से हम आगे

यह उम्र भर जो परेशानियां उठायी हैं हम ने
तुम्हारे आइयो ऐ तुर्रह-हा-ए-ख़म-ब-ख़म आगे

दिल-ओ-जिगर में पुर-अफ़शा जो एक मौज-ए-ख़ूं है
हम अपने ज़ोअम में समझे हुए थे उस को दम आगे

कसम जनाज़े पे आने की मेरे खाते हैं ”ग़ालिब”
हमेशा खाते थे जो मेरी जान की कसम आगे

 दिया है दिल अगर उसको बशर है क्या कहये

दिया है दिल अगर उसको बशर है क्या कहये
हुआ रकीब तो हो नामाबर है क्या कहये

ये ज़िद कि आज न आवे और आये बिन न रहे
कज़ा से शिकवा हमें किस कदर है क्या कहये

रहे है यूं गहो-बेगह कि कूए-दोसत को अब
अगर न कहये कि दुशमन का घर है क्या कहये

ज़हे-करिशमा कि यूं दे रखा है हमको फ़रेब
कि बिन कहे ही उन्हें सब ख़बर है, क्या कहये

समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुरिसश-ए-हाल
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहये

तुम्हें नहीं है सर-ए-रिशता-ए-वफ़ा का ख़याल
हमारे हाथ में कुछ है मगर है क्या कहये

उन्हें सवाल पे ज़ोअमे-जुनूं है कयूं लड़िये
हमें जवाब से कत-ए-नज़र है, क्या कहये

हसद सज़ा-ए-कमाल-ए-सुख़न है क्या कीजे
सितम बहा-ए-मताअ-ए-हुनर है क्या कहये

कहा है किसने कि ‘ग़ालिब’ बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके कि आशुफ़ता-सर है क्या कहये

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