शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 8

शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 8

वो आके ख़्वाब में तसकीन-ए-इज़तिराब तो दे

वो आके ख़्वाब में तसकीन-ए-इज़तिराब तो दे
वले मुझे तपिश-ए-दिल मजाल-ए-ख़वाब तो दे

करे है कतल, लगावट में तेरा रो देना
तेरी तरह कोई तेग़े-निगह की आब तो दे

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हमको
न दे जो बोसा, तो मुंह से कहीं जवाब तो दे

पिला दे ओक से साकी, जो हमसे नफ़रत है
पयाला गर नहीं देता न दे, शराब तो दे

‘असद’ ख़ुशी से मेरे हाथ-पांव फूल गए
कहा जो उसने, ज़रा मेरे पांव दाब तो दे

दहर में नक्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ

दहर में नक्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ
है यह वो लफ़ज़ कि शरमिन्दा-ए-माअनी न हुआ

सबज़ा-ए-ख़त से तेरा काकुल-ए-सरकश न दबा
यह ज़मुर्रद भी हरीफ़े-दमे-अफ़यी न हुआ

मैंने चाहा था कि अन्दोह-ए-वफ़ा से छूटूं
वह सितमगर मेरे मरने पे भी राज़ी न हुआ

दिल गुज़रगाह-ए-ख़याले-मै-ओ-साग़र ही सही
गर नफ़स जादा-ए-सर-मंज़िल-ए-तकवी न हुआ

हूं तेरे वादा न करने में भी राज़ी कि कभी
गोश मिन्नत-कशे-गुलबांग-ए-तसल्ली न हुआ

किससे महरूमी-ए-किस्मत की शिकायत कीजे
हम ने चाहा था कि मर जाएं, सो वह भी न हुआ

मर गया सदमा-ए-यक-जुम्बिशे-लब से ‘ग़ालिब’
ना-तवानी से हरीफ़-ए-दम-ए-ईसा न हुआ

हुयी ताख़ीर तो कुछ बायसे-ताख़ीर भी था

हुयी ताख़ीर तो कुछ बायसे-ताख़ीर भी था
आप आते थे, मगर कोई इनांगीर भी था

तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उसमें कुछ शायबा-ए-ख़ूबी-ए-तकदीर भी था

तू मुझे भूल गया हो, तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख़चीर भी था

कैद में है तेरे वहशी को वही ज़ुल्फ़ की याद
हां कुछ इक रंज-ए-गिरांबारी-ए-ज़ंजीर भी था

बिजली इक कौंध गई आंखों के आगे, तो क्या
बात करते, कि मैं लब-तिशना-ए-तकरीर भी था

यूसुफ़ उस को कहूं, और कुछ न कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे तो मैं लायक-ए-तअज़ीर भी था

देखकर ग़ैर को हो कयों न कलेजा ठंडा
नाला करता था वले, तालिब-ए-तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिये न फ़रहाद को नाम
हम ही आशुफ़ता-सरों में वो जवां-मीर भी था

हम थे मरने को खड़े, पास न आया न सही
आखिर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकड़े जाते हैं फ़रिशतों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे-तहरीर भी था

रेख़ते के तुम्हीं उसताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना

इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

तुझसे किस्मत में मेरी सूरत-ए-कुफ़ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना

दिल हुआ कशमकशे-चारा-ए-ज़हमत में तमाम
मिट गया घिसने में इस उकदे का वा हो जाना

6 अब ज़फ़ा से भी हैं महरूम हम, अल्लाह-अल्लाह!
इस कदर दुशमन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना

ज़ोफ़ से गिरियां मुबद्दल ब-दमे-सरद हुआ
बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना

दिल से मिटना तेरी अंगुशते-हनायी का ख़याल
हो गया गोशत से नाख़ुन का जुदा हो जाना

है मुझे अब्र-ए-बहारी का बरस कर खुलना
रोते-रोते ग़म-ए-फ़ुरकत में फ़ना हो जाना

गर नहीं निकहत-ए-गुल को तेरे कूचे की हवस
कयों है गरद-ए-रह-ए-जौलाने-सबा हो जाना

ताकि मुझ पर खुले ऐजाज़े-हवाए-सैकल
देख बरसात में सबज़ आईने का हो जाना

बखशे है जलवा-ए-गुल ज़ौक-ए-तमाशा, ‘गालिब’
चशम को चाहिये हर रंग में वा हो जाना

आमद-ए-ख़त से हुआ है सरद जो बाज़ार-ए-दोसत

आमद-ए-ख़त से हुआ है सरद जो बाज़ार-ए-दोसत
दूद-ए-शम-ए-कुशता था शायद ख़त-ए-रुख़सार-ए-दोसत

ऐ दिले-ना-आकबत-अन्देश ज़बत-ए-शौक कर
कौन ला सकता है ताबे-जलवा-ए-दीदार-ए-दोसत

ख़ाना-वीरां-साज़ी-ए-हैरत तमाशा कीजिये
सूरत-ए-नक्शे-कदम हूं रफ़ता-ए-रफ़तार-ए-दोसत

इशक में बेदाद-ए-रशक-ए-ग़ैर ने मारा मुझे
कुशता-ए-दुशमन हूं आख़िर, गरचे था बीमार-ए-दोसत

चशम-ए-मा रौशन कि उस बेदर्द का दिल शाद है
दीदा-ए-पुरख़ूं हमारा साग़र-ए-सरशार-ए-दोसत

ग़ैर यूं करता है मेरी पुरसिश उस के हिज़्र में
बे-तकल्लुफ़ दोसत हो जैसे कोई ग़मख़वार-ए-दोसत

ताकि मैं जानूं कि है उस की रसायी वां तलक
मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोसत

जबकि में करता हूं अपना शिकवा-ए-ज़ोफ़-ए-दिमाग़
सर करे है वह हदीस-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरबार-ए-दोसत

चुपके-चुपके मुझ को रोते देख पाता है अगर
हंस के करता है बयाने-शोख़ी-ए-गुफ़तारे-दोसत

मेहरबानी हाए-दुशमन की शिकायत कीजिये
या बयां कीजे, सिपासे-लज़ज़ते-आज़ारे-दोसत

यह ग़ज़ल अपनी मुझे जी से पसन्द आती है आप
है रदीफ़-ए-शेर में ”ग़ालिब” ज़बस तकरार-ए-दोसत

लाज़िम था कि देखो मेरा रसता कोई दिन और

लाज़िम था कि देखो मेरा रसता कोई दिन और
तनहा गये कयों ? अब रहो तनहा कोई दिन और

मिट जायेगा सर, गर तेरा पत्थर न घिसेगा
हूं दर पे तेरे नासिया-फ़रसा कोई दिन और

आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊं
माना कि हमेशा नहीं, अच्छा, कोई दिन और

जाते हुए कहते हो, क्यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब! क्यामत का है गोया कोई दिन और

हां ऐ फ़लक-ए-पीर, जवां था अभी आरिफ़
क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और

तुम माह-ए-शब-ए-चार-दहुम थे मेरे घर के
फिर कयों न रहा घर का वो नक्शा कोई दिन और

तुम कौन से ऐसे थे खरे दाद-ओ-सितद के
करता मलक-उल-मौत तकाज़ा कोई दिन और

मुझसे तुम्हें नफ़रत सही, नय्यर से लड़ाई
बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और

ग़ुज़री न बहर-हाल ये मुद्दत ख़ुश-ओ-नाख़ुश
करना था, जवां-मरग! गुज़ारा कोई दिन और

नादां हो जो कहते हो कि कयों जीते हो ”ग़ालिब”
किस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और

Leave a Reply