शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 7

शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 7

हर कदम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायां मुझ से

हर कदम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायां मुझ से
मेरी रफ़तार से भागे है बयाबां मुझ से

दरस-ए-उनवान-ए-तमाशा ब-तग़ाफ़ुल ख़ुशतर
है निगह रिशता-ए-शीराज़ा-ए-मिज़गां मुझ से

वहशत-ए-आतिश-ए-दिल से शब-ए-तनहायी में
सूरत-ए-दूद रहा साया गुरेज़ां मुझ से

ग़म-ए-उश्शाक, न हो सादगी-आमोज़-ए-बुतां
किस कदर ख़ाना-ए-आईना है वीरां मुझ से

असर-ए-आबला से जाद-ए-सहरा-ए-जुनूं
सूरत-ए-रिशता-ए-गौहर है चिराग़ां मुझ से

बे-ख़ुदी बिसतर-ए-तमहीद-ए-फ़राग़त हो जो
पुर है साए की तरह मेरा शबिसतां मुझ से

शौक-ए-दीदार में गर तू मुझे गरदन मारे
हो निगह मिसल-ए-गुल-ए-शमय परेशां मुझ से

बेकसी हा-ए-शब-ए-हज़र की वहशत, है है
साया ख़ुरशीद-ए-कयामत में है पिनहां मुझ से

गरिदश-ए-साग़र-ए-सद-जलवा-ए-रंगीं तुझ से
आईना-दारी-ए-यक-दीदा-ए-हैरां मुझ से

निगह-ए-गरम से इक आग टपकती है ”असद”
है चिराग़ां ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-गुलिसतां मुझ से

बसतन-ए-अहद-ए-मुहब्बत हमा ना-दानी था
चशम-ए-नाकुशूदा रहा उकदा-ए-पैमां मुझ से

आतिश-अफ़रोज़ी-ए-यक-शोला-ए-ईमा तुझ से
चशमक-आराई-ए-सद-शहर चिराग़ां मुझ से

कहते हो, न देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया

कहते हो, न देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहां कि गुम कीजे ? हमने मुद्दआ पाया

इशक से तबियत ने ज़ीसत का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द बे-दवा पाया

दोसत दारे-दुशमन है, एतमादे-दिल मालूम
आह बेअसर देखी, नाला नारसा पाया

सादगी व पुरकारी बेख़ुदी व हुशियारी
हुसन को तग़ाफ़ुल में जुरअत-आज़मा पाया

ग़ुंचा फिर लगा खिलने, आज हम ने अपना दिल
खूं किया हुआ देखा, गुम किया हुआ पाया

हाल-ए-दिल नहीं मालूम, लेकिन इस कदर यानी
हम ने बारहा ढूंढा, तुम ने बारहा पाया

शोर-ए-पन्दे-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का
आप से कोई पूछे, तुम ने क्या मज़ा पाया

ना असद जफ़ा-सायल ना सितम जुनूं-मायल
तुझ को जिस कदर ढूंढा उलफ़त-आज़मा पाया

यक ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बेकार बाग़ का

यक ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बेकार बाग़ का
यां जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का

बे-मै किसे है ताकत-ए-आशोब-ए-आगही
खेंचा है अजज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का

बुलबुल के कार-ओ-बार पे हैं ख़न्दा-हाए-गुल
कहते हैं जिस को इशक ख़लल है दिमाग़ का

ताज़ा नहीं है नशा-ए-फ़िकर-ए-सुख़न मुझे
तिरयाकी-ए-कदीम हूं दूद-ए-चिराग़ का

सौ बार बन्द-ए-इशक से आज़ाद हम हुए
पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का

बे-ख़ून-ए-दिल है चशम में मौज-ए-निगह ग़ुबार
यह मै-कदा ख़राब है मै के सुराग़ का
बाग़-ए-शगुफ़ता तेरा बिसात-ए-नशात-ए-दिल
अब्र-ए-बहार ख़ुम-कदा किस के दिमाग़ का

सुरमा-ए-मुफ़त-ए-नज़र हूं

सुरमा-ए-मुफ़त-ए-नज़र हूं, मेरी कीमत ये है
कि रहे चशम-ए-ख़रीदार पे एहसां मेरा

रुख़सत-ए-नाला मुझे दे कि मबादा ज़ालिम
तेरे चेहरे से हो ज़ाहर ग़म-ए-पिनहां मेरा

-अणछपी ग़ज़ल-

ख़लवत-ए आबला-ए-पा में है जौलां मेरा
ख़ूं है दिल तंगी-ए-वहशत से बयाबां मेरा

हसरत-ए-नशा-ए-वहशत न ब-सअई-ए दिल है
अरज़-ए-ख़मयाज़ा-ए-मजनूं है गरेबां मेरा

फ़हम ज़ंजीरी-ए-बेरबती-ए दिल है या रब
किस ज़बां में है लकब ख़्वाब-ए-परेशां मेरा

कयोंकर उस बुत से रखूं जान अज़ीज़

कयोंकर उस बुत से रखूं जान अज़ीज़
क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़

दिल से निकला प न निकला दिल से
है तेरे तीर का पैकान अज़ीज़
ताब लाये ही बनेगी ”ग़लिब”
बाक्या सख़त है और जान अज़ीज़

कब वो सुनता है कहानी मेरी

कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी

ख़लिश-ए-ग़मज़ा-ए-खूंरेज़ न पूछ
देख ख़ून्नाबा-फ़िशानी मेरी

क्या बयां करके मेरा रोएंगे यार
मगर आशुफ़ता-बयानी मेरी

हूं ज़-ख़ुद रफ़ता-ए-बैदा-ए-ख़याल
भूल जाना है निशानी मेरी

मुतकाबिल है मुकाबिल मेरा
रुक गया देख रवानी मेरी

कद्रे-संगे-सरे-रह रखता हूं
सख़त-अरज़ां है गिरानी मेरी

गरद-बाद-ए-रहे-बेताबी हूं
सरसरे-शौक है बानी मेरी

दहन उसका जो न मालूम हुआ
खुल गयी हेच मदानी मेरी

कर दिया ज़ोफ़ ने आज़िज़ ‘ग़ालिब’
नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी

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