शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 5

शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 5

ग़म-ए-दुनिया से गर पायी भी फ़ुरसत

ग़म-ए-दुनिया से गर पायी भी फ़ुरसत सर उठाने की
फ़लक का देखना तकरीब तेरे याद आने की

खुलेगा किस तरह मज़मूं मेरे मकतूब का यारब
कसम खायी है उस काफ़िर ने काग़ज़ के जलाने की

लिपटना परनियां में शोला-ए-आतिश का आसां है
वले मुशिकल है हिकमत दिल में सोज़-ए-ग़म छुपाने की

उन्हें मंज़ूर अपने ज़ख़्म्यों का देख आना था
उठे थे सैर-ए-गुल को देखना शोख़ी बहाने की

हमारी सादगी थी इलतफ़ात-ए-नाज़ पर मरना
तेरा आना न था ज़ालिम मगर तमहीद जाने की

लकद कूब-ए-हवादिस का तहम्मुल कर नहीं सकती
मेरी ताकत कि ज़ामिन थी बुतों के नाज़ उठाने की

कहूं क्या ख़ूबी-ए-औज़ा-ए-अबना-ए-ज़मां ‘ग़ालिब’
बदी की उसने जिस से हमने की थी बारहा नेकी

फ़रियाद की कोई लै नहीं है

फ़रियाद की कोई लै नहीं है
नाला पाबन्द-ए-नै नहीं है

कयूं बोते हैं बाग़-बान तूम्बे
गर बाग़ गदा-ए-मै नहीं है

हर-चन्द हर एक शै में तू है
पर तुझ-सी कोई शै नहीं है

हां, खाययो मत फ़रेब-ए-हसती
हर-चन्द कहें कि ”है”, नहीं है

शादी से गुज़र, कि ग़म न रहवे
उरदी जो न हो, तो दै नहीं है

कयूं रद्द-ए-कदह करे है, ज़ाहद
मै है ये, मगस की कै नहीं है

हसती है न कुछ अदम है ”ग़ालिब”
आख़िर तू क्या है, ए ”नहीं” है

सतायश गर है ज़ाहद इस कदर जिस बाग़े-रिज़वां का

सतायश गर है ज़ाहद इस कदर जिस बाग़े-रिज़वां का
वह इक गुलदसता है हम बेख़ुदों के ताके-निसियां का

बयां क्या कीजिये बेदादे-काविश-हाए-मिज़गां का
कि हर इक कतरा-ए-ख़ूं दाना है तसबीहे-मरजां का

न आई सतवते-कातिल भी मानय मेरे नालों को
लिया दांतों में जो तिनका, हुआ रेशा नैसतां का

दिखाऊंगा तमाशा, दी अगर फ़ुरसत ज़माने ने
मेरा हर दाग़-ए-दिल इक तुखम है सरव-ए-चिराग़ां का

किया आईनाख़ाने का वो नक्शा तेरे जलवे ने
करे जो परतव-ए-ख़ुरशीद-आलम शबनमिसतां का

मेरी तामीर में मुज़मिर है इक सूरत ख़राबी की
हयूला बरक-ए-ख़िरमन का है ख़ून-ए-गरम दहकां का

उगा है घर में हर-सू सबज़ा, वीरानी, तमाशा कर
मदार अब खोदने पर घास के, है मेरे दरबां का

ख़मोशी में नेहां ख़ूंगशता लाखों आरज़ूएं हैं
चिराग़-ए-मुरदा हूं में बेज़ुबां गोर-ए-ग़रीबां का

हनूज़ इक परतव-ए-नक्श-ए-ख़याल-ए-यार बाकी है
दिल-ए-अफ़सुरदा गोया हुजरा है यूसुफ़ के ज़िन्दां का

बग़ल में ग़ैर की आप आज सोते हैं कहीं, वरना
सबब क्या? ख़्वाब में आकर तबस्सुम-हाए-पिनहां का

नहीं मालूम किस-किसका लहू पानी हुआ होगा
कयामत है सरशक-आलूदा होना तेरी मिज़गां का

नज़र में है हमारी जादा-ए-राह-ए-फ़ना ‘ग़ालिब’
कि ये शीराज़ा है आलम के अज्जाए-परीशां का

महरम नहीं है तू ही नवा-हाए-राज़ का

महरम नहीं है तू ही नवा-हाए-राज़ का
यां वरना जो हिजाब है, परदा है साज़ का

रंगे-शिकसता सुबहे-बहारे-नज़ारा है
ये वकत है शुगुफ़तने-गुल-हाए-नाज़ का

तू, और सू-ए-ग़ैर नज़र-हाए तेज़-तेज़
मैं, और दुख तेरी मिज़गां-हाए-दराज़ का

सरफ़ा है ज़बते-आह में मेरा, वगरना मैं
तोअमा हूं एक ही नफ़से-जां-गुदाज़ का

हैं बस कि जोशे-बादा से शीशे उछल रहे
हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का

काविश का दिल करे है तकाज़ा कि है हनूज़
नाख़ुन पे करज़ इस गिरहे-नीम-बाज़ का

ताराज-ए-काविशे-ग़मे-हजरां हुआ ”असद”
सीना, कि था दफ़ीना-ए-गुहर-हाए-राज़ का

तू दोसत किसी का भी सितमगर न हुआ था

तू दोसत किसी का भी सितमगर न हुआ था
औरों पे है वो ज़ुलम कि मुझ पर न हुआ था

छोड़ा मह-ए-नख़शब की तरह दसत-ए-कज़ा ने
ख़ुरशीद हनूज़ उस के बराबर न हुआ था

तौफ़ीक बअन्दाज़ा-ए-हंमत है अज़ल से
आंखों में है वो कतरा कि गौहर न हुआ था

जब तक की न देखा था कद-ए-यार का आलम
मैं मुअतकिद-ए-फ़ितना-ए-महशर न हुआ था

मैं सादा-दिल, आज़ुरदगी-ए-यार से ख़ुश हूं
यानी सबक-ए-शौक मुकर्रर न हुआ था

दरिया-ए-मआसी तुनुक-आबी से हुआ ख़ुशक
मेरा सर-ए-दामन भी अभी तर न हुआ था

जारी थी ‘असद’ दाग़-ए-जिगर से मेरी तहसील
आतिशकदा जागीर-ए-समन्दर न हुआ था

हम से खुल जायो ब-वकते-मै-परसती एक दिन

हम से खुल जायो ब-वकते-मै-परसती एक दिन
वरना हम छेड़ेंगे रख कर उज़र-ए-मसती एक दिन

ग़र्रा-ए औज-ए-बिना-ए-आलम-ए-इमकां न हो
इस बुलन्दी के नसीबों में है पसती एक दिन

करज़ की पीते थे मै लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फ़ाका-मसती एक दिन

नग़मा-हाए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिये
बे-सदा हो जाएगा यह साज़-ए-हसती एक दिन

धौल-धप्पा उस सरापा-नाज़ का शेवा नहीं
हम ही कर बैठे थे ग़ालिब पेश-दसती एक दिन

 कयों जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर

कयों जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
जलता हूं अपनी ताकत-ए-दीदार देख कर

आतिश-परसत कहते हैं अहल-ए-जहां मुझे
सर-गरम-ए-नाला-हा-ए-शरर-बार देख कर

क्या आबरू-ए-इशक जहां आम हो जफ़ा
रुकता हूं तुम को बे-सबब आज़ार देख कर

आता है मेरे कतल को पर जोश-ए-रशक से
मरता हूं उस के हाथ में तलवार देख कर

साबित हुआ है गरदन-ए-मीना पे ख़ून-ए-ख़लक
लरज़े है मौज-ए-मय तेरी रफ़तार देख कर

वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ
हम को हरीस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार देख कर

बिक जाते हैं हम आप मता-ए-सुख़न के साथ
लेकिन अयार-ए-तबा-ए-ख़रीदार देख कर

ज़ुन्नार बांध सुब्हा-ए-सद-दाना तोड़ डाल
रह-रौ चले है राह को हम-वार देख कर

इन आबलों से पांव के घबरा गया था में
जी ख़ुश हुआ है राह को पुर-ख़ार देख कर

क्या बद-गुमां है मुझ से के आईने में मेरे
तूती का अकस समझे है ज़ंगार देख कर

गिरनी थी हम पे बरक-ए-तजल्ली न तूर पर
देते हैं बादा ज़रफ़-ए-कदह-ख़वार देख कर

सर फोड़ना वो ‘ग़ालिब’-ए-शोरीदा हाल का
याद आ गया मुझे तेरी दीवार देख कर

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