शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 10

शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers part 10

फिर इस अन्दाज़ से बहार आई

फिर इस अन्दाज़ से बहार आई
कि हुए मेहरो-मह तमाशाई

देखो ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक
इसको कहते हैं आलम-आराई

कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर
रू-कश-ए-सतह-ए-चरख़-ए-मीनाई

सबज़ा को जब कहीं जगह न मिली
बन गया रू-ए-आब पर काई

सबज़ा-ओ-गुल के देखने के लिये
चशमे-नरिगस को दी है बीनाई

है हवा में शराब की तासीर
बादा-नोशी है बादा-पैमाई

कयूं न दुनिया को हो ख़ुशी ‘ग़ालिब’
शाह-ए-दींदार ने शिफ़ा पाई

 

इशक मुझको नहीं, वहशत ही सही

इशक मुझको नहीं, वहशत ही सही
मेरी वहशत, तेरी शोहरत ही सही

कतय कीजे न तअल्लुक हम से
कुछ नहीं है, तो अदावत ही सही

मेरे होने में है क्या रुसवाई
ऐ वो मजलिस नहीं ख़लवत ही सही

हम भी दुशमन तो नहीं हैं अपने
ग़ैर को तुझ से मुहब्बत ही सही

अपनी हसती ही से हो, जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही

उम्र हरचन्द कि है बरक-ए-ख़िराम
दिल के ख़ूं करने की फ़ुरसत ही सही

हम कोई तरक-ए-वफ़ा करते हैं
न सही इशक मुसीबत ही सही

कुछ तो दे, ऐ फ़लक-ए-नायनसाफ़
आह-ओ-फ़रियाद की रुख़सत ही सही

हम भी तसलीम की ख़ू डालेंगे
बेनियाज़ी तेरी आदत ही सही

यार से छेड़ चली जाये, ‘असद’
गर नहीं वसल तो हसरत ही सही

उस बज़म में मुझे नहीं बनती हया किये

उस बज़म में मुझे नहीं बनती हया किये
बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किये

दिल ही तो है सियासत-ए-दरबां से डर गया
मैं और जाऊं दर से तेरे बिन सदा किये

रखता फिरूं हूं ख़िरका-ओ-सज्जादा रहन-ए-मय
मुद्दत हुयी है दावत-ए-आब-ओ-हवा किये

बेसरफ़ा ही गुज़रती है, हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र
हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किये

मकदूर हो तो ख़ाक से पूछूं के ऐ लईम
तूने वो गंजहा-ए-गिरां-माया क्या किये

किस रोज़ तोहमतें न तराशा किये अदू
किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किये

सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
देने लगा है बोसे बग़ैर इलतिजा किये

ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं
भूले से उस ने सैकड़ों वादे-वफ़ा किये

‘ग़ालिब’ तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या
माना कि तुम कहा किये और वो सुना किये

 दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को इक अदा में रज़ामन्द कर गई

चाक हो गया है सीना ख़ुशा लज़्ज़त-ए-फ़राग़
तकलीफ़-ए-परदादारी-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर गई

वो बादा-ए-शबाना की सरमसितयां कहां
उठिये बस अब कि लज़्ज़त-ए-ख़्वाब-ए-सहर गई

उड़ती फिरे है ख़ाक मेरी कू-ए-यार में
बारे अब ऐ हवा, हवस-ए-बाल-ओ-पर गई

देखो तो दिल फ़रेबी-ए-अन्दाज़-ए-नक्श-ए-पा
मौज-ए-ख़िराम-ए-यार भी क्या गुल कतर गई

हर बुलहवस ने हुसन परसती श्यार की
अब आबरू-ए-शेवा-ए-अहल-ए-नज़र गई

नज़्ज़ारे ने भी काम किया वां नकाब का
मसती से हर निगह तेरे रुख़ पर बिखर गई

फ़रदा-ओ-दी का तफ़रका यक बार मिट गया
कल तुम गए कि हम पे क्यामत गुज़र गई

मारा ज़माने ने ‘असदुल्लाह ख़ां’ तुम्हें
वो वलवले कहां, वो जवानी किधर गई

शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है

शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है
ये भी मत कह कि जो कहये तो गिला होता है

पुर हूं मैं शिकवा से यूं, राग से जैसे बाजा
इक ज़रा छेड़िये, फिर देखिये क्या होता है

गो समझता नहीं पर हुसने-तलाफ़ी देखो!
शिकवा-ए-ज़ौर से सरगरम-ए-जफ़ा होता है

इशक की राह में है, चरख़-ए-मकोकब की वो चाल
सुसत-रौ जैसे कोई आबला-पा होता है

कयूं न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बेदाद कि हम
आप उठा लाते हैं गर तीर ख़ता होता है

ख़ूब था पहले से होते जो हम अपने बदख़वाह
कि भला चाहते हैं, और बुरा होता है

नाला जाता था, परे अरश से मेरा, और अब
लब तक आता है जो ऐसा ही रसा होता है

ख़ामा मेरा कि वह है बारबुद-ए-बज़म-ए-सुख़न
शाह की मदह में यूं नग़मा-सरा होता है

ऐ शहनशाह-ए-कवाकिब सिपह-ओ-मेहर-अलम
तेरे इकराम का हक किस से अदा होता है

सात इकलीम का हासिल जो फ़राहम कीजे
तो वह लशकर का तेरे, नाल-ए-बहा होता है

हर महीने में जो यह बदर से होता है हिलाल
आसतां पर तेरे यह नासिया-सा होता है

मैं जो गुसताख़ हूं आईना-ए-ग़ज़ल-ख़वानी में
यह भी तेरा ही करम ज़ौक-फ़िज़ा होता है

रखियो ”ग़ालिब” मुझे इस तलख़-नवायी से मुआ्आफ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है

कभी नेकी भी उसके जी में आ जाये है मुझ से

कभी नेकी भी उसके जी में आ जाये है मुझ से
जफ़ायें करके अपनी याद शरमा जाये है मुझ से

ख़ुदाया ज़ज़बा-ए-दिल की मगर तासीर उलटी है
कि जितना खैंचता हूं और खिंचता जाये है मुझ से

वो बद-ख़ू और मेरी दासतान-ए-इशक तूलानी
इबारत मुख़तसर कासिद भी घबरा जाये है मुझ से

उधर वो बदगुमानी है इधर ये नातवानी है
ना पूछा जाये है उससे न बोला जाये है मुझ से

संभलने दे मुझे ऐ नाउम्मीदी क्या क्यामत है
कि दामन-ए-ख़याल-ए-यार छूटा जाये है मुझ से

तकल्लुफ़ बर-तरफ़ नज़्ज़ारगी में भी सही लेकिन
वो देखा जाये कब ये ज़ुलम देखा जाये है मुझ से

हुए हैं पांव ही पहले नवरद-ए-इशक में ज़ख़्मी
न भागा जाये है मुझसे न ठहरा जाये है मुझ से

कयामत है कि होवे मुद्दयी का हमसफ़र ‘ग़ालिब’
वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझ से

 

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