शाम-अनंतिम_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

शाम-अनंतिम_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

उजले प्रदेश की भूरी चिड़िया
चक्कर खाते हुए बैठ गई है पीली दीवार पर
जो उस जनपद में है
जहाँ सारे घर कुनकुने पीले होकर चमक रहे हैं
यह एक उदास रंग जो शाम में ज़्यादा निखरा हुआ लग रहा है
दरवाजे, खिड़की, ओसारे से होता हुआ पहुँच रहा है भीतर तक
सिर्फ टेकरी के मंदिर का कलश लाल-सिंदूरी होकर चमक रहा है
यह अँधेरे से पहले की चमक जिसे डूबना ही है अँधेरे में

अभी यह होती हुई शाम है ऊष्मा और ठंड की
तंग जगह से गुज़रती हुई
खजूर की पत्तियाँ अपनी ऊँचाई की रोशनी में हिल रही हैं
नदी की आवाज़ अब आ चुकी है पचास गज़ की दूरी पर
लौट रहे हैं पुरुष और मवेशी
उनके कंधों पर थकान का रंग बैठा है उमंग बनकर
टुनटन आरती शुरू होने को ही है टेकरी पर
अभी तो एक ऊब है जो फैली हुई है बुजुर्गों की फुरसत में
साँवली होती हुई पीली-सी ऊब
जिसकी गंध से मक्खियाँ रात गुज़ारने के लिए ठौर ढूँढ़ रही हैं

 

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