शहदाबा -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Shahdaba Part 1

शहदाबा -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Shahdaba Part 1

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया

अहबाब का सुलूक भी कितना अजीब था
नहला धुला के मिट्टी को मिट्टी पे रख दिया

आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया

फिर भी न दूर हो सकी आँखों से बेवगी
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया

दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया

अंदर की टूट -फूट छिपाने के वास्ते
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया

घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया

पिछला निशान जलने का मौजूद था तो फिर
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया

महफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न हो

महफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न हो
आँखों से बहने दीजिए पानी ही क्यूँ न हो

नश्शे का एहतिमाम से रिश्ता नहीं कोई
पैग़ाम उस का आए ज़बानी ही क्यूँ न हो

ऐसे ये ग़म की रात गुज़रना मुहाल है
कुछ भी सुना मुझे वो कहानी ही क्यूँ न हो

कोई भी साथ देता नहीं उम्र-भर यहाँ
कुछ दिन रहेगी साथ जवानी ही क्यूँ न हो

इस तिश्नगी की क़ैद से जैसे भी हो निकाल
पीने को कुछ भी चाहिए पानी ही क्यूँ न हो

दुनिया भी जैसे ताश के पत्तों का खेल है
जोकर के साथ रहती है रानी ही क्यूँ न हो

तस्वीर उस की चाहिए हर हाल में मुझे
पागल हो सर-फिरी हो दिवानी ही क्यूँ न हो

सोना तो यार सोना है चाहे जहाँ रहे
बीवी है फिर भी बीवी पुरानी ही क्यूँ न हो

अब अपने घर में रहने न देंगे किसी को हम
दिल से निकाल देंगे निशानी ही क्यूँ न हो

किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ

किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ
मैं इस सुरंग से निकलूँ तू आब-जू हो जाऊँ

बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर
मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ

मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या
वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ

किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी
शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ

मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा
कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ

कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए
अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ

नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता
पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ

दुनिया सलूक करती है हलवाई की तरह

दुनिया सलूक करती है हलवाई की तरह
तुम भी उतारे जाओगे मलाई की तरह

माँ बाप मुफलिसों की तरह देखते हैं बस
क़द बेटियों के बढ़ते हैं महंगाई की तरह

हम चाहते हैं रक्खे हमें भी ज़माना याद
ग़ालिब के शेर तुलसी की चौपाई की तरह

हमसे हमारी पिछली कहानी न पूछिए
हम खुद उधड़ने लगते हैं तुरपाई की तरह

अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया

अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया
तेरी कलाई से ये कड़ा भी उतर गया

वो मुतमइन बहुत है मिरा साथ छोड़ कर
मैं भी हूँ ख़ुश कि क़र्ज़ मिरा भी उतर गया

रुख़्सत का वक़्त है यूँही चेहरा खिला रहे
मैं टूट जाऊँगा जो ज़रा भी उतर गया

बेकस की आरज़ू में परेशाँ है ज़िंदगी
अब तो फ़सील-ए-जाँ से दिया भी उतर गया

रो-धो के वो भी हो गया ख़ामोश एक रोज़
दो-चार दिन में रंग-ए-हिना भी उतर गया

पानी में वो कशिश है कि अल्लाह की पनाह
रस्सी का हाथ थामे घड़ा भी उतर गया

वो मुफ़्लिसी के दिन भी गुज़ारे हैं मैं ने जब
चूल्हे से ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया

सच बोलने में नश्शा कई बोतलों का था
बस ये हुआ कि मेरा गला भी उतर गया

पहले भी बे-लिबास थे इतने मगर न थे
अब जिस्म से लिबास-ए-हया भी उतर गया

आख़िरी सच

चेहरे तमाम धुँदले नज़र आ रहे हैं क्यूँ
क्यूँ ख़्वाब रतजगों की हवेली में दब गए
है कल की बात उँगली पकड़ कर किसी की मैं
मेले मैं घूमता था खिलौनों के वास्ते
जितने वरक़ लिखे थे मिरी ज़िंदगी ने सब
आँधी के एक झोंके में बिखरे हुए हैं सब
मैं चाहता हूँ फिर से समेटूँ ये ज़िंदगी
बच्चे तमाम पास खड़े हैं बुझे बुझे
शोख़ी न जाने क्या हुई रंगत कहाँ गई
जैसे किताब छोड़ के जाते हुए वरक़
जैसे कि भूलने लगे बच्चा कोई सबक़
जैसे जबीं को छूने लगे मौत का अरक़
जैसे चराग़ नींद की आग़ोश की तरफ़
बढ़ने लगे अँधेरे की ज़ुल्फ़ें बिखेर कर
भूले हुए हैं होंट हँसी का पता तलक
दरवाज़ा दिल का बंद हुआ चाहता है अब
क्या सोचना कि फूल से बच्चों का साथ है
अब मैं हूँ अस्पताल का बिस्तर है रात है

भिकारी

उस की बनाई हुई हर तस्वीर
अख़बारों की ख़बर बन जाती है
उस की हर पेंटिंग को इनआमात ललचाई हुई नज़रों से देखते हैं
उस के ब्रश से रंगों का रंग खिल जाता है
वो क़ुदरत के हर नज़्ज़ारे को
अपने रंग और ब्रश से क़ैद कर लेता है
लेकिन
उस की बीवी की कोख में
कोई तस्वीर नहीं होती
उस के ब्रश से आँगन की किलकारियां ना-वाक़िफ़ हैं
शायद इस मुसव्विर से
काएनात का सब से बड़ा मुसव्विर नाराज़ है

लिपस्टिक

उस की हर बात
हर इशारे
हर किनाए को मैं आसानी से
समझ लेता था
लेकिन पता नहीं क्यूँ उस ने
मेरे लिखे हुए पुराने ख़ुतूत में
सोए हुए बे-क़ुसूर लफ़्ज़ों को
अपनी लाल रंग की लिपस्टिक से
हरा करने की कोशिश की है
क्यूँ

एहतिसाबे गुनाह

एक दिन अचानक उसने पूछा
तुम्हें गिनती आती है
मैंने कहा हां
उसने पूछा पहाड़े
मैंने कहा हां ! हां !
फिर उसने फ़ौरन ही पूछा
हिसाब भी आता होगा
मैंने गुरुर से अपनी डिग्रियों के नाम लिए
उसने कहा बस ! बस !
अब मुझसे किये हुए वादों
की गिनती बता दो
मैं तुम्हे मुआफ कर दूंगी

सिन्धु सदियों से हमारे देश की पहचान है

सिन्धु सदियों से हमारे देश की पहचान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

पेड़-पौधों के हरे पत्तों को चमकाती हुई
फूल पर लेकिन कटोरों रंग ढलकाती हुई
अप्सरा उतरे जमीं पर ऐसे इठलाती हुई
पत्थरों से बात करती बोलती गाती हुई
अपनी लहरों में छिपाए बांसुरी की तान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

चांद तारे पूछते हैं रात भर बस्ती का हाल
दिन में सूरज ले के आ जाता है एक सोने का थाल
खुद हिमालय कर रहा है इस नदी की देखभाल
अपने हाथों से ओढ़ाया है इसे कुदरत ने शाल
कतरा-कतरा इस नदी का फौजियों की शान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

देश के दुख-सुख से इसका आज का रिश्ता नहीं
इसका पानी साफ है शफ्फाफ है खारा नहीं
आपने हैरत है अब तक इस तरफ देखा नहीं
जो सियासत ने बनाया है ये वो नक्शा नहीं
जो हमें कुदरत ने बख्शा है ये वो सम्मान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

सिन्धु को केवल नदी हरगिज न कहना चाहिए
देश की रग-रग में इसको रोज बहना चाहिए
कम से कम एक दिन यहां पर आके रहना चाहिए
जिन्दगी दु:ख भी अगर बख्शे तो सहना चाहिए
जिसने पानी पी लिया है सिन्धु का धनवान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

हर सिपाही दुश्मनों से जंग करता है यहां
जर्रा-जर्रा मौसमों से जंग करता है यहां
जिस्म ठंडी नागिनों से जंग करता है यहां
रोज मौसम हौसलों से जंग करता है यहां
देश पर कुर्बान होना फौजियों की शान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

बर्फ रेगिस्तान है लद्दाख जैसे करबला
बर्फ को पानी बना देता है लेकिन हौसला
नफरतों के बीज बोना है सियासी मशगला
आओ मिल-जुल कर करें हम लोग अब ये फैसला
देश पर दिल भी हमारा जान भी कुर्बान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

इस नदी को देश की हर एक कहानी याद है
इसको बचपन याद है इसको जवानी याद है
ये कहीं लिखती नहीं है मुंह जुबानी याद है
ऐ सियासत तेरी हर एक मेहरबानी याद है
अब नदी को कौन बतलाए ये पाकिस्तान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

रास्ता तकती है सिन्धु ऐसे सर खोले हुए
जैसे कोई रो रहा हो चश्मे तर खोले हुए
जैसे चिड़िया सो रही हो अपने पर खोले हुए
मुनतजिर बेटे की जैसे मां हो घर खोले हुए
जिनके बेटे फौज में हैं उनका ये बलिदान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

था कहां तक देश कल तक ये बताती है हमें
अपने आईने में ये माजी दिखाती है हमें
जान देना मुल्क पर सिन्धु सिखाती है हमें
मां की तरह अपने सीने से लगाती है हमें
जख्म है छाती पे लेकिन होंठ पर मुस्कान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

 

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