शरहे-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

शरहे-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

शरहे-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई
अबके भी दिल की मुदारात न होने पाई

फिर वही वादा जो इकरार न बनने पाया
फिर वही बात जो इसबात न होने पाई

फिर वो परवाने, जिन्हें इज़ने-शहादत न मिला
फिर वो शमएं, कि जिन्हें रात न होने पाई

फिर वही जां-ब-लबी, लज़्ज़ते-मय से पहले
फिर वो महफ़िल जो ख़राबात न होने पाई

फिर दमे-दीद रहे चश्मो-नज़र दीदतलब
फिर शबे-वसल मुलाकात न होने पाई

फिर वहां बाबे-असर जानिये कब बन्द हुआ
फिर यहां ख़तम मुनाजात न होने पाई

‘फ़ैज़’ सर पर जो हरेक रोज़ क्यामत गुज़री,
एक भी रोज़े-मुकाफ़ात न होने पाई

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