शबद-अबोल-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

शबद-अबोल-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

दिन चढ़ा है।
दर्दों का दरिया बढ़ा है।
तटबंधों को काट-पीट कर मेरे मन में आ घुसा है।
टखने टखने, घुटने घुटने, गले गले पानी,
अब तो सिर से लाँघ गया है।
रक्तिम सुर्ख सरोवर मन का।
लाची बेर उदास खड़ी है।
दुखभंजनी भी अश्रुपूरित,
सब वृक्षों से पंछी उड़ गए।
आधी रात में हमला बोला है।
टहनी टहनी पत्ता पत्ता
कौए गिद्धों बाज़ों ने मिल कर
हर वृक्ष ही छान है मारा।
खोजते फिरते, टहनी पत्ते कौन हिलाए?

गुरु नानक के बोल सुनते यह क्या हो गया?
नभ के सारे तारे नीले रंग के।
असली रंग खो गया।
क्या हुआ है अमृत वेला में,
चारों वर्णों के साझे घर में घुस कर।
अंधी गोलीबारी शबदों की छाती चीर गई है।
तबला लहू लुहान पड़ा है।
तानपुरे की तारें टूटीं
कानों में गड़ गड़ का हमला।
कंठ के भीतर जहरीला धुँआ,
फेफड़ों तक पहुँच गया है।
इस जन्म में अपनों के कृपा की बलिहारी,
मन मंदिर को घेरा पहली बार पड़ा है।

 

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